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उनको क़लाम ही चाहिए…न बिस्मिल, न ब्रिगेडियर उस्मान, न सलीम अली, न हमीद न हामिद…पूछिए क्यों?

उनको कलाम ही चाहिए…न बिस्मिल, न ब्रिगेडियर उस्मान, न सलीम अली, न हमीद न हामिद… पूछिए क्यों? वो बताते हैं हामिद अंसारी सवाल करते हैं… एमएफ हुसैन उपहास करते हैं, गौहर रज़ा कविता लिख देते हैं। उन्हें न शायरी वाला इक़बाल चाहिए और न तबला बजाता ज़ाकिर हुसैन… उन्हें बनारस के घाट पर शहनाई बजाते बिस्मिल्लाह से भी ऐतराज़ हो सकता है और चुपचाप कारोबार में जुटे दानवीर अज़ीम प्रेमजी से भी। ऐतराज़ तो किसी भी मासूम से मियां दिखने वाले से हो सकता है… चाहे वो कबीर जैसा लामज़हब ही हो या ज़ोमैटो का ग़रीब, अहिंसक दिहाड़ी मज़दूर…

कलाम ही चाहिए… क्योंकि कलाम में समर्पण है.. और कलाम में सरकारी मुसलमान बनने की सारी योग्यताएं हैं। कलाम वक़्त पड़ने पर ख़ुद को वैज्ञानिक कह सकता है ये जानते हुए कि उसकी डाक्टरेट मानद है। जिस दौर में डिग्री पर सवाल हों उस दौर का इंजीनियर ख़ुद को मिसाइल वैज्ञानिक कहे या परमाणु वैज्ञानिक, बस उन जैसा होना चाहिए। कलाम इसलिए भी स्वीकार्य है क्योंकि कलाम को सबकुछ स्वीकार्य है। वो अबुल पैकर और ज़ैनुल आबेदीन को नटराज की मूर्ति में छिपा सकते हैं… संसद में सावरकर के बुत की एंट्री करा सकते हैं, ये जानते हुए भी कि पिछला राष्ट्रपति दलित होकर इसके ख़िलाफ था। कलाम 2002 के नरसंहार पर मौन रख सकते हैं। वो सेक्युलरिज़्म की चादर भी नहीं पहनते और सैन्य राष्ट्रवाद पर उनकी आवाज़ झंडे की ऊपर वाली पट्टी के पार निकल जाती है। वो म्लेच्छ होने के नाते अपनी हद समझते हैं इसलिए सिलेक्टीव मुद्दों पर ही ज्ञान देते हैं। उनकी बातों में विज्ञान होता है विज़न होता है लेकिन राजनीतिज्ञ होने के बावजूद न राजनीति होती है और न अपना पिटा हुआ समाज।

हालांकि कलाम योग्य हैं… उनमें साथियों के काम का क्रेडिट बिना विरोध झपट लेने का फन है… वो अच्छे प्रशासक हैं क्योंकि कोई उनके दावों पर सवाल नहीं करता। सबसे बड़ी बात, उनमें वो सब गुण हैं जो देश के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को स्वीकार्य हैं। कलाम बनना कोई मुश्किल नहीं है। बस रीढ़ की हड्डी कमज़ोर करने वाली दवा खाइए, थोड़ा विनम्रता से झुकिए, बहुसंख्यकों की भावनाओं का आदर करते हुए अधिकार, हक़, न्याय डैसे शब्द डस्टबिन में डालिए और भक्तिभाव से समर्पण कर दीजिए। कलाम बनना इस मुल्क में सबसे आसान काम है इसलिए कलाम बन जाइए…इतिश्री वंदेमातरम कथा।।।

Zaigham Murtaza की कलम से।

वाया – Azhar Shameem

 

Radhika Sachdev

“What will happen to me if you don’t come back alive from the table?” my 16 year old wants to know. “Which massi would I stay with?” is her next, practical question. “Which one do you want to stay with?” I smilingly counter, and she pauses to think and comes back to me with, “I don’t know. I like Poonam massi slightly better than Mona massi, but on the other hand, I like Vishal Massu (Mona’s husband) better than Arun Massu.” I feel sorry for the child’s predicament. She definitely has a problem at hand, if I don’t come back from my second, much smaller surgery, this time round. I’ve had a relapse. Detected early, this time the lesion is near the thoracic region, on the left diaphragm, just touching the spleen. At the surgery, likely to be scheduled next week, in Pune, Dr Bipin Vibhute’s capable hands will remove a portion of the left diaphragm with a mesh to stem the cancer it from spreading any further. There was a 20% chance of relapse, and I’ve fallen in that statistic. But what I am amused by is, what will my creator say when I return to him – “A borrowed liver, no gall bladder and now a mesh for a diaphragm? Actually Aarzoo has little scope of staying with her either aunt as I am going to be back. After my #livertransplant, this is just a unit test.

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