धर्म

ईदुल अज़हा पर ग़ैर मुस्लिमों के एतराज़ का जवाब!

Shamsher Ali Khan
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ईदुल अजहा पर एक वायरल पोस्ट देखा जिसमे लिखा था कि “असल क़ुर्बानी तो यही है कि आप भी अपने बेटे को क़ुर्बान करें क्योंकि हज़रत इब्राहीम ने अपने बेटे की क़ुर्बानी दी थी। अगर आप भी सच्चे होंगे तो ख़ुदा आपके बेटे की जगह किसी दूसरे जानवर को भेज कर आपकी क़ुर्बानी क़बूल कर लेगा। तो कितने मुस्लिम लोग सेम टू सेम क़ुर्बानी दे रहे…”?

ये मुझे एक नासमझ भरी पोस्ट लगी।दरअसल हर मज़हब में एक डिवाइन पर्सनालिटी होती है जिनके लिए आदेश आम आदमी से डिफरेंट होते हैं।क्योंकि अल्लाह ये कैसे हुक्म दे सकता है और ये पैरामीटर सेट कर सकता है कि तुम सब बेटे क़ुर्बान करो,जिसके बच गए समझो सच्चा और जिनके मारे गए वो झूठे हैं ? Assumptions की बेस पर हुक्म नहीं आते।

ये बात ग़ौर तलब है कि हज़रत इब्राहीम को न ये ख़्वाब आया और न ही हुक्म हुआ कि बेटे को क़ुर्बान करो ।ख़्वाब आया अपनी “महबूब चीज़ की क़ुर्बानी” ।और वो कुछ भी हो सकता था फिर बेटा क़ुर्बान क्यों ??

एक बात बताते चलें कि पैग़म्बरों का ख़्वाब सच्चा माना जाता है ।अवाम के पास इस बात की गारंटी नहीं की उसका ख़्वाब सच्चा है या मात्र उसके विचारों का संयोजन है। सो इस ख़्वाब के ज़रिए ख़ुदा को अपने पैग़म्बर हज़रत इब्राहीम की नीयत भी चेक करनी थी।इसलिए ख़्वाब की सच्चाई के साथ लिंक की गयी क़ुर्बानी का अमल।

अब यहाँ पर हज़रत इब्राहीम का IQ लेवल देखना है। बेटा क़ुर्बान करना ये ख़ुद उनकी अपनी इंटरप्रिटेशन थी। ये वो लेवल है जिसका ज़िक्र क़ुरान की सुरः निसा में भी किया गया है।यही लेवल हमें सानेहा कर्बला में नज़र आता है । ये लेवल अल्लाह की रज़ा है। दुनियावी ऐतेबार से यूँ समझे की जब कोई बंदा फ़ौज में जाता है तो अपनी ज़िन्दगी दाव पर ही लगता है जो बेसिकली क़ुर्बानी ही है जो अलग लेवल की है ।

एक बात ग़ौर तलब है कि यहाँ पर हज़रत इब्राहीम और उनके बेटे हज़रत इस्माइल का मामला consensus(सहमति)का है। इब्राहीम ने ज़बरदस्ती नहीं की इस्माइल के साथ और वो बालिग़ भी थे ।

अब आम आदमी के लिए क़ुर्बानी के जो उसूल बनाए गए इसमे कई पोशीदा हिकमत भी शामिल हैं ।कुछ हमपर ज़ाहिर हैं कुछ छुपी ।जैसे इकॉनमी सिस्टम, इसमें देश का पैसा शहर से गाँव की तरफ़ ट्रांसफर होता है वग़ैरह ।
क़ुर्बानी साहिब ए इक़्तेदार पर ही वाजिब है..

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