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आज़ाद भारत का सबसे काला क़ानून अस्तित्व में आ ही गया : हर नागरिक विरोध को कुचलने का सरकार मन बना चुकी है!

Kavita Krishnapallavi
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मीसा,टाडा, पोटा,मकोका आदि-आदि दर्ज़नों काले कानूनों की कड़ी में, राज्यसभा से ‘गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम (संशोधन) विधेयक’ पारित होने के बाद आज़ाद भारत का सबसे काला क़ानून अन्ततः अस्तित्व में आ ही गया I अब किसी भी व्यक्ति को आतंकी घोषित करके एन.आई.ए. उसकी संपत्ति ज़ब्त कर सकती है और उसे जेल के सींखचों के पीछे ठूँस सकती है ! और सभी जानते हैं कि यह तो पहले से ही हो रहा है कि आतंकी गतिविधि के आरोप में जेल में बंद ज्यादातर लोगों को बेगुनाही सिद्ध होकर बाहर आने तक ही 25-30 वर्षों का समय लग जाता है I सरकार पहले ही बता चुकी है कि आतंकवाद को वैचारिक या किसी भी प्रकार का समर्थन देने वाले व्यक्ति को आतंकी ही मानकर उसके विरुद्ध कार्रवाई की जायेगी I वैसे यह तो पहले से ही होता रहा है, अब और जोर-शोर से होगा !

तय है कि सरकारी बघनखे उन लोगों को भी नोच खाने के लिए पंजों पर चढ़ाए जा चुके हैं जिन्हें भाजपा और संघ के लोग और गोदी मीडिया ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’, ‘असहिष्णुता गैंग’, ‘पुरस्कार वापसी गैंग’, ‘खान मार्किट गैंग’, ‘अर्बन नक्सल’ जैसी संज्ञाओं से विभूषित करती रही है I जैसा कि फासिस्ट पार्टी की सत्ता के लिए स्वाभाविक है, बुर्जुआ जनवादी दायरे के भीतर के हर नागरिक विरोध को कुचलने का सरकार मन बना चुकी है I जनांदोलनों, मज़दूर आन्दोलनों और विस्थापित आदिवासी आबादी के आन्दोलनों के प्रति तो वह अपना रुख पहले ही साफ़ कर चुकी है ! रहे-सहे श्रम-कानूनों पर भी अंतिम मारक चोट की जा चकी है ! सूचना के अधिकार को पंगु बनाया जा चुका है I

सत्ताधारियों को बखूबी पता है कि भीषण मंदी जिसकदर अर्थ-व्यवस्था की कमर तोड़ रही है और आने वाले दिनों में जिसतरह छंटनी, बेरोज़गारी और मँहगाई का कहर बरपा होने वाला है, उसमें सड़कों पर जन-सैलाब का उमड़ना स्वाभाविक है ! बुर्जुआ पार्टियों, संसदमार्गी वामियों और स्थापित बड़ी ट्रेड-यूनियनों से तो कोई खतरा नहीं है (वे रस्मी विरोध से आगे जा ही नहीं सकते) लेकिन आर्थिक संकट स्वतःस्फूर्त सामाजिक-राजनीतिक जन-विस्फोटों को जन्म दे सकता है और ऐसे माहौल में कुछ नयी क्रांतिकारी शक्तियाँ और रैडिकल प्रोग्रेसिव ताक़तें राजनीतिक क्षितिज पर धूमकेतु की तरह प्रकट हो सकती हैं !

इन हालात से निपटने के लिए कानूनी तैयारियों और दमन-तंत्र को ज्यादा से ज्यादा निर्बंध खूँख्वार बनाने के साथ ही फासिस्ट सत्ता अपने आजमूदा नुस्खों को भी फिर से आजमाने की पूरी तैयारी कर चुकी है ! कश्मीर से पर्यटकों को वापस भेजा जा रहा है, अमरनाथ यात्रा रद्द की जा चुकी है और सेना को अलर्ट कर दिया गया है ! संकेत एकदम साफ़ हैं ! एक बार फिर तथाकथित देशभक्ति का प्रेत जगाया जाएगा जो जुनून का ऐसा अंधड़ चलाएगा कि बेरोजगारी-छंटनी-मँहगाई जैसे सभी मुद्दे उसमें उड़ जाएँ ! चुनाव के ठीक पहले पुलवामा-बालाकोट प्रकरण का घटित होना याद कीजिए I और उसके पहले भी यह नुस्खा आजमाया जा चुका है ! एक नुस्खा अगर फेल हो जाए तो दूसरे की भी तैयारी है ! अयोध्या मामले की सुप्रीम कोर्ट ने जबसे 6 अगस्त से रोजाना सुनवाई करके यथाशीघ्र फैसले की बात की है, तबसे कारसेवकपुरम से लेकर सभी अहम जगहों पर विहिप और संतों-महंतों की सरगर्मियाँ बढ़ गयी हैं ! फैसला चाहे जो भी हो (वैसे कोर्ट का अबतक का रुख देखते हुए हिन्दुत्ववादी ज्यादातर अनुकूल फैसले की ही उम्मीद कर रहे हैं), पूरे देश में एक बार फिर मंदिर मुद्दे की आग तो धधकाई ही जा सकती है !

यह जो कुछ भी चल रहा है यह संसदीय विपक्षी दलों की पंगुता-नपुंसकता को सबसे अधिक नंगा कर रहा है ! इतने काले क़ानून पास हुए, पर ये सभी दल संसद में हवाई गोले छोड़ने और कुछ रस्मी बयान जारी करने से एक इंच भी आगे नहीं खिसके ! सड़क पर तो खैर उतर ही नहीं सकते, किसी के पास सड़क पर उतरने वाले कैडर हैं ही नहीं ! ज़ाहिर है, इतिहास अपने को फिर दुहराने जा रहा है ! फासिस्ट कहर बढ़ते ही ये सभी दल घुटनों के बल कतारबद्ध हो जायेंगे और उन्हीं के रहमो-करम पर जीते हुए संसदीय राजनीति के प्रहसन में अपना रोल अदा करते रहेंगे ! यूँ कहें कि यह प्रक्रिया शुरू भी हो चुकी है ! मुलायम सिंह, नवीन पटनायक आदि क्षेत्रीय दलों के चौधरी तो लोकसभा में ‘यू ए पी ए’ बिल पेश किये जाते समय ही अपना असली चेहरा दिखा चुके थे ! राज्यसभा में बसपा ने भी बिल का समर्थन किया और विरोध में भाषण-भूषन कूटने के चन्द मिनटों बाद कांग्रेस ने भी बिल के पक्ष में वोट दिया ! उन लिबडल और चोचल ढेलोक्रैट बुद्धिजीवियों की बुद्धि पर सिर्फ़ तरस ही खाया जा सकता है जो अभी भी यह उम्मीद पाले बैठे हैं कि संघी फासिज्म के विरुद्ध लड़ने में क्षेत्रीय बुर्जुआ दल और कांग्रेस अहम भूमिका निभा सकते हैं ! इन महानुभावों को कोई याद क्यों नहीं दिलाता कि अबतक के अधिकांश काले क़ानून कांग्रेसी सरकारों ने ही बनाए थे ! कोई इस बात को कैसे भूल सकता है कि ई.वी.एम. लाने वाली कांग्रेस ही थी, आधार लागू करने वाली कांग्रेस ही थी ! और सबसे बढ़कर, फासिस्टों ने जिन विनाशकारी नव-उदारवादी नीतियों को उनकी तार्किक अति तक पहुँचाया है, उनका श्रीगणेश कांग्रेस ने ही किया था और उन्हें लागू करने में उसे संसदीय वाम पार्टियों सहित सभी क्षेत्रीय बुर्जुआ दलों का अलग-अलग दौरों में साथ मिला ! रामजन्मभूमि का ताला खुलवाने से लेकर बाबरी मस्जिद ध्वंस तक में कांग्रेस की भूमिका को भूला नहीं जा सकता ! सच तो यह है कि पिछले साढ़े तीन दशकों से अपने लिजलिजे ‘सेकुलरिज्म’ को भी तिलांजलि देकर कांग्रेस लगातार ‘नरम केसरिया लाइन’ अपनाती रही है I यह बात अलग है कि उसकी यह नीति आत्मघाती सिद्ध हुई और इसका फ़ायदा अंततोगत्वा भाजपा को ही मिला !

यह समय हर प्रकार के उदारवादी और सामाजिक जनवादी विभ्रमों से मुक्त होने का समय है I जितना जल्दी हो लें उतना ही बेहतर ! उदारवादी-सुधारवादी लोग जनता को बुर्जुआ विभ्रमों का शिकार बनाकर निश्शस्त्र कर देते हैं ! फासिस्टों ने जनता के विरुद्ध खुला खूनी युद्ध छेड़ने की तैयारियाँ पूरी कर ली हैं ! उनसे शान्ति-पाठ करके नहीं निपटा जा सकता ! इतिहास को याद करने की ज़रूरत है ! वरना कहना रसूल हमज़ातोव का कि,’ अगर तुम इतिहास पर पिस्तौल से गोली चलाओगे तो भविष्य तुमपर तोप से गोले बरसायेगा !’

डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. लेख सोशल मीडिया फेसबुक पर वायरल है, लेखक का fb लिंक साथ में प्रस्तुत है, इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति तीसरी जंग हिंदी उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार तीसरी जंग हिंदी के नहीं हैं, तथा तीसरी जंग हिंदी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है

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