इतिहास

तुर्क तारीख़ी सीरीज़ : “अल्लाह के सिपाही ” – पार्ट 21 से 25 तक!

Parvez Ansari
HOMOEOPATHIC DOCTOR
Lucknow, Uttar Pradesh

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#तुर्क_तारीखी़_सीरीज़
अल्लाह के सिपाही – कि़स्त 21
20 जुलाई 1402 ईस्वी को तैमूर अपना लश्कर ए जर्रार लेकर सुबह फ़जर के वक़्त आगे बढा़ और उस्मानी फौ़ज पर हमला कर दिया – एक तो तैमूरी फौ़ज की तादाद बायजी़द की फौ़ज से बहोत ज़्यादह थी दूसरे बायजी़द के फौ़जी पानी न मिलने से परेशान थे – फिर भी घमसान की जंग हुई और रात तक जारी रही – रात हो जाने के बाद बायजी़द के सिपाही कमजो़र पड़ गए – उन फौ़जियों में जो तातारी थे वह मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए – बायजी़द खु़द बडी़ बहादुरी से लडे़ लेकिन आखि़रकार उनके हिस्से में शिकस्त आई और तैमूर फ़तहयाब हुआ –
बायजी़द इस जंग में गिरफ़्तार हुए – यहां पर मोर्रिखी़न की अलग अलग राय है – कुछ ने लिखा है कि तैमूर ने एक पिंजरा बनवाया था जिसमें बायजी़द को रखा था और जहाँ जाता था उस पिंजरे को अपने साथ ले जाता था – लेकिन कुछ ने लिखा है कि उसने एक पालकी ( डोली ) बनवाई थी जिसमें बायजी़द को कै़द रखा था – बायजी़द का एक साल तक उस पिंजरे में कै़द रहने के बाद सन 1403 ईस्वी को इन्तेका़ल हो गया – बहोत से मोर्रिखी़न ने लिखा है कि बायजी़द के मरने की ख़बर सुनकर तैमूर जैसा जा़लिम और सख़्तदिल शख़्स भी रो दिया था –
तैमूर के मुका़बले में बायजी़द की नाकामी की वजह उनकी जल्दबाजी़ और अपने मुका़बिल की कू़वत का सही अन्दाजा़ न कर पाना था – दूसरे पानी की कमी की वजह से जो उनके फौ़जी अफ़सरों ने जंग न करने की सलाह दी थी उसको न मानना था –
मग़रिब की ईसाई हुकूमतें तैमूर की कामयाबी और बायजी़द की गिरफ़्तारी की ख़बर सुनकर खु़शी से झूम उठीं क्योंकि अगर बायजी़द कु़स्तुन्तुनिया फ़तह कर लेते तो पूरा यूरोप ख़तरे में आ जाता – इंग्लैंड , फ़्रांस वगै़र मुल्कों के बादशाहों ने तैमूर को मुबारकबाद के ख़त लिखे – यूरोप को यकी़न हो गया कि उस्मानी ख़तरा जिससे वह एक अरसे से डरे और सहमे हुए थे वह हमेशा के लिये टल गया –
बायजी़द की मौत के बाद तैमूर ने महसूस किया कि सारी इस्लामी दुनिया मुसलमानों के यूरोप की तरफ़ बढ़ते क़दमों को रोक देने की वजह से उसपर लान तान कर रही है – तैमूर ने अपने आप को इस इल्ज़ाम से बरी करने के लिये एशिया ए कोचक की ईसाई हुकूमतों पर ज़रब लगाई और बहोत से मुसलमान अमीरों को उनकी अमारत वापस करके इस दाग़ को धोने की कोशिश की –
सल्तनत ए उस्मानिया पर सही मायनों में ज़वाल उस वक़्त आया जब बायजी़द के बेटों के दरमियान तख्त के लिये तनाजा़ उठ खडा़ हुआ और यह खा़नाजंगी दस साल 1403 से लेकर 1413 तक चलती रही –
बायजी़द के पांच बेटे थे जिनमें बडा़ बेटा अर्तुग़रल सीवास की जंग में शहीद हो गया था – बाकी़ के चार बेटे अंगूरा की जंग में बाप के शाना ब शाना लडे़ थे – इनमें एक लड़का जिसका नाम मुस्तफा़ था उसके बारे में गुमान किया जाता है कि वह इस जंग में मारा गया – दूसरा बेटा सुलैमान अपने बाप के साथ तैमूर की फौ़ज के हाथों गिरफ़्तार हुआ – बाकी़ के दो बेटे भागने में कामयाब रहे –
तैमूर ने सल्तनत ए उस्मानिया को जड़ से ख़त्म कर देने के लिये बायजी़द के तीनों बेटों को आपस में लडा़ देने के मक़सद से सुलैमान को रिहा कर दिया !!


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अल्लाह के सिपाही – कि़स्त 22
जब खु़श्क व तर सब जलकर राख हो गया तो तैमूर अपने लश्कर को लेकर आगे बढ़ गया और अपने पीछे शहरों को इस हाल में छोडा़ कि वह सब बुरी हालत में वीरानों का मंज़र पेश कर रहे थे – ला का़नूनियत और बदहाली जैसे सदियों से इन शहरों का मुक़द्दर थी –
सल्तनत ए उस्मानिया की तारीख़ में यह मरहला मुसीबत और आज़माइश का था जिसे फ़तह कु़स्तुन्तुनिया के पहले लाज़मन आना था – यह इलाही का़नून है कि वह किसी कौ़म को ग़लबा और इक़्तेदार अता नहीं करता जबतक उसे मुसीबत और आज़माइश के मुख़्तलिफ़ मरहलों से न गुजा़र ले –
उम्मत ए मुस्लिमा के लिये भी अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त का यही का़नून है जिससे फ़रार की कोई सूरत नहीं – सो अल्लाह करीम की मशीय्यत थी कि वह अहल ए ईमान को आज़माए, उनका सख़्त इम्तेहान ले ताकि उनके ईमान में कोई कमी कोई खोट बाकी़ न रहे – अल्लाह तआला का इर्शाद है –
क्या लोग यह ख़याल करते हैं कि उन्हें सिर्फ़ इतनी बात पर छोड़ दिया जाएगा कि वह कहें कि हम ईमान लाए और उन्हें आज़माया नहीं जाएगा – और बेशक हमनें आज़माया था उन लोगों को जो इनसे पहले हो गु़ज़रे – पस अल्लाह तआला ज़रूर देखेगा उन्हें जो ( ईमान के दावे में ) सच्चे थे और ज़रूर देखेगा ईमान के झूठे दावेदारों को – सूरह अनकबूत – आयत – 1, 2 , 3
सल्तनत ए उस्मानिया दस साल तक इसी आज़माइश से गु़ज़रती रही – आखि़र दस साल की अफ़रा तफ़री के बाद सन् 1413 में सुल्तान बायजी़द का छोटे बेटे मुहम्मद ने सारी बगा़वतों और सारी सारी खा़नाजंगी पर का़बू पाया और 1413 में तख़्त नशीन हुए – यह सुल्तान मुहम्मद अव्वल ( प्रथम ) के नाम से मशहूर हुए –
सुल्तान मुहम्मद की हुकूमत का आठ सालह दौर अन्दरूनी बगा़वतों को दबाने , खा़नाजंगी पर ग़लबा हासिल करने और एक तबाह हाल हुकूमत की बुनियादों को मज़बूत करने में गु़ज़र गया – लेकिन उन्होंने जिस खू़बी और महारत से हालात पर का़बू पाया उससे उनके हलम व बुर्दबारी का पता चलता है –
उनकी हुकूमत के दौरान एक बहोत बडा़ फि़तना उठा जिसका नाम बदरुद्दीन था जो बहोत बडा़ आलिम था लेकिन जिसने उम्मत में ग़लत अका़एद का बीज बोया !!

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अल्लाह के सिपाही – कि़स्त 23
शेख़ बदरुद्दीन महमूद बिन इस्राइल जो इब्ने का़जी़ सीमावन के नाम से मशहूर था, बिलाद ए रूम के सीमावना कि़ले में पैदा हुआ जो एडरियानोपुल का एक देहात था और तुर्की के उस हिस्से में था जो यूरोप में है – उसका बाप यहां का का़जी़ था –
बदरुद्दीन ने कु़रआन हिफ़्ज़ करने के बाद मिस्र जाकर दीनी इल्म हासिल किया फिर वहां से मक्का गया वहां भी तालीम हासिल की – वहां से वापस आकर तबरेज़ गया – वहां तैमूर से मिला – तैमूर ने उसकी बडी़ इज़्ज़त आफ़जा़ई की और बहोत दौलत दी – वहां से वापस आकर सुल्तान मुहम्मद के भाई मूसा के पास गया – मूसा ने उसे का़जी़ अस्कर यानी फौ़ज का का़जी़ बना दिया –
यहां से उसने इस्लाम में नए नए अका़एद ईजाद करने शुरू किये और लोगों को अपने ग़लत और फा़सिद मज़हब की दावत देना शुरू की – वह मुस्लिम और गै़र मुस्लिम के दरमियान अकी़दे में किसी फ़र्क़ का काएल नहीं था – उसका कहना था कि सब इन्सान भाई भाई हैं और इस लिहाज़ से सबका मज़हब एक है –
उसकी इस दावत पर बहोत से जाहिलों और इब्नुल वक़्त लोगों ने लब्बैक कहा और उसके बहोत से मुरीद बन गए उसके मुरीदों में एक शख़्स का नाम बहोत मशहूर हुआ जिसे पीर कु़लैजह मुस्तफा़ कहा जाता था – उसके अलावा एक शख़्स तूरह कमाल जो यहूदी था वह भी उसके मुरीदों में था – उसने इस बातिल मज़हब का नाम ” वहदत उल अदयान ” ( सभी दीन एक हैं ) रखा –
जब उसका यह बातिल मज़हब काफ़ी फैल गया और उसकी पैरवी करने वाले बहोत ज़्यादह हो गए तब इस बातिल मज़हब की इत्तेला सुल्तान मुहम्मद को हुई – सुल्तान मुहम्मद ने अपने एक सालार को लश्कर देकर उसको गिरफ़्तार करने भेजा – पीर कु़लैजह भी मुका़बले पर आ गया – इस लडा़ई में सुल्तान मुहम्मद के लश्कर को शिकस्त हुई और सिपहसालार मारा गया – उसके बाद सुल्तान मुहम्मद ने अपने वजी़र बायजी़द पाशा को एक और लश्कर देकर रवाना किया जिसने पीर कु़लैजह से जंग की और उसे गिरफ़्तार किया –
बदरुद्दीन फ़रार हो गया था लेकिन सुल्तान के मुख़बिरों ने उसे ढूंढ निकाला –
आखि़र शरई का़नून के तहत का़जी़ ने उसे मौत का हुक्म सुनाया और इस तरह सुल्तान मुहम्मद ने उस बातिल नज़रिये को ख़त्म किया जिसकी तबलीग़ बदरुद्दीन कर रहा था –
सुल्तान मुहम्मद ने जब इन सारे फि़तनों पर का़बू पा लिया तो उन्होंने मुल्क के अन्दरूनी निजा़म को बेहतर बनाने पर तवज्जो की लेकिन उनको ज़्यादह वक़्त नहीं मिल सका और वह बीमार हो गए – उनका बेटा मुराद उस वक़्त सरहदी इलाके़ में मुहिम पर था – सुल्तान मुहम्मद ने अपने वजी़र बायजी़द पाशा को बुलाकर हिदायत दी कि मैनें अपने बेटे मुराद को अपना नायब मुक़र्रर किया है – उसकी इताअ़त करना और उससे उसी तरह मुख़्लिस रहना जिस तरह मुझसे रहे –
मैं चाहता हूं कि तुम मुराद को मेरे पास ले आओ क्योंकि अब मैं बिस्तर से उठ नहीं सकूँगा – अगर मुराद के आने से पहले हुक्म ए इलाही आ जाए तो उसके आने तक मेरी मौत का ऐलान न करना –
1421 ईस्वी को सुल्तान मुहम्मद अव्वल का इन्तेका़ल हुआ – उस वक़्त उनकी उम्र 43 साल थी – मुराद उनके इन्तेका़ल के चालीस या इकतालीस दिन बाद एडरियानोपुल पहुंचे – वजी़र बायजी़द पाशा ने हुकूमत की चाबियां उनके हवाले कर दीं !!


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अल्लाह के सिपाही – कि़स्त – 24
मुराद सानी ( द्वितीय ) अपने वालिद सुल्तान मुहम्मद की वफा़त के बाद 1421 ईस्वी में सुल्तान बने – उस वक़्त उनकी उम्र 18 साल थी – लेकिन उस कमसिनी के बावजूद वह एक अजी़म फ़रमांरवा साबित हुए – मुराद सानी को अपने आबा व अजदाद की तरह जिहाद फी़ सबीलिल्लाह और इस्लाम की दावत को यूरोप के इलाको़ं तक पहुंचाने का बडा़ शौक़ था –
सुल्तान मुराद सानी ने तख़्त पर बैठने के बाद पहले यूरोप के छोटे छोटे इलाके़ फ़तह करने शुरू किये और इसमें कामयाबी हासिल की और बहोत थोडे़ अरसे में अपने दावत ए जिहाद को जारी रखते हुए अल्बानिया और हंगरी के तमाम इलाको़ं को जे़र कर लिया –
सुल्तान मुराद सानी के यूरोप की तरफ़ बढ़ते क़दमों को रोकने के लिये एक बहोत बडा़ सलीबी मुआहिदा अमल में आया जिसपर पोप की तरफ़ से पुश्तपनाही की गई – इस मुआहिदे का मक़सद पूरे यूरोप से उस्मानियों को निकाल बाहर करना था – इस मुआहिदे में हंगरी , पोलैंड , सर्बिया , जिनेवा , बन्दकि़या , बाज़न्तीनी शहन्शाह , जर्मनी और स्लोवाकिया की फौ़जें शामिल थीं – इन इत्तेहादी फौ़जों की क़यादत एक निहायत तजुर्बेकार जरनैल यूहन्ना हन्यादी कर रहा था –
हन्यादी सलीबी फौ़ज की क़यादत करते हुए आगे बढा़ और दक्खिन की तरफ़ दरिया ए डैन्यूब से गुज़रते हुए उस्मानियों पर हमला कर दिया – 1442 ईस्वी में उस्मानी फौ़जों को एक के बाद एक दो शिकस्तों का सामना करना पडा़ – उस्मानियों ने मजबूरन सुलह की पेशकश की –
सेज़जादन में बीस साल के लिये सुलह का मुआहिदा लिखा गया – इस मुआहिदे के तहत उस्मानी हुकूमत सर्बिया से ख़त्म हो गई और उसपर जॉर्ज बानकोफि़श की हुकूमत को तसलीम कर लिया गया – यह मुआहिदा हंगरी और तुर्की दोनों ज़बानों में लिखा गया था – लाडीसला के बादशाह ने इंजील की क़सम खाई और सुल्तान मुराद ने कु़रआन पाक की क़सम खाई कि इस मुआहिदे की पाबंदी करेंगे –
सुल्तान मुराद जब यह मुआहिदा करके अनाजू़ल की तरफ़ वापस हुए तो उनको अपने बडे़ बेटे अलाउद्दीन के इन्तेका़ल की ख़बर मिली – सुल्तान को बेटे की जुदाई का बडा़ सदमा हुआ और उनका दिल दुनिया से उचाट हो गया – उन्होंने हुकूमत की बागडोर अपने छोटे बेटे मुहम्मद के सिपुर्द कर दी – मुहम्मद की उम्र उस वक़्त 12 साल थी – कुछ इतिहासकारों ने 14 साल लिखी है – सुल्तान ने अपने तजुर्बेकार वजी़रों और भरोसे के लोगों को हुकूमत का निगरां बनाया – यह सारे बन्दोबस्त करने के बाद सुल्तान मग़नीसिया चले गए ताकि वह अपनी बाकी़ उम्र तन्हा रहकर याद ए इलाही में गुजा़र दें –
सुल्तान को मग़नीसिया में अभी ज़्यादह अरसा नहीं गुज़रा था कि कार्डीनाल सीज़र सुल्तान से अहदशिकनी की दावत लेकर उठ खडा़ हुआ – उसने इस बात का अहद किया कि यूरोप से उस्मानियों को निकाल कर रहेंगे – उसके इस इरादे की एक वजह यह भी थी कि सुल्तान अपना तख़्त अपने कमसिन लड़के को देकर गए हैं जिसे कोई तजुर्बा नहीं था –
उसने यूरोप में इस बात को मशहूर किया कि मुसलमानों से अमन का जो मुआहिदा हुआ था वह बातिल है क्योंकि अहद करते वक़्त पोप से मशवरा नहीं किया गया था !!


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अल्लाह के सिपाही – कि़स्त 25
मुआहिदा तोड़ने के बाद ईसाइयों ने बल्गा़रिया में बहर ए असवद पर बसे हुए एक शहर फा़रना का मुहासरा कर लिया और एडरियानोपुल की तरफ़ बढे़ – फा़रना उस्मानियों ने फ़तह किया था –
सुल्तान के वजी़रों को जैसे ही ईसाई फौ़जों की पेशक़दमी की ख़बर हुई उन्होंने फौ़रन सुल्तान को ख़त लिखकर सुल्तान को एडरियानोपुल पहुंचने की दरख़्वास्त की – सुल्तान अपनी ख़लवत से बाहर आए और एडरियानोपुल के लिये रवाना हो गए – उन्होंने जिनेवा के समन्दरी बेडे़ से एक मुआहिदा किया कि वह उस्मानी फौ़ज के चालीस हजा़र सिपाहियों को एशिया से यूरोप के उन इलाको़ं में पहुंचाएं जो सलीबी बेडे़ की नज़र में हैं – इसके लिये हर फौ़जी को पहुंचाने के लिये एक दीनार तय हुई –
सुल्तान के एडरियानोपुल पहुंचते ही अगले दिन कोसोवो के मैदान में जंग छिड़ गई जो 17 अक्टूबर सन् 1448 को शुरू हुई और तीन रोज़ तक जारी रही – दोनों तरफ़ के सिपाहियों ने तलवार और नेजे़ के खूब जौहर दिखाए – तीसरे रोज़ सुल्तान मुराद सलीबी लश्कर के दरमियान में पहुंच गए और सलीबी फौ़ज के सिपहसालार हंगरी के बादशाह लीडसलास तक पहुंच गए – खौफ़नाक लडा़ई के बाद सुल्तान ने लीडसलास के पेट में नेजा़ उतार दिया – वह घोड़े से गिरा और एक सिपाही ने आगे बढ़कर उसका सर काट लिया और अपने नेजे़ पर टांग कर अल्लाहु अकबर का नारा लगाया – यह मंज़र देखकर ईसाइयों के पांव उखड़ गए –
कोसोवो की जंग में कामयाबी के बाद सुल्तान फिर मग़नीसिया वापस चले गए और इबादत व रियाज़त में मशगू़ल हो गए –
सुल्तान को मग़नीसिया गए हुए ज़्यादह अरसा नहीं गुज़रा था कि उस्मानी फौ़ज के उस हिस्से ने बगा़वत कर दी जिसे यनी चरी कहते थे – ( यनी चरी का जि़क्र पहले हो चुका है ) बगा़वत बहोत बडी़ थी – उस बगा़वत को दबाने के लिये सुल्तान को फिर वापस आना पडा़ – सुल्तान के आते ही बगा़वत ठंडी पड़ गई –
अब सुल्तान ने एक बार फिर हुकूमत अपने हाथ में ले ली और अपने बेटे मुहम्मद को अनाजू़ल भेजा और मग़नीसिया की हुकूमत मुहम्मद के सिपुर्द कर दी –
मग़नीसिया से वापस आने के बाद सुल्तान मुराद सानी ने तीन साल और हुकूमत की और 1451 ईस्वी में 47 साल की उमर में फौ़त हुए और अपनी वसीयत के मुताबिक़ बोरसा की जामा मस्जिद मुराद के पहलू में दफ़न किये गए – इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊ़न
सुल्तान मुराद सानी ने यह भी वसीयत की थी कि मेरी क़बर पर मक़बरा न बनवाया जाए बल्कि क़बर के आस पास कमरे बनवाए जाएं जिनमें हाफि़ज़ ए कु़रआन हज़रात रहें और दिन रात कु़रआन की तिलावत होती रहे – इसी के साथ ग़रीब और यतीम बच्चों के लिये मदरसा तामीर कराया जाए –
सुल्तान मुराद के बाद वह खु़शकि़स्मत तरीन शख़्स सुल्तान बना जिसे रसूल अल्लाह स. अ. व. की उस मुबारक पेशनगोई को पूरा करने का शर्फ़ हासिल हुआ जिसमें हुजू़र स. अ. व. ने फ़रमाया था कि ” तुम ज़रूर कु़स्तुनतुनिया फ़तह कर लोगे, यकी़नन उसका अमीर बहोत बेहतर अमीर होगा और वह लश्कर बहोत बेहतर लश्कर होगा ” उनकी मग़फि़रत होगी – मुसनद अहमद – जिल्द 4 सफा़ 335
सहीह बुखा़री – जिहाद का बयान – हदीस न. 2924

जारी ——

 

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