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माफ़ कीजियेगा दोस्त, न शेर भद्दा है, न आज़म ख़ान गिरे हुए इंसान हैं, बाक़ी आपकी स्वतंत्रता है!

आज़म ख़ान : तू इधर उधर की ना बात कर, यह बता की क़ाफ़िला क्यों लूटा ।

स्पीकर : आप भी इधर उधर देखकर मत बोलिए, मेरी तरफ़ देखकर बोलिए ।

आज़म ख़ान : मुझे आप इतनी अच्छी लगती है, इतनी प्यारी लगती है की में आपकी आँखो में आँखे डालकर बोलता रहूँ ।

स्पीकर : ( हँसते हुए ) में आपकी छोटी बहन हूँ ।

आज़म ख़ान : (गंभीरता से)आप इतनी अच्छी जगह बैठी है, आप सम्मानीय है, मेरी छोटी बहन है।
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इसमे आ, आज़म खान गलत कहाँ है।स्पीकर की बात पर उन्होंने उसी अंदाज़ में अपनी बात रखी है। जब स्पीकर ने रूपक छोड़ कर साफ सुथरे अंदाज़ में खुद को बहन कहा तो आज़म खान ने बिना झिझक छोटी बहन माना।
इसे अमर्यादित, महिला विरोधी कहने वाले तब कहाँ मर गए थे जब एक नंगे मुनि को भाजपाइयों नेमहिला विधायकों के समक्ष हरियाणा विधानसभा में उतार दिया था। तब ये कहाँ थे जब हिमांचल के भाजपा नेता ने राहुल गया गांधी को मँच से “मादर.. चो” कहा था।खुद प्रधानमंत्री मोदी जी सदन में काग्रेस नेत्री को संकेत में सूर्पनखा कह चुके है। सदन से बाहर ये सोनिया गांधी को जर्सी गाय घोषित कर चुके हैं।

इनकी बेशर्मी की जाने कितनी मिसालें हैं, मगर ये वोट के सौदागर हैं। उनको टारगेट करने का एक ही मतलब है कि वो भारत के उस जमात के हैं जिनपर शोर मचा कर धर्म की राजनीति की जाती है। ये तो सत्ता के लिए राम का नाम बेच देने वाला गिरोह है। इनसे बच कर रहना होगा।

माफी मत मांगो आज़म खान
साथ खड़ा है बिन्दुस्तान।

Nazeer Malik

माफ़ कीजिएगा दोस्त, न शेर भद्दा है, न आज़म ख़ान गिरे हुए इंसान हैं। बाक़ी, आपकी स्वतंत्रता है। हाँ, उनकी कुछ बातों से असहमत हुआ जा सकता है। हालिया विवाद पर जो कुछ कहना था, कह चुका हूँ, उससे इतर चंद बातें:

‘विवादास्पद’ नेता आज़म ख़ां मुझे शुरू से पसंद हैं। कई वजहें हैं, एक तो उन्हें दलाल पत्रकारों के आगे झुकते नहीं देखा, दूसरा बहुत सलीक़े से वो बोलते हैं भले आप किसी और दिशा में उसे मोड़ दें। इस देश को आज़म ख़ां जैसे सियासतदां ही चाहिए, तभी लंपटों को करारा जवाब दिया जा सकता है। गाभिन बातों से तो मनबढ़ू लोग और आग उगलेंगे। हाँ, कुछ प्रसंगों में वो सचेतन ढंग से अतिरिक्त एहतियात बरतें, तो उनकी शख्सियत मुकम्मल हो जाएगी। बहरहाल, उनके लिए एक शेर:

‘ग़ालिब’ बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे

 

 

एक बार एक पत्रकार ने कहा, “नेताजी कहते हैं कि अमर सिंह उनके दिल में रहते हैं”, तो आज़म ख़ां का जवाब सुनिए, “दिल में ही रहें, बाहर न आएं”। यह विट और ह्युमर आज की तारीख़ में दुर्लभ है जबकि लोकतंत्र को मसखरातंत्र में तब्दील करने की कवायद जारी है। वे अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी स्ट्युडेंट्स’ युनियन के सेक्रेटरी भी रहे। अपने क्षेत्र में उन्होंने मौलाना जौहर अली के नाम पर एक क़ायदे की लाजवाब युनिवर्सिटी खोली। ऐसा शानदार इदारा क़ायम करने का विज़न आज कितने नेताओं के पास है? वह युनिवर्सिटी, जिसको बड़े जतन से उन्होंने बनाया, उस पर भी मौजूदा केंद्र और सूबे की सरकार की गिद्धदृष्टि जमी हुई है।

नोट: जिन्हें आज़म ख़ां से चिढ़ है, वो उन्हें पहले सुन लें, जान लें, शिकायत दूर हो जाएगी अगर पूर्वाग्रह को परे रख दें तो। मैंने उनके लगभग सारे इंटरव्यूज़ और भाषण सुन लिए हैं। वो बहुतों से बहुत बेहतर लगे।

Jayant Jigyasu

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