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आज से पांच हज़ार साल क़ब्ल हिन्दुस्तान में अरबी ज़बान युधिश्टिर के दरबार में क्यों राएज हुई, जानिये!

हिन्दुस्तान से पैग़म्बरों का ताअलुक़
रिश्ते आज़ल से क़ायम है यह सिर्फ जिस्मानी नही है। बल्कि रुहानी भी होते है। इनका ज़हूर चाहे जब बई हो यह उसूल सिर्फ इन्फेरादी रिश्तों का नही बल्कि क़ौम और गिरोहों का भी है। सिर्फ इन्सानी रिश्तों के लिए नहीं बल्कि हैवानी , नबाताती और जमादाती रिश्तें काभई यही उसूल है कि वह भी अज़ली है। यह एक अलग तफ़सीली मौजू है जिसके साइंटिफिक सबूत हैं हमें फिलहाल यह देखना है कि ज़मानए क़दीम में रसूले अकरम स 0 अ 0 की जाए विलादत अरब और हिन्तुस्तान के दरमियान के दरमियान क्या रिश्ते थे।

1000 क़ब्ल मसीह यमन की एक क़ौम सब ने हिन्दुस्तान से तिजारती तअल्लुक़ात इस्तेवार किये। बम्बई के क़रीब सुपारा नामी एक गांव से अहदे सुलेमानी में (जिनका ज़माना 650 क़ाफ़ 0 मीम है) फिलिस्तीन से तिजारत शुरू हुई। इसी तरह हिन्दुस्तानी मलमल, छींट और रुमाल वग़ैरह अरब में मक़बूल थे.। जिनका ज़िक्र अरबी अशार में मिलता है। खानदाने मोरिया के आन्ध्रा प्रदेश में तमाम क़ुतुबाते आरामी अरबी तर्ज़ में लिखे हुए मिले है। और अशोक के क़ुतुबात भी फराहम हुए हैं।

अब सवाल यह पैदा होता है कि आज से पांच हज़ार साल क़ब्ल हिन्दुस्तान में अरबी ज़बान युधिश्टिर के दरबार में क्यों कर राएज हुई। इसका जवाब यह हो सकता है कि आज से पांच हज़ार साल पेशतर इस मुल्क में दीने इस्लाम का दौर दोरा था।

हिन्तोस्तान की एक और जमाअत भी क़दीम ज़माने से अरब में पायी जाती थी। इसको अरबी बाशिन्दे मेद कहते थे। इसतखरी ने लिखा है कि हुदूदे सिन्ध के तमाम शहरों में कुफ़्फ़ार का मज़हब बौद्ध था। और इनके साथ ही एक क़ौम है जिसे मेद कहा जाता है। जाठ और मेद के बाद हिन्दुस्तान की एक और क़ौम अरब में पायी जाती है वह सबाबजामासबाबचा है। बलाज़री ने फ़ुतुहुल बलादान में और इब्ने ख़ुलदून ने अपनी तारीख़ में बार बार सबाबचा का ज़िक्र किया है। अरब में हिन्दुस्तान की एक और जमाअत ज़मानए कदीम से आबाद थी. जिसे अरब हुमरा, हमर, अहमिर और अहामेरा के लक़ब से याद करते थे। इसी तरह मज़हबी रवाबित और ख़ुसुसन अम्बिया अ 0 की आमद या बेअसत के सिलसिले में हमें मुताअदिद रवायत मिलती है।

अहदे हाज़िर के मुसलमानों में एक आम तसव्वुर यह भी है कि जिन अम्बिया का ज़िक्र कुरआन में है उनका ताल्लुक़ सिर्फ जज़ीरा नुमाए अरब से था। यह दावा करने वाले यह नहीं बताते कि हज़रते आदम हज़रते नूह, अरब, मिस्र, ईराक, शाम के किन हिस्सों में दावत के लिए मबउस हुए थे। इस सिलसिले में मोहक़्क़ीन हज़रात को जो कुछ मिला है हम मुख़तसर पेश कर रहे है।

हज़रते आदम अ 0 और हिन्दुस्तान
यह एक दिलचस्प बात है कि श्रीलंका में कोहेसरान दीप पर एक बड़े पांव का निशान मोजूद है। जिसे बहूत से मज़ाहिब के पैरों मुक़दस मानते है। मुसलमान और ईसाइ इसे हज़रते आदम के पांव का निशान मानते है। बौद्ध मज़हब के पैरब गौतम बुध के पांव का निशान कहते है। और हिन्दू इसे शिव जी के पैर का निशान मानते है। यह अजीबो ग़रीब रवायत बिल्कुल बेबुनियाद भी नही है। इसकी क़ड़ीयां हमें अरबों की तारीख़ में मिलती है।
अहले अरब का यह दावा है कि हिन्दुस्तान से इसका तअल्लुक सिर्फ चन्द हज़ार बरसों का नही है। बल्कि अज़ली तौर पर यह मुल्क इनका पिदरी वतन है। हदीसों और तफ़सीरों मं जहाँ हज़रते आदम के वाक़ेयात है। मुताअदिद रवायतों से भी ज़ाहिर होता है कि हज़रते आदम जब आसमान की जन्नत से निकाले गये तो हिन्दुस्तान की आरज़ी जन्नत पर उतारे गये। श्रीलंका में उन्होने पहला क़दम रखा जिसका निशान इसके एक पहाड़ पर मौजूद है। इब्ने जज़ीर इब्ने अबी हातम ने लिखा है कि हिन्दुस्तान की सरज़मीन का नाम जिसमें आदम उतरे वजना है। क्या यह कहा जा सकता है कि यह वजना दखिना या दखिना या दकखिन है जो जुनूबी हिन्दुस्तान के हिस्से का मशहूर नाम है।
अब एक सबूत तफ़सीर की किताबों से मुलाहेज़ा फ़रमायें। इब्ने अब्बास ने फ़रमाया है कि आदम का तनूर हिन्द में था। यह वाज़ेह रहे कि कुरआन, इंजील और तौरेत से मुफ़स्सेरीन को यह रौशनी अभी तक नही मिल सकी कि आदम दुनिया के किस खित्ते में उतारे गये।
मुन्दरजा बाला रवायात से श्रीलंका में पांव के निशान से यह इशारात मिले है कि हज़रते आदम अ 0 की बेअसत इस सरज़मीन में हो सकती है. हालांकि यह रवायत ज़ईफ़ क़रार दी जाती है। लेकिन यह बात ज़रुर क़बिले गौर है कि दुनिया के किसी और खित्ते के बारे में ऐसा दावा होने की रवायत भी हमें नही मिलती।

हज़रते नूह अ 0 और हिन्दुस्तान
कुरआन से यह हमें मालूम होता है कि तूफाने नूह अ 0 के बाद हज़रते नू की कश्ती कोहे जूदी पर ठहरी जो ईराक़ के इलाके करदिस्तान में है। और बाइबिल से पता चलता है कि कोहे अरारत पर इनकी कश्ती रुकी थी जूदी कोहे अरारात की एक चोटी है। लेकिन आज तक मोफ़स्सेरीन ने यह नही बताया कि कश्ती के रुकने के बाद हज़रते नूह के तब्लीग़ी मराकिज़ दुनिया के कौन कौन से इलाके रहे और यह भी नही पता चल सका कि तूफाने नूह से पहले हज़रते नूह छः सौ साल तक कहां रहें। तौरेत से तो सिर्फ तना मालूम होता है कि हज़रते नूह और उनके साथी बाबुल में इकट्ठा हुए और वहां से पूरी दुनियां में फैले।
इसलिए इसका नाम बाबुल है क्योकि खुदा वन्दे आलम ने वहां पर तमाम अहले ज़मी की ज़बानों को ग़लत खिल्त मिल्त कर दिया था। और वहां से इन (हज़रते नूह और इनके साथियों) के ख़ुदा ने तमाम रुए ज़मीन पर फैलाया तौरेत किताबे पैदाइश 11,9।
क़ुरआन यह कहता है कि तनूर से पानी उबलना शुरू हुआ था और यहां से तूफान की इब्तेदा हुई थी। (तरज़ूमा)
यहां तक कि जब हमारा हुक्म आ पहुंचा और तन्दुर से पानी उबलना शुरू हुआ तो हमने कहा कि इस (कश्ती) में हर किस्म के जोड़ो में से दो दो को चढा तो (सुरए हूद 40)। लफज़े तन्दूर अरबी ज़बान का लफज़ नही है। फ़ारसी में इसका माना रोटी पकायी जाने बाले तनूर के है। बैश्तर मुफ़स्सेरीन ने इस लफ़्ज़ को इन्ही मानों मे इस्तेमाल किया है। और कुछने तनूर से मूराद सतह ज़मीन भी लिया है। यानी ज़मीन की सतह से पानी उबलना शुरू हुआ लफ़ज़े तनूर से पहले कुआन में अलिफ और लाभ इस्तेमाल हुआ है। जिसका मतलब है कि कोई मखसुस तनूर इस सिलसिले में उलमाए कराम की तशरीह लिखी देखी और अगर यह कहा जाये कि अलिफ और लाम तन्दूर में हैं तो इसका जवाब यह है कि यह बइद नहीं कि नूह को वह तन्दुर मालूम हो। हसन बसरी का यह बयान है कि वह तन्दूर पत्थर का था। हज़रते हव्वा इस पर रोंटिया पकाती थी। फिर वह हज़रते नूह के पास आ गया था। और उऩसे कह दिया गया था कि देखो तन्दूर से जब पानी उबल रहा हो तो अपने साथियों को लेकर कश्ती पर सवार हो जाना। लफ़्जें तन्दूर पर बहूत से अक़वाल इकठ्ठा करते हुए अल्लामा शोक़कानी ने लिखा है कि आठवां कौल हो कि वह एक मुक़ाम है। जो हिन्द में है (तफसीरे फतहुल ग़दीर जिल्द 2 सफ़ा 474)। यह बात दिल चस्पी से खाली नही कि रेलवे टाईम टेबल में तनूर नाम का एक मक़ाम केरेला में है और नक़्शे में केरला के मुल्लापुरम ज़िले में समुन्दर के साहिल पर तनूर नाम का एक मकाम वाक़ये है। यह हिन्दुस्तान के मग़रीबी साहिल पर है। जो बहराए अरब के ज़रिए अरब से जुदा होता है। रवायत की रोशनी में क्या यह क्यास किया जा सकता है कि यह वही मक़ाम है जहां से सैलाब नूह के शुरू होने का ज़िक्र कुरआन ने किया है. इससे दुसरे तमाम अक़वाल की ततबीक़ भी हो जाती है। यानी साहिले समन्दर पर तनूर नामी जो मक़ाम है वहां सतहे ज़मीन से पानी उबलना शूरू हुआ था। और यहीं मक़ाम हज़रते आदम का तनूर कहलाया। इससे यह साबित होता है कि हज़रते नूह तूफान से क़ल्ब हिन्दुस्तान में थे। बरसों की तहक़ीक के बाद गुजरात के एक माहिर क़ानूनदा एम ज़मा खोखरा ने यह इनकेशाफ किया है कि आदमे सानी खाके मुजरात में महवे इस्तेराहत हैं। इनके दावे की बुनियाद 240 फिट लम्बा एक मजार है जो गुजरात के इस तारीख़ी शहर से 25 मील दूर मौज़ा बड़ीला शरीफ के नवाह में सदियों से मरजए ख़लाएक़ है। गांव से तक़रीबन एक फरलांग जुनूब में घनी झाड़ियों और छायादार तरख्तों से घिरी स कब्र के बारे में आम तासीर यह है कि हज़रते नूह के बेटे या पोते कबीत का मदफन है। लेकिन एम ज़मा खोखरे ने इल्में कश फुल कुबूर के उलमा की रवायतों से यह साबित किया है कि यह क़बीत नही बल्कि खुद हज़रते नूह हैं। बहुत से उलमाए कश फुल कुबूर और बुजुर्गान के हवाले ताइद में बयान करने के बाद लिखते हैं।
बड़ीला शरीफ एक सरहदी गांव है और गुज़रात से पांच मील दूर जानिबे शिमाल और मशरिक़ क़स्बए टाएंड़ा के नज़दीक वाक़े है। यहां से झम्ब का इलाका शुरू हो जाता है और दरियाए चुनाब व तबई इसके क़रीब ही बहते है। तक़सीम से क़ल्ब हिन्दू, इस मज़ार को मनो मेहरिस्त के नाम से पुकारते थे, मनुमेह रिस्त संस्कृत का लफ़्ज़ है जिसके माना कश्ती वाला है। इबरानी लफ्ज़े नूह से भी यह माना अख़ज़ किया जाते है। संस्क़त की क़दीम किताबो में दर्ज है। कि आदम का एक बेटा पंख पखेरु मे समेट कर एक कश्ती में बुलाता है। तूफाने नूह का ज़िक्र आर्याओं की मज़हबी किलाबों में भी आया है और इस हवाले से यह भी साबित होता है कि अवाएल ही में नूह की औलाद बरसगीर हिन्द तक फैली हुई थी। आइनए गुजरात मे दर्ज है गुजरात के बाशिन्दे हज़रते नूह के बेटे हाम की औलाद हैं और हामियों ने कश्मीर के नवाह में बड़ी बड़ी इमारतें तामीर करायी। इमतेदादे ज़माने से हाम की कब्र के आसार मिट चुके है। लेकिन शहरो और मज़रात की सूरत में इनकी आमद के निशानात यहां के वसीव अरीज़ इलाको में फैले हुए है। बढ़ेला शरीफ के नवाह में मिट्टी के बड़े बड़े तौंदे और टीले इस अम्र के गवाह हैं कि कभी यहां औलादे आदम की आलीशान बस्तियां होंगी।
याक़ूते हमूवी ने लिखा है कि बुकीर बिन यखतिन बिन हाम बिन नूह की औलाद में हिन्द और सिंध नामी दो भाई थे जिनके नाम से यह दोनो मुल्क मशहूर है। इन तूफाने नूह से क़ल्ब और बाद में भी हज़रते नूह का तअल्लुक़ हिन्दुस्तान से था।
हज़रते मूसा और दीगर अम्बिया
ऐ ऐन किगहम की आसारे क़दीमा रिपोर्ट के ज़ैल में यह पता चलता है कि अयोध्या में दो पर्वतों के दरमियान मुसलमानों का मज़हबी मकाम है जो मशरिक़ से मग़रिब तक चौसठ फिट है और इसकी चौड़ाई 47 फिट है इनमें दै मज़ार हैं जिन्हे हज़रते शीश और हज़रते अय्यूब से मनसूब किया जाता है।
एम 0 ज़मा खोखरा जिनका ज़िक्र हम क़ौमी जंग रामपुर के हवाले से करर चुके है के बारे में अखबार मज़ीद लिखता है कि (मुस्लिम इंण्डिया ऊर्दु अप्रैल सन 1988 सफा 15) एम 0 ज़मा खोखरा ने मज़ारे नूह या फ़रज़न्दे नूह के मरक़द के अलावा वसी अरीज़ कबीरों की निशानदेही की है इनके बक़ौल मोज़ा चौगानी मे तानूग़ किनआनी थे। और वह हज़रते युसुफ के बेटे थे आइनये गुजरात में दर्ज है कि क़ाज़ी सुल्तान महमूद ने इल्मे कशफुल कुबूर के ज़रिये गुजरात के आस पास मुताअदिद मज़ारात की निशानदेही की है इनका दावा है कि यह तमाम क़बरे इन तमाम अम्बियाए बनी इस्राइल की है जो औलादे मूसा व इमरान में से थे। क़दीम तारीख़ी हवालों से यह अन्दाज़ा होता है कि गुजरात इल्म व फ़ज़्ल के एतेबार से ख़ित्तए यूनान ही नही बल्कि रुहानियत की निस्बत से पैग़म्बरों का मदफ़न भी है। रवाल शरीफ के मक़ाम पर एक मज़ार है जिसकी लम्बाई आम क़ब्रो से कई फिट ज्यादा है।
इसके बारे में यह कहा जाता है कि यहां आदम के बेटे शीश की औलाद में से एक बुजुर्ग दफन है. पसीर नगर में हमसेयालान की एक तुरबत है. बखते नस्र के हमले के दौरान अपने बेटे समेत क़ैद हुए थे। और बाबूल में असीरी के सत्रह बरस गुज़रने के बाद हिन्दुस्तान चले आये थे। इनके जददे अमजद हज़रते हारुन हैं। क़स्बा टाण्ड़ा में एक इस्राइली सरदार नक़ीब खुशी की क़ब्र है। दिरियाये तवई के किनारे सुल्तान क़ैनूस और फ़नानूस की क़ब्रें है।
यह दोनो हज़रते इब्राहीम के बेटे अफ़रासीम की औलादों में बयान किए जाते है। सुल्तान शनयाउस के बारे में यह मसहूर है कि वह हज़रते दाउद के फ़रज़न्द है। एक नौ गज़ी कब्र मौज़ए रंगड़ा में भी है इन सदियों और क़रनो में क़बरों ने गर अपने तक़ददुस व एहतेराम को बरक़रार रखा है तो सके बारे में यब कहा जा सकता है कि यह पैग़म्बरों के मोअजेज़ात हैं (रोज़ नामा क़ौमी जंग रामपुर 13 मार्च 1988) हज़रते मूसा के बारे में हिन्दुस्तान की जैन क़ौम के रवायात में यह मिलता है कि वह हिन्दुस्तान आये थे। (वव्वाबो आवमो बिस्सवाब)

हज़रते ईसा और हिन्दुस्तान
हज़रते ईसा के हिन्दुस्तान की आमद के बारे में कश्मीर और लद्दाख में बहूत सी रवायतें मशहूर है। रुसी और अंग्रेज़ी मोहक़्क़ेकीन ने भी इसका ज़िक्र किया है। फिलहाल हम हिन्दी ज़बान के मशहूर रिसाले कादिम्बनी मार्च 1976 में छपे आचार्य रजनीश के एक मौजू ईसा की नामालूम जिन्दगी से कुछ एखतेबासात नक़ल कर रहे है जो हिन्दी के बजाये मेरी अपनी ज़बान में है। हिन्दुस्तान में यह यक़ीन करने के कई सुबूत है। कि हज़रते ईसा कश्मीर मे एक बुद्ध मठ में ठहरे रहे। कश्मीर में कहानियां मशहूर है कि ईसा वहां थे। मुराक़ेबे में ग़र्क थे। फिर वह यरुशलम में ज़ाहिर हुए। इस वक्त वह 30 साल के थे।
एक फ्रांसीसी मुसन्निफ अपनी किताब जन्नत का सांप में कहता है कि कोई जानता कि तीस साल में उन्होने क्या किया और कहां कहां रहे। एक रवायत के मुताबिक़ वह काएशर में रहे। रुसी सैयाह नकोलस, फीरोविच जो 1888 के आस पास हिन्दुस्तान आया था लद्दाख गया वहां वह बिमार पड़ गया और मशहूर हन्मेस गुफ़ा में रहा अपने गुफ़ा मे क़याम के दौरान इसने मुताअदिद बुद्ध ग्रथों को पढ़ा।
इसने ग्रंथो मे ईसा उनकी तालीमात और उनके लद्दाख के सफर वग़ैरह के बारे में काफी बयान पाया बाद में उसने एक किताब शायां की उसमें उसनें ईसा के लद्दाख और मशरिक़ के दुसरे मुमालिक के सफर से मुताअल्लिक़ बयानों का ज़िक्र किया है। इनमें बयान यब किया कगया है कि लद्दाख में हज़रते ईसा ऊँचे पहाड़ों के दरों से बर्फीले रास्तों को पार करते हुए पहले गाम कश्मीर पहुंचे वह वहां काफी अरसे तक अपनी भेड़ बकरियों की देखभाल करते रहे।
इसी हिन्दी रिसाले कादमब्नी के सतम्बर 1978 के शुमार में शान्ति कुंज हरिद्धार का एक मज़मून तिब्बती लामा की कुबत में ईसा के उनवान से छापा है। इसके एक़तेबासात भी मुलाहेज़ा फरमाये।
यह तीस साल हज़रते ईसा ने कहां और किस तरह गुज़ारे। यह जानने के लिए आलिमों ने काफी रिसर्च की है। रिसर्च स्कालरों में सबसे आगे रुसी आलिम नूर विच है जिन्होने मुसलसल चालीस साल तक सफर करके रिसर्च की और अपने नताएज 1898 में ईसा की नामालूम ज़िन्दगी नामी किताब की शक्ल में शायां कराया नकोलिस नुरविच अपनी तहक़ीकाती सफर के दौरान तिब्बत भी गये और उन्होने तिब्बत के हमूस बौद्ध विहार में ताड़ के पत्तों पर लिखा हुआ एक क़दीमी ग्रंथ देखा नूरविच ने इस बौद्ध विहार में गुज़ारे अरसे का बयान इस तरह लिखा है कि मै जब एक गुफ़ा मे गया तो वहां के लामा ने एक ऐसे पैग़म्बर के बारे में बताया जिसे वह बुद्ध का ही एक रुप मानता था।
लामा ने उस पैग़म्बर का नाम ईसा बताया है। और कहा हम लोग इस नाम को बड़ी इज़्ज़त के साथ ज़बान पर लाते है। इनके बारे में हमें ज़्यादा मालूम नही लेकिन बडे लामा के पास एक क़दीमी ग्रंथ बहूत कुछ लिखा है। किसी तरह नूरविच ने वह क़दीमी ग्रंथ देखने और उसकी तस्वीर उतारने में कामयाबी हासिल कर ली। इस ग्रंथ मे चौदह बाब है और दो सौ चवालिस श्लोक है।
इसमें ईसा के बारे में यह है कि ह़ज़रते ईसा ज्ञान हासिल करने की ग़र्ज़ के हिन्दुस्तान आये। इन दिनों यरुशलम के क़ाफिले तिजारत के लिए यहां आया करते थे। चुनान्चे वह भी एक क़ाफिले के साथ सिन्ध होते हुए हिन्तुस्तान मे वारिद हुए। ईसा सभी इन्सानो से मोहब्बत किया करते थे और उन्हे भी वैश्य और शूद्र सभी प्यार करते थे। उन दिनों वह जंगनाथपुरी में ठहरे हुए थे।
वहां से पुजारियों को जब पता चला कि ईसा शूद्रों से भी मिलते है तो वह उनसे नाराज़ रहने लग। ईस को पुजारियों की नाराज़गी का पता चला तो वह राज गृह चले गये। छह साल वहां रहे और इसके बाद नेपाल होते हुए तिब्बत पहुंचे। और सोलह साल तक इसी तरह सफर करते हुए ईरान के रास्ते से अपने वतन लौट गये।
भविष्य पर उन्क प्रसंग 3 अध्याय 22 के 21 ता 23 श्लोक तक हिमालय पर ईसा से शकादीश की मुलाक़ात का बयान इस तरह मिलता है कि एक बार शिकादीश हिमालय से आगे होन्टर गये। वहां उन्होने एक सफेद पोश गोरे रंग के सन्त को पहाड़ो पर घुमते देखा। शिकादीश ने इनसे तअर्रुफ चाहा तो सुन्नत ने कहा कि ईसा मेरा नाम है। मैंने कुआरी मां के पेट से जन्म लिया है और मैं गैरे मुल्क़ से आया हुँ। मुझे मसीह कहा जाता है।
मज़कूरा तमाम वाक़ेयात रवायतों के एतेबार से ज़ईफ़ से ज़ईफ हो या कुछ हों मगर इनसे यह बात पाये सबूत को पहुंचती है कि हिन्दुस्तान से पैग़म्बरों का गहरा और मुसलसल तअल्लुक रहा है।
हज़रते आदम से ईसा तक मशहूरों मारुफ अम्बियाए किराम के जो ज़रुरी हालात मैने तहरीर किये है। उनके बारे में यह विज़ाहत कर देना चाहता हुँ कि वह ज़्यादा तर तारीख अबुलफिदा, हयातुल कुलूब, तारीखे तिबरी और तारीखे कामि वग़ैरा मे माखुज़ है।
ज़ाहिर है कि उन अम्बिया के दौर की इत्मिनान बख्श तहक़ीक़ इस दौर के किसी महिक्कि के लिए एक बड़ा ही दुश्वार ग़ुज़ार मरहला है क्योकि उनके दौर की लिखी हुई कोई तारीख कहीं मौजूद नहीं अलबत्ता हिन्दूओं की क़दीम तरीन किताबों मे वेदों के श्लोकों के बारे में भी कुछ रौशनी मिलती है मगर वह ऐसी नहीं है कि उसकी बुनियाद पर हालात ओ वाकिआत की कोई इमारत खड़ी हो सके।
तारीख के तदवीनी सिलसिले के अव्वलीन दौर में मुहक़्कीन ओ मुवर्रखीन ने मुखतलीफ ज़राए ओ क़राएन से अम्बिया के दौर की तजदीद में अपनी कोशिशें सर्फ की लेकिन उनमें उनहें कहां तक कामयाबी मिली है। अल्लाह बहतर जानता है।
अम्बियाए किराम से मुताअल्लिक़ जो हदीसें या रिवायतें पैगम्बरे इस्लाम या आइम्मा अतहार की ज़बानी मज़कूर हुई है कि उनमें उलमा मुहक्केक़ीन और मुफस्सेरीन के माबैन एकतेलाफ नज़र आता है, उनके रावियों पर भी एतबार व एतमाद नही किया जा सकता है। इसलिए जो हालात व वाकेयात मैने कलम बद किये हैं उनमें अगर किसी जगह कोई शुबहा, एतराज़ या तनाकुस हो तो नज़र अंदाज़ करना चाहिए क्योकि जब कुद रसूले अकरम स 0 की विलादत की तारीख़ आज तक मुसलमानों के दरमियान तय नही हो सकी तो हज़रते आदम अ 0 हज़रत इब्राहीम, हज़रते नूह, हज़रते मूसा अ 0 या हज़रते ईसा अ 0 की सही तारीखों का तअय्युन क्योकर हो सकता है।
कुरान मजीद में उन अम्बियाए किराम के इजमाली तज़किरे मौजूद है मगर उनकी विलादत वफात मदफन या उनके ज़माने के बारे में किसी किस्म का कोई ताअय्युन नही किया गया चुनान्चे जिस अन्दाज़ से इस आसमानी किताब में उनके मकारिम इख्लाक़ सिफाते हसना हयाते ज़किया खिदमाते जलीला और इग़राज़े ख़िलकत ओ बेसत के हालात ओ वाकिआत मज़कूर है उसी तरह मैने भी उनका लिहाज़ रखा और उसी उसूल के तहत उनके हालात ओ वाकिआत ज़ेरे कलम आये है।
यह बात क़ाबिले तवज्जो है कि अम्बियाए किराम के हालत ओ वाकिआत बई उन्ही रावियो और मुवर्रिख़ों के ज़रिए हम तक पहुंचे हैं जो ज़माने के मुतअल्लिक भी अजीब ओ गरीब और मज़हका खेज़ ऐसी रिवायतें बयान करते रहे है। जिनकी वजह से इस्लाम का विकार गैर मुस्लिमों के हाथों पहले भी मज़रुह हुआ है और अब भी हो रहा है। मसलन तिबरी की यह रिवायत है किः-
बाज़ लोगों का कहना है कि दुनिया कुल सात हज़ार बरस की है और इब्ने अब्बास से मरवी है कि दुनिया, आकिरत के हफ़तो में से एक हफ्ता है जिसकी मेयाद सिर्फ सात हजार बरस की है नीज़ इस मेयाद में छः हज़ार कुछ सौ बरस गुज़र चुके हैं और कई सौ बरस ग़ुज़र चुके हैं और कई सौ बरस बाक़ी है। और बाज़ लोगों ने कहा है कि ज़माने का मजमूआ सिर्फ छः हज़ार बरस पर मुशतमिल है इसमें छः हज़ार कई सौ बरस गुज़र चुके है।
इसके बाद अल्लामा तिबरी अपनी तहक़ीक़ लिकते है किः- इन दोनों में सही क़ौल अज़रुए हदीस ए पैग़म्बर ,इब्ने अब्बास का है जो उन्होने कहा कि दुनिया ओ आखिरत के हफ्तों मे से एक हफ्ता है जिसकी मीआद सात बरस की है। बस मालूम हुआ कि नबी के इस इसशाद के वक़त तक छः हज़ार की है। बस मालूम हुआ कि नबी के इस इरशाद के वक्त तक छः हज़ार पाँच सौ बरस गुज़र चुके है और तकरीबन पाँच सौ बरस ग़ुज़र चुके है औ तक़रीबन पाँच सौ बरस बाक़ी हैं। (तिबरी जिल्द अव्वल सफा 5 ता 6)
इन दोनों रिवायतों और तिबरी की तहक़ीक़ का ग़लत होना आफताब की तरह रौशन ओ मुनव्वर है इस वक़्त दुनिया के फ़ना होने की मुददत सिर्फ पाँच सौ बरस मान ली गयी और मुस्लमानों ने उसे तसलीम भी कर लिया क्योकि इन रिवायतों के रावी अकाबिरीन सहाबा थे। ज़ाहिर है कि इस वाकिए को चौदह सौ बरस गुज़र चुके है। मगर दुनिया फ़ना नही हुई बल्कि अपनी जगह बरक़रार है।
इन्ही रावियों ने रसूल उल्लाह स 0 अ 0 से खुदा के रहने की जगह भी तज़वीज़ करा दी। चुनान्चे यह तिबरी फरमाते है कि एक शख्स ने यह सवाल किया आंहज़रत से कि या रसूल उल्लाह स 0 अ 0 यह तो बताईये कि दुनिया को ख़ल्क़ करने से पहले खुदा कंहा रहता था। फरमाया एक सियाह अब्र में जिस के नीचे भी हवा थी और ऊपर भी हवा थी फिर खुदा ने अर्श पानी पर पैदा किया (तिबरी जिल्द सफा 16)
यही तिबरी रक़मतराज़ है कि आसमान, ज़मीन और तमाम दरिया एक हैकल में है, हैकल कुर्सी में है। और खुदा के दोनों पांव उस कुर्सी पर है। और वह कुर्सी को उठाये हुए है। जिसकी वजह से कुर्सी कि हालत ऐसी हो गयी है कि वह खुदा के पांव में फटी हुई जूती की तरह मालूम होती है। (तिबरी जिल्द 1 सफा 16)
इसी तरह बहुत से मोअर्रेखीन व मोहक़्क़ीन ने अपनी अपनी किताबों में बेसरों पैर की अजीब अजीब मज़हका खेज़ हदीसें और रिवायतें बयान की है। जिनमें बुखारी सरे फेहरिस्त है। इन मज़मूम रिवायतों और हदीसों से यक़ीऩन इस्लाम क पाको पाकीज़ा तसव्वर पर ग़ैर मुस्लिमों की तरफ से तहक़ीरों इस्तेहाज़ा की ज़रबें पड़ती हैं और मुस्लिम मुआशेरा उसे ख़ामोशी से बर्दाश्त भी करता है।
मौजूदा तरक़्क़ी पजीर दौर में तक़रीबन हर तालीम याफता इन्सान के नज़रियात साइंस की जदीद तहक़ीक़ से वाबस्ता और हम आहंग है। इसलिए वह इन खुराफाती रिवायतों पर यकीन और भरोसा नही करता क्योकि तहक़ीकात ओ इन्केशापात से इस किस्म की रिवायते बिल्कुल ग़लत और मोहमल साबित होती है। मस्लन तिबरी ने अपनी तारीख मं दुनियां की मुददत सिर्फ सात हज़ार साल बतायी है जबकि इल्मेतब्कातुल अर्ज़ के माहेरीन की तहक़ीकात से पता चलता है कि 20 करोड़ साल पहले भी दुनिया थी और ज़मीन के तमाम खुश्की वाले हिस्से एक दुसरे से पैवस्त और जुड़े हुए थे। जिन्के चारो तरफ समुन्द्र था। चुनान्चे एक मशरूरो मुमताज़ सांइस दां रोनाल्ड़ शेलर अपने एक तहक़ीक़ी मक़ाले (ब उनवान ज़मीन के बर्रे आज़म बह रहे है।) में लिखता है कि दुनियां की चार अरब साठ करोड़ साला दुनिया की तारीख़ में समुन्द्र एक रिकार्ड बाज़े कि तरह फैलते और सिकुड़ते रहे है। और बर्रे आज़म तूफानी समन्दर में एक पुराने जहाज़ की तरह मुताहर्रिक रहे है।
यक़ीनन इस मोअम्मे के कुछ हिस्से अभी ग़ायब है। और तमाम तफसीलात पर सांइसदां अभी मुत्तफिक़ नही हो पाये लेकिन एक उमुमी ख़ाके पर सांइस दोनो की अकसरियत इस हैसियत से इत्तेफाक़ कर चुकी है कि अब सिर्फ एक नज़रिया नही रहा। बल्कि उसे सांइटिफिक सच्चाई तस्लीम कर लिया गया है। (मज़मुआ रीडर्स ड़ाइजेस्ट शुमार माह जुलाई सन 1971 ई 0)
उसके बाद रोनाल्ड शेलर फिर लिखता है।
यह तमाम बर्रे आज़म एक ज़बर्रदस्त ताक़त के ज़रिये जिसका मर्कज़ नामालूम है। मुखतलिफ सिम्तो में बह रहे है और उन्की रफतार एक सेमी 0 से 15 सेमी 0 सलाना है। जो कि इल्में तबक़ातुल अर्ज़ की रु से एक ज़बरदस्त रफतार है।
मसलन साईंस दानों को यह मालूम हुआ कि बहरे उकयानूस की चौड़ाई बढ़ रही है। योरप और शिमाली अमरीका एक दूसरे से ढाई सेमी 0 के हिसाब से साल ब साल दूर होते जा रहे है। समुन्दर के फ़र्श की हरकत का हिसाब लगाने के बाद सांईस दां यह मालूम कर सके हैं कि ख़ुश्की के तमाम बर्रेआज़म पहले किसी शक्ल में एक दूसरे से जुडे थे। सबसे पहले एक ज़बर्दस्त मशरिक़ो मग़रिब, दरार पैदा हुई जिसकी वजह से अफ्रीका और जुनूबी अमरीका जुदा हुए, अंटार्टिका और आस्ट्रेलिया अलाहिदा हुए और हिन्दुस्तान ढाई सेमी 0 सलाना के हिसाब से खिसकना शुरू हुआ। और बीस करोड़ साल से ज़मीन ने मौजूदा शक्ल इख़तेयार कर ली।
तिबरी के रावियों ने खुदा के बारे में जो जिस्मानी तसव्वुर पेश किया है या दुनिया के बारे में जो मुददत मुअय्यन की है इन दोनों को रोनाल्ड शेलर की सांइसी तहक़ीक़ ग़लत क़रार देती है।
खुदा के लिए उस अज़ीम सांईसदानों का कहना है कि वह एक ज़बर्दस्त ताक़त है जिसका मर्कज़ नामालूम है और दुनिया के बारे में उनका ख़याल है कि बीस करोड़ साल से इसी तरहं क़ायम है। और इसके साथ ही अमीरल मोअमेनीन हज़रत अली के इस क़ौल की भी सिदाक़त समझ में आ जाती है कि खुदा ने मेरे भाई मुहम्मद के नूर को क लाख चौबीस हज़ार साल क़ल्ब अपने नूर से ख़ल्क़ किया।
एक तहक़ीक़ी ज़ेहन रखने वाला इन्सान इस ग़ौरो फिक्र के बाद यह नतीजा अख़ज़ करने पर मज़बूर है कि अव्वलीन दौर के मोअर्रेखीन के यहां भी बहुत सी ऐसी रिवायत पायी जाती हैं जिनकी सिरे से कोई हक़ीक़त नही है।
तारीख और ज़मानें के अलावा जो हालात और वाक़ियात मैंने इस किताब के गुज़िशता सफहात मं मरकूम किये है वह तक़रीबन सही है। क्योंकि उनका ज़िक्र कुरआने मजीद में मौजूद है। और मोअतबर रिवायात से भी उनकी तहक़ीक़ हर ज़ाविये से हो चुकी है। मसलन हज़रते आदम के दो फ़रज़न्दों में से एक का दुसरे को क़त्ल कर देना, हज़रते नूह के ज़माने में तुफान का आना, हज़रते इब्राहिम का आग में ड़ाला जाना, खुदा की राह में हज़रते इस्माइल का ज़बह होने पर आमादा होना और हज़रते यूसुफ़ का किस्सा वग़ैरह।
इन तमाम अम्बिया व मुरसलीन के हालात से यह भी वाज़ेह है कि हर नबी ने अपने बाद के लिये अपना खलीफा और जानशीन अपनी ज़िन्दगी में खुद मुक़र्रर किया है। इस मसले को उम्मत पर नहीं छोडा। फिर भला हज़रते रसूले खुदा स 0 अ 0 अपने बाद इस अहम मसले को उम्मत के रहमो करम पर क्यों कर छोड़ते।
यह भी वाज़ेह है कि तमाम अम्बियाये कराम इस दुनिया में सिर्फ बनी नौ इन्सान की हिदायत के लिए आये थे, मुल्क गीरी, बादशाहत, लश्कर कशी, खुंरेज़ी, तलवार, के ज़ोर पर अपना कलमा पढ़वाने या ज़बर्दस्ती लोगों को अपने दींन का पाबन्द बनाने के लिए नही आये थे। वह खुदा के इताअत गुज़ार बंदे थे।
अहले आलम को अमनो आश्ती का पैग़ाम देना, तमददुनों मोआशेरत का दर्स देना और लोगों को आखेरत का तलबगार बनाना उनका काम था और उनके खोलफा और औसिया भी उन्ही की पैरवी करते रहे। इसी तरह पैग़म्बरे इस्लाम के बाद जो लोग उनके किरदार व सीरत का मुकम्मल नमूना बने वही सच्चे जानशीन और ख़लीफा हैं न कि वह हज़रात जो ज़बर्दस्ती मस्नदे खिलाफत पर क़ाबिज़ हुए।

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