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हिंदुत्व समलैंगिक संबंधों की निंदा नहीं करता है : दी हिन्दू कौंसिल यूके

vaia – Tarik Khan
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समलैंगिकता और नजरिया!

✍✍✍… समलैंगिता को लेकर दी हिन्दू कौंसिल यूके ने विस्तार से अपना रुख स्पष्ट किया है व वैज्ञानिक सोच के साथ तालमेल करते हुए कहा कि हिंदुत्व भी समलैंगिक संबंधों की निंदा नहीं करता है। यह हार्मोन्स बदलाव व स्वाभाविक स्वेच्छा से हो तो इसमें कुछ भी बुरा नहीं माना जाना चाहिए!

Freedom at Night नाम से 1975 में एक किताब दो फ्रेंच लेखकों डोमिनिक लेपायर व लेरी कोलिन ने लिखी थी जिसमे नाथूराम गोडसे के भाई के हवाले से लिखा था!

किताब के पेज नंबर 361 पर सावरकर के बारे मे एक लाईन थी उसमे लिखा गया कि-

“He was not addicted to it, but he had been a consumer of opium for years. He was also, although few of his followers were of it, a homosexual. “

इसका मतलब सावरकर को कुछ साल तक अफिम पिने का शौक था और वे समलैंगिक संबंध रखते थे।

उसी किताब के पेज नंबर 366 पर लिखा गया कि….

‘At the age of twenty eight, Godse had finally taken that ancient Hindu vow whose observance had concerened and troubled Gandhi, that of the Brahmacharya, the voluntary renunciation of sex in all its forms. He apparently remained faithful to it for the rest of his life. Before taking it, it had only one know sexual relationship. It was homosexual, His partner was political mentor, Veer Savarkar.’

इसका मतलब नथुराम गोडसे ने ब्रम्हचारी रहने की प्रतिज्ञा की थी और उन्होने उस प्रतिज्ञा का आखिर तक पालन किया। उससे पहले उसे केवल एक ही संबंध के बारे मे जानकारी थी वह यानी समलैंगिक संबंध और उसके लिए उनके साथ थे उनके राजनीतिक गुरू-वीर सावरकर!

इस किताब का मराठी अनुवाद का प्रकाशन सबसे पहले 1977 में अजब पुस्तकालय कोल्हापुर ने किया था व इसमें से यह जानकारी छुपा ली थी। अब इस किताब का अंग्रेजी प्रकाशन नोएडा का विकास पब्लिकेशन करता है जिसमे से यह जानकारी हटा ली गई!

जब यह किताब भारत में आई उस समय हड़कंप मच गया था क्योंकि उस समय आरएसएस के भगवान समझे जाने वाले सावरकर व क्रांतिकारी के बारे में लिखा गया था और आरएसएस ने बवाल खड़ा कर दिया था! उसके बाद सरकार ने इस पर बैन लगा दिया था।

भारत मे छपने वाली किताबों में से पेज नंबर 361 व 366 हटा दिए गए है। Harper Collins Publisher UK से यह किताब अब भी छपती है। यह किताब अमेज़ॉन पर ऑनलाइन उपलब्ध है और मंगाकर पढ़ भी सकते हो!

दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले ने जब धारा 377 हटाई अर्थात समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर किया तो दी हिन्दू कौंसिल यूके ने उसका स्वागत किया था!

समलैंगिकता प्राचीनकाल से रही है। धर्म की धारणाओं, नैतिक नियमो व ऊंचे आदर्शों के बंधन के कारण खुलकर प्रकट नहीं की जा सकी। अब समय बदल रहा है दुनियाँ की सोच बदल रही है तो समलैंगिकता को लेकर धारणाएं भी बदल रही है।

संघी ब्राह्मण नेता प्रदीप जोशी का मामला जब सोशल मीडिया में उछला तो यह किसी भी प्रकार से व्यक्तिगत बदनामी या निजता का मामला नहीं समझा जाना चाहिए। यह उस संगठन की पब्लिक धारणा के विरुद्ध लगा इसलिए लोगों ने इसको उस नजरिये से देखा।आरएसएस ने समलैंगिकता को लेकर न दिल्ली हाइकोर्ट के फैसले के खिलाफ कुछ बोला न उसको सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया!1977 में एक किताब के दो पेज को हटवाने व उस पर बैन लगवाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगवाया था मगर अब लग रहा है कि प्रगतिशील सोच अपनाते हुए स्वीकारोक्ति करेगा!

 

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