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#कश्मीर के क़ालीन के नीचे दम तोड़ते असल मुद्दे : बेरोज़गारी चरम पर, पानी के ख़त्म होते भंडार, अंबानी के फिर करोड़ों माफ

Mamta Joshi
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हरियाणा के मुख्यमंत्री खट्टर काका का यह कहना कि अब हम भी गोरी कश्मीरी बहू ला पाएंगे एक बहुत महीन राजनीतिक वाक्य है । जिस पर अभी तक किसी का ध्यान नहीं गया है । वैसे अब मेरा लिखने का कोई मन तो नहीं करता, बेमन से लिख रही हूं । कारण यह है कि यहां पाले बने हुए हैं । एक सत्ता के साथ एक सत्ता के खिलाफ । ऐसे माहौल में कोई भी सार्थक बहस होना असम्भव है । मुद्दे पर आते हैं ।

हरियाणा एक स्त्री विरोधी स्टेट है । यहां स्त्री पुरुष अनुपात सबसे खराब है । कन्या भ्रूण हत्या सबसे ज़्यादा व्यापक स्तर पर यहीं होती है । हालात ये हैं कि यूपी बिहार उड़ीसा की गरीब लड़कियां यहां खरीद कर लाई जाती हैं । कई लोग जो परिवार के सब लड़कों के लिए स्त्री का जुगाड़ नहीं कर पाते वे चार चार लड़के एक स्त्री से अपनी काम वासना शांत करते हैं । गरीब की कुपोषित कन्या जो भूख और धूप में जली हो वो किसी होगी ? बताने की ज़रूरत नहीं है । लगभग प्रेम विहीन राज्य की एक जवान मुश्तण्ड पीढ़ी को घाटी की सफेद शफ्फाक खूबसूरत लड़की के सपने दिखा कर वोट की पेटी अपनी ओर करना एक छुपा तीर है । जिसे लार टपकाते बंजर दिलों ने सौ सौ हाथ पकड़ लिया है । शुद्ध विरोध करने वालों ने लिख लिख कर ऐसा डर का माहौल क्रिएट कर दिया जैसे घरों से लड़कियां घसीट कर हरियाणा के लड़कों में बांट दी जाएंगी । मुसलमानों ने खास कर इसे बहुत गंभीरता से लिया है ।

ऐसा कभी नहीं हो सकता और भी बहुत से पहाड़ी राज्य हैं जहां खूबसूरती बिखरी पड़ी है, एक्को लडक़ी वहां से खरीद कर ला नहीं पाए ।

एक और बात खूब कही जा रही है कि वहां की लड़की हो बहू बनाएंगे तो दामाद क्यों न बनाएंगे ?

तो सुनो : हमारा समाज खूबसूरत लड़की और कमाऊ लड़का चाहता है । जहां कश्मीर कहते हैं तो हूर टाइप लड़की की तस्वीर सामने आती है और लड़का कहें घर घर शॉल और कालीन बेचते लड़कों की शक्ल सामने आती है । सुंदरता लड़कों की प्राथमिकता होती है और सुरक्षा और पैसा लड़कियों की इसलिए कश्मीरी दामाद कोई नहीं चाहता या फिर वो उमर अब्दुल्ला हो, वो भी अब दूसरी शादी में एंकर निधि राजदान के पति हैं । इनकी पहली पत्नी सचिन पायलट की बहन थी ।

तो भाई लोग डरों को और न डराएं ऐसा कुछ नहीं होगा । ज़रा मुद्दों पर ध्यान दें अंबानी के फिर करोड़ों माफ हो गए हैं और शिक्षा और महंगी । निजीकरण की लपेट में कामधेनु सरकारी संस्थान और डूबते काम धंधे । बेरोज़गारी चरम पर और पानी के खत्म होते भंडार । बाढ़ में डूबते शहर और चरमराती अर्थव्यवस्था । बाकी तो जी आप जानते ही हैं ।

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