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वह दिन ज़रूर आयेगा जब आने वाली पीढ़ियाँ इतिहास के पन्ने में इस खूनी फ़ासिस्ट, साहित्य-संस्कृति के “महारथियों” के कुकर्मों के बारे में पढ़ेंगी

Kavita Krishnapallavi
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एक दिन वह वक़्त ज़रूर आयेगा जब आने वाली पीढ़ियाँ इतिहास के पन्ने पलटेंगी और शर्म, गुस्से और अफ़सोस के साथ हमारे इस अँधेरे समय में, इस खूनी फासिस्ट घटाटोप में, साहित्य-संस्कृति के हमारे “महारथियों” के कुत्सित कुकर्मों के बारे में पढ़ेंगी I घृणा से सराबोर होकर वे पढ़ेंगी कि देश में सड़कों पर जब बर्बरों की भीड़ ‘मॉब लिंचिंग’ कर रही थी, जब धर्मोन्माद और अंध-राष्ट्रोन्माद बहुतेरे आम नागरिकों के भी सिर पर चढ़कर प्रेत-नृत्य कर रहा था, जब लोग “विकास” के नाम पर बन्दूक की नोक पर दर-ब-दर किये जा रहे थे, जब पूँजी के रथ के खूनी पहिये घरघर करते हुए उजरती गुलामों को रौंदते हुए पूरे देश में घूम रहे थे, जब गलियों में लहू बह रहा था और बस्तियों से नफ़रत की लपटें उठ रही थीं; उससमय हमारे देश के कवि-लेखक गण, और उनमें “वामपंथी” भी शामिल थे, रस-रंजन करते हुए साहित्य की अंदरूनी राजनीति पर चेमगोइयाँ कर रहे थे, आपसी हिसाब-किताब निपटा रहे थे, पद-पुरस्कार-सम्मान के लिए कुलाबे भिड़ा रहे थे, लम्पटई कर रहे थे और कला की देवी के साथ रंगरलियाँ मना रहे थे ! देश में फासिज्म की आमद तो पूँजीवाद की आन्तरिक गति और उसके संकट से हुई है ! पर शर्म की बात यह है कि साहित्य को कैरियर की तरह लेने वाले लोग अपनी कायरता, मौक़ापरस्ती, स्वार्थपरता, सुविधाभोग,सम्मानलोलुपता, नीचता और कमीनगी के साथ सरेआम सड़क पर नंगे हो गए हैं !

केन सारो वीवा नाइजीरिया का वह साहित्यकार था जो अपने देश की भ्रष्ट निरंकुश तानाशाही और खूनी ‘शेल’ कंपनी के ख़िलाफ़ ओगोनी लोगों के जीने के अधिकार को लेकर सड़कों पर उतरा था I वह जानता था कि उसे इसकी कोई भी कीमत चुकानी पड़ सकती है, पर वह अपने विश्वासों से डिगा नहीं ! अंततोगत्वा ज़ालिम हुक्मरानों ने उसे फाँसी चढ़ा दिया I केन सारो वीवा की डायरी का आख़िरी इन्दराज तमाम कायर-निठल्ले-यशकामी किताबी कीड़ों को आईना दिखाने वाला है, हालाँकि शर्म भला उन्हें क्योंकर आयेगी ! उसे तो वे कभी का घोलकर पी चुके हैं ! फिर भी डायरी के उस इन्दराज को मैं यहाँ इस मक़सद से उद्धृत कर रही हूँ कि फिर भी जिनका ज़मीर बचा होगा उनके भीतर कुछ तो हलचल मचेगी, जो एकदम मुर्दा नहीं हो गए होंगे उनमें कुछ तो हरकत होगी !

“मेरी यह धारणा है कि नाइजीरिया जैसी संकटकालीन स्थिति में साहित्य अलग नहीं हो सकता I वास्तव में लेखक केवल मन बहलाने के लिए नहीं लिखेंगे या समाज के प्रति सिर्फ़ आलोचनात्मक नज़रिया रखकर हतबुद्धि नहीं बनायेंगे, बल्कि दखलंदाज़ी के जरिये समाज की सेवा करेंगे I

“मेरा अनुभव यह रहा कि चूँकि बहुत थोड़े से लोग लिख-पढ़ सकते हैं लिहाज़ा अफ़्रीकी सरकारें बड़े आराम से लेखकों की उपेक्षा कर सकती हैं I अतः लेखकों को अवश्य ही कार्रवाई करने वाला बुद्धिजीवी — ‘इहोमे एन्गेजे’ होना पडेगा I उन्हें अवश्य ही जनता से सीधा संपर्क करना पड़ेगा और अफ़्रीकी साहित्य की ताक़त — ज़ुबान की वाग्मिता का सहारा लेना पड़ेगा I

” … … नाइजीरिया के जैसी संकटकालीन स्थिति में जब किराए के गुंडे और गँवार देश को धूल में मिला रहे हैं और लोगों को अमानवीय बना रहे हैं उससमय सिर्फ़ बैठे उसे देखना या दर्ज करना बेकार है I”

(केन सारो वीवा की डायरी के पन्ने)

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