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कोई है जो कश्मीरियों की सुध ले….

भारत प्रशासित कश्मीर पर जारी संघर्ष में सब एक बात भूले जा रहे है कि धरती के इस स्वर्ग में इंसान भी रहते हैं। जिस तरह बिना रहने वालों के एक घर खंडहर में बदल जाता है उसी तरह इस स्वर्ग में जब इंसान ही न होंगे तो यह भी केवल एक ज़मीन का टुकड़ा ही रह जाएगा।

हिंदी की प्रसिद्ध न्यूज़ पोर्टल द-वायर में प्रकाशित एक ख़बर ने हमें भी कुछ लिखने पर मजबूर कर दिया। इस ख़बर का शीर्षक ही कश्मीर की ताज़ा स्थिति के बारे में बहुत कुछ कह रहा है। “ताले में बंद कश्मीर की कोई ख़बर नहीं, पर जश्न में डूबे शेष भारत को इससे मतलब नहीं” यह वही शीर्षक है जिसका मैंने उल्लेख किया और वास्तव में यह बिल्कुल सच पर आधारित है। इस समय जो कुछ कश्मीर में हो रहा है वह एकपक्षीय कार्यवाही है जो उस दौर की याद दिलाता है जब कोई राजा बिना जनता की राय जाने कोई भी फ़ैसला उनपर थोप देता था। भारत प्रशासित कश्मीर में तीन दिनों से दुकानें बंद हैं, बच्चे स्कूल न जा कर अपने-अपने घरों में क़ैद हैं, माओं के चेहरों पर एक अजीब सी पेरशानी है बस यह समझ लें कि कश्मीर की जनता का हाल उस गेहूं की तरह है जिसको चक्की के दोनों पाट मिलकर पीस रहे हैं और उससे बनने वाले आटे से अपना पेट भर रहे हैं पर उस चक्की में जमती परतों को कोई साफ़ करने वाला नहीं है जिससे धीरे-धीरे चक्की अपना अस्तित्व खोती जा रही है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक कश्मीर अब टुकड़ों में बट गया है। जम्मू कश्मीर और लद्दाख अब राज्य नहीं रह गए हैं। भारत के दो केंद्र शासित प्रदेशों में बट गए हैं। जो राज्यपाल कल तक अपने पद को लेकर आश्वस्त थे उन्हें यही नहीं पता था कि जिस डाल को वह केंद्र सरकार के इशारे पर काट रहे हैं वह उसी पर बैठे हैं, क्योंकि अब भारत प्रशासित कश्मीर में न कोई राज्यपाल होगा और न ही कोई मुख्यमंत्री। धारा 370 को लेकर सबने राजनीति की है। भाजपा से पहले कांग्रेस ने दुरुपयोग किया। धारा 370 के रहते मर्ज़ी चलाई, उसे निष्प्रभावी किया। अब इस धारा के समाप्त किए जाने पर जश्न मनाने वालों में एक बात साफ है, उन्हें अब संसदीय प्रक्रियाओं की नियमावलियों में कोई आस्था नहीं वे न न्यायपालिका की परवाह करते हैं और न कार्यपालिका की और न विधायिकाओं की। संस्थाओं की चिंता का सवाल मृत घोषित किया जा चुका है। लोग अमरत्व को प्राप्त कर चुके हैं। यह अंधेरा नहीं है, बहुत तेज़ उजाला है, सुनाई ज़्यादा देता है, दिखाई कम देता है। लोक ने लोकतंत्र को ख़ारिज कर दिया है, परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। लोगों को अपने बीच कोई शत्रु मिल गया है। कभी वह मुसलमान हो जाता है, कभी कश्मीरी हो जाता है। नफ़रत के कई कोड से लोगों की प्रोग्रामिंग की जा चुकी है। उन्हें बस इससे संबंधित शब्द दिख जाना चाहिए, उनकी प्रतिक्रिया समान रूप से छलक आती है।

मुझे हंसी तो उनपर आ रही है जो भारत सरकार के इस निर्णय से ख़ुश है कि उसने कश्मीर से धारा 370 हटा दी अब कश्मीर में शांति व स्थिरता स्थापित हो जाएगी। अब कश्मीर में किसी भी तरह की अप्रिय घटना नहीं होगी। कश्मीर छोड़कर जाने वाले पंडित कश्मीर वापस आ जाएंगे और अब कश्मीर से संबंधित सभी समस्याएं छू मंतर हो जाएंगी क्योंकि मोदी सरकार ने इतना बड़ा क़दम जो उठाया है। अब ख़ुशी मनाने वालों से यह कौन पूछे कि 8 नंवबर 2016 को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी का एतिहासिक फ़ैसला सुनाते हुए इस देश की जनता से यह वादा किया था कि उनके इस फ़ैसले से आतंक की कमर टूट जाएगी, देश का सारा काला धन वापस आ जाएगा, देश में हर तरफ ख़ुशहाली ही ख़ुशहाली होगी, भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा और कुल मिलाकर उनका कहना था कि भारत इस नोट बंदी के बाद फिर से सोने की चिड़िया बन जाएगा और अगर ऐसा नहीं हुआ तो इस देश की जनता उन्हें जिस चौराहे पर चाहे सज़ा दे दे, पर अब इन बातों के बारे में ही सोच कर हंसी आती है।

(रविश ज़ैदी)

सोर्स : पारस टुडे हिंदी

 

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