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किस बात से डर रहा है इस्राईल, पूरे इस्राइल में क्यों लग रहे हैं आयरन डोम?

इस्राईली प्रधानमंत्री बिनयामिन नेतनयाहू ने इस्लामी प्रतिरोध आंदोलनों की संभावित प्रतिक्रिया के डर से पूरे इस्राईल में आयरन डोम स्थापित करने का आदेश दिया है।

लेबनान के इस्लामी प्रतिरोध आंदोलन हिज़्बुल्लाह के महासचिव सैयद हसन नसरुल्लाह और ईरान की इस्लामी क्रांति के संरक्षक बल (आईआरजीसी) की क़ुद्स ब्रिगेड के प्रमुख जनरल क़ासिम सुलेमानी द्वारा हाल ही में दिए गए बयानों के बाद इस्राईल सहित उसके सभी सहयोगियों के होश उड़ गए हैं। इस बीच ज़ायोनी शासन के विदेश मंत्रालय ने प्रधानमंत्री नेतनयाहू की ओर से एक बयान जारी किया है जिससे यह साफ-साफ दिखाई देता है कि नेतनयाहू इस्लामी प्रतिरोध आंदोलनों की संभावित प्रतिक्रिया को लेकर कितना भयभीत हैं। नेतनयाहू ने सैयद हसन नसरुल्लाह और जनरल क़ासिम सुलैमानी को संबोधित करते हुए कहा कि, अपने शब्दों और अपने कार्यों पर ध्यान रखें और मैं नसरुल्लाह को शांत रहने की सलाह देता हूं। उन्होंने कहा कि इस्राईल को ख़ुद की रक्षा करना आता है। इसी तरह नेतनयाहू ने पिछले दिनों अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से ईरान पर दबाव बनाने का आह्वान किया था। इन सभी बातों से ऐसा लगता है कि नेतनयाहू जो स्वयं डरे हुए हैं वह ऐसी बातें करके ज़ायोनी अधिकारियों और जनता में पैदा हुए भय को कम करने और उनमें आत्मविश्वास पैदा करने की एक नाकाम कोशिश कर रहे हैं।

इस बीच मध्यपूर्व के मामलों के जानकारों का मानना है कि हिज़्बुल्लाह और ज़ायोनी शासन के बीच काफ़ी दिनों से शीत युद्ध की स्थिति है और दोनों तरफ़ सुरक्षा की व्यापक तैयारियां की जा रही हैं। इस बीच इस बात की संभावना बढ़ गई है कि किसी भी क्षण इन दोनों के बीच जारी समय-समय पर जारी आपसी टकराव एक बड़े युद्ध का रूप धारण कर ले। हिज़्बुल्लाह और ज़ायोनी शासन के बीच दुशमनी एतिहासिक है और आस्था संबंधी है जिसकी जड़े बहुत गहरी हैं और दोनों में संधि कभी भी संभव नहीं है। दोनों के बीच अब तक कई युद्ध हो चुके हैं। आख़िरी जंग वर्ष 2006 में हुई थी। इस युद्ध में ज़ायोनी शासन इस विश्वास के साथ उतरा था कि उसकी विजय निश्चित है। ज़ायोनी शासन और उसके समर्थकों को यक़ीन था कि हिज़्बुल्लाह ने चाहे जितनी तैयारी कर रखी है इस्राईल के व्यापक हमलों के सामने वह कुछ ही दिन टिक पाएगा। हमले की योजना पहले से ही तैयार थी और ज़ायोनी शासन उचित अवसर की प्रतीक्षा में था कि बड़े पैमाने पर हमला करके हिज़्बु्ल्लाह को ख़त्म कर दे। हिज़्बुल्लाह ने स्थिति को भलीभांति परख कर पहल कर दी और एक सैनिक आप्रेशन करके इस्राईली सैनिकों को बंधक बना लिया।

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इसके बाद इस्राईल का युद्ध शुरू हो गया जो 33 दिन तक चला और आख़िरकार इस्राईल को युद्ध रोकना पड़ा क्योंकि उसे अब पता चल चुका था कि हि़ज़्बुल्लाह को ख़त्म करना संभव नहीं है। इस युद्ध में इस्राईल ने आधुनिक अमरीकी युद्धक विमानों का प्रयोग करके लेबनान में बड़े पैमाने पर जनसंहार किया और इमारतों को नुक़सान पहुंचाया लेकिन वह हिज़्बुल्लाह के जियालों के जवाबी हमलों से कराहने भी लगा। नतीजा यह हुआ कि इस्राईल ने अपनी सैनिक शक्ति का जो हौवा खड़ा कर रखा था वह समाप्त हो गया। तत्कालीन ज़ायोनी प्रधानमंत्री एहूद ओलमर्ट ने कहा था कि इस युद्ध के दो प्रमुख लक्ष्य हैं, एक है इस्राईली सैनिकों को वापस लाना और दूसरे हिज़्बु्ल्लाह को निरस्त्र करना। इस्राईल ने कहा था कि वह हिज़्बुल्लाह को इतना कमज़ोर कर देगा कि हिज़्बुल्लाह क्षेत्र की सामरिक व राजनैतिक शक्ति की हैसियत खो देगा। वैसे यह इ्स्राईल के बहुत पुराने लक्ष्य हैं जिनके साथ कुछ नए लक्ष्य भी जोड़ दिए गए थे। लेकिन इस्राईल का एक भी लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया।

इस बीच इस्राईली सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी जनरल बीतून ने कहा है कि इस्राईली सेना, सीरिया और लेबनान में अलग-अलग मोर्चों पर युद्ध के लिए तैयार हो रही है और युद्ध की आग किसी भी क्षण भड़क सकती है। जबकि इस्राईली सेना में रिज़र्व फोर्स के कमांडर, जनरल यत्सहाक़ ब्रीक ने चेतावनी दी है कि इस्राईली सेना अगले युद्ध के लिए तैयार नहीं है और उसकी तैयारी सन 1973 के युद्ध से भी बुरी है। ब्रीक ने इस्राईली सेना की कमज़ोरी पर एक खुफिया रिपोर्ट तैयार की थी जिसके बाद इस्राईल में हड़कंप मच गया था कि और जांच समिति गठन की गयी थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस्राईली सेना, हिज़्बुल्लाह और हमास के साथ ज़मीनी युद्ध से बचने के लिए सब कुछ करने पर तैयार है क्योंकि इस्राईली सेना को गोरिल्ला युद्ध का बहुत बुरा अनुभव है और सन 2006 में इस प्रकार के युद्ध में वह काफ़ी नुक़सान उठा चुकी है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस्राईली सैन्य अफसरों को यह चिंता खाए जा रही है कि हिज़्बुल्लाह के सदस्य युद्ध में उनके सैनिकों से भी ज़्यादा दक्ष हो गये हैं लेकिन उससे अधिक चिंता की बात यह है कि वह ज़मीनी युद्ध में हिज़्बुल्लाह के सामने बेहद कमज़ोर हैं और उन्हें भारी नुक़सान उठाना पड़ेगा। इस्राईली समाचार पत्र हारित्ज़ में सैन्य मामलों के टीकाकार, आमूस हारईल ने लिखा है कि इस्राईल की थल सेना के पास हथियारों की भी समस्या है। इस्राईली थल सेना के हथियारों की क्षमता सन 2014 में गज़्ज़ा पट्टी पर आक्रमण के समय स्पष्ट हो गई थी हालांकि यह हमला सन 2006 में हिज़्बुल्लाह के सामने बुरी तरह से विफलता के बाद सेना के हथियारों में व्यापक रूप से सुधार के बाद किया गया था और रिज़र्व फोर्स को नए हथियार दिए गए थे।

दूसरी ओर टीकाकारों का मानना है कि दोनों पक्षों में से यदि किसी भी पक्ष ने दूसरे की शक्ति का अनुमान लगाने में कोई ग़लती की तो बहुत बड़ी लड़ाई शुरू हो जाएगी। इस्राईल ने हाल ही में एक सैनिक सभ्यास किया जो लेबनान के साथ यु्द्ध को दृष्टिगत रखकर किया गया। इस अभ्यास में इस्राईल की यह कोशिश थी कि लेबनान पर हमले का अभ्यास करने के साथ ही अपने नागरिकों को बचाने के लिए प्रभावी उपायों का भी परीक्षण करे। इस समय हिज़्बुल्लाह और इस्राईल के बीच ख़फ़िया युद्ध जारी है। इस्राईल अपनी इंटेलीजेन्स की मदद से हिज़्बुल्लाह के सैनिकों, शस्त्रागारों और तैयारियों की जानकारी जुटाने की चेष्टा में है। उनकी कोशिश है कि हिज़्बुल्लाह के वरिष्ठ कमांडरों और नेताओं के एकत्रित होने के ठिकानों की जानकारी प्राप्त कर लें। लेकिन इस्राईल को वर्ष 2006 की इंटेलीजेन्स विफलताएं याद हैं। हिज़्बुल्लाह जान बूझ कर कुछ गतिविधियां इस्राईली इंटेलीजेन्स को गुमराह करने के लिए भी करता है।

जानकारों की मानें तो ज़ायोनी शासन की सबसे बड़ी नाकामी यह है कि वह अन्य देशों से लाकर इ्स्राईल में बसाए गए यहूदियों का विश्वास खो चुका है। वर्ष 2006 की लड़ाई से साबित हो गया कि ज़ायोनी शासन के पास इन यहूदियों की सुरक्षा की ताक़त नहीं है। इसीलिए लगभग डेढ़ लाख यहूदी इस्राईल से वापस अपने देशों की ओर लौट चुके हैं। हालांकि वर्ष 2006 की लड़ाई में हिज़्बुल्लाह ने जो मिसाइल हमले किए थे वह उसकी आज की ताक़त की तुलना में काफ़ी सीमित थे। आज के समीकरणों से इस्राईल में रहने वालों में गहरा भय व्याप्त है। इस्राईल में बार बार हिज़्बुल्लाह की मिसाइल ताक़त की रिपोर्टों प्रकाशित हो रही हैं और हर नई रिपोर्ट में हिज़्बुल्लाह की ताक़त में बहुत अधिक वृद्धि की बात कही जाती है।

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