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उल्टा चोर कोतवाल को डांटे!

परमाणु ऊर्जा की अंतरराष्ट्रीय एजेन्सी ने अपनी बारमबार की रिपोर्टों में पुष्टि की है कि ईरान पूरी तरह परमाणु समझौते पर अमल कर रहा है

वर्षों की बातचीत के बाद ईरान और विश्व की 6 बड़ी शक्तियों अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस के बीच परमाणु समझौते पर 2015 में हस्ताक्षर हुए थे। उसके बाद सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव नंबर 2231 पारित करके इस समझौते पर अपनी मुहर लगा दी।

यहां इस बात का भी उल्लेख आवश्यक है कि यह समझौता अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा के काल में हुआ था और जब डोनल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति बने तो 14 महीने बाद 8 मई 2018 को वह एक पक्षीय रूप से इस अंतरराष्ट्रीय समझौते से निकल गये।

इस पर जहां विश्व स्तर पर खेद और चिंता जताई गयी वहीं अमेरिकी खुशी को अपना आक़ा समझने वाले देशों व शासनों ने खुशी मनाई पर यूरोपीय देशों ने कहा कि हम परमाणु समझौते के प्रति कटिबद्ध रहेंगे और परमाणु समझौते से अमेरिका के निकल जाने से ईरान को जो क्षति पहुंची है हम उसकी भरपाई करेंगे।

उनकी इस घोषणा को एक वर्ष का समय बीत गया यानी 8 मई 2018 से 8 मई 2019 का समय भी बीत गया और परमाणु समझौते में यूरोपीय देश जिन 11 चीज़ों के प्रति कटिबद्ध हुए थे उनमें से किसी एक पर भी उन्होंने अमल नहीं किया जबकि ईरान परमाणु समझौते में अपने समस्त वचनों पर अमल करता रहा और इस बात की पुष्टि परमाणु ऊर्जा की अंतरराष्ट्रीय एजेन्सी ने अपनी बारमबार की रिपोर्टों में की है।

बहरहाल जब यूरोपीय देशों ने अपने वचनों पर अमल नहीं किया तो ईरान ने उन्हें अपने वचनों पर अमल करने के लिए 60 दिन का समय दिया और यूरोप को चेतावनी दी कि अगर उसने 60 दिनों के अंदर अपने वचनों पर अमल नहीं किया तो ईरान अपनी परमाणु प्रतिबद्धताओं को कम करने की दिशा में कदम उठायेगा।

यूरोप को दिया गया 60 दिन का समय भी खत्म हो गया परंतु यूरोप टस से मस नहीं हुआ और उसके सिर पर जूं तक नहीं रेंगी और वह ईरान को “इंस्टेक्स” नामक वित्तीय लेन- देन सिस्टम का लालीपाप दिखाकर आना- कानी करता रहा यहां तक कि ईरान के धैर्य का बांध टूट गया और उसने जब अपनी परमाणु प्रतिबद्धताओं को कम करने की दिशा में कदम उठा लिया तो यूरोपीय देशों की ख़ामोशी टूटी और उसने कहा कि ईरान को परमाणु समझौते के प्रति कटिबद्ध रहना चाहिये।

सवाल यह है कि जब ट्रंप इस अंतरराष्ट्रीय समझौते से निकले थे तो यूरोपीय देशों ने उनकी निंदा क्यों नहीं की थी केवल खेद जताकर रह गये और एक वर्ष से अधिक की अवधि में इन देशों ने परमाणु समझौते के किसी एक अनुच्छेद पर भी अमल नहीं किया और जब ईरान ने अपनी परमाणु प्रतिबद्धता कम करना आरंभ कर दिया तो इन देशों ने आसमान सिर पर उठा लिया और परमाणु प्रतिबद्धता का राग अलापना आरंभ कर दिया और वे इस तरह से बात कर रहे हैं मानो ईरान परमाणु समझौते का उल्लंघन कर रहा हो जबकि ईरान परमाणु समझौते पर पूरी तरह अमल कर रहा है और वह उस अधिकार का प्रयोग कर रहा है जिसका परमाणु समझौते के अनुच्छेद 26 और 36 में उल्लेख किया गया है।

परमाणु समझौते के सदस्य देशों विशेषकर यूरोप को यह जान लेना चाहिये कि ताली दोनों हाथ से बजती है एक हाथ से नहीं और परमाणु समझौता एकपक्षीय नहीं बल्कि बहुपक्षीय है। विचित्र विडंबना है कि किसी ने परमाणु समझौते से निकल कर इसका उल्लंघन किया तो किसी ने इसमें रहकर इसका उल्लंघन किया।

दूसरे शब्दों में अमेरिका और यूरोप दोनों ने परमाणु समझौते का उल्लंघन किया और रोचक बात तो यह है कि परमाणु समझौते पर अमल न करने वाले इस समझौते पर अमल करने वाले देश से कह रहे हैं कि वह परमाणु समझौते के प्रति कटिबद्ध रहे।

बहरहाल अगर यूरोप की कथनी और करनी को देखकर यह कहा जाये कि उल्टा चोर कोतवाल को डांटे तो ग़लत न होगा और यूरोप और अमेरिका एक ही सिक्के के दो रूप हैं

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