साहित्य

जब बुराई बारिश की तरह आती है, तो कोई भी नहीं चिल्लाता ‘रुको’

Kavita Krishnapallavi
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जैसे कोई ज़रूरी ख़त लेकर आता है डाकख़ाने देर से

खिड़की बंद हो चुकी होती है I

जैसे कोई शहर को आसन्न बाढ़ की चेतावनी देना चाह रहा हो,

पर वह दूसरी ज़ुबान बोलता है I वे उसे नहीं समझ पाते I

जैसे कोई भिखारी पाँचवीं बार वह दरवाज़ा खटखटाता है

जहाँ से चार दफ़ा पहले कुछ मिला था उसे

पाँचवी बार वह भूखा है I

जैसे किसी के घाव से ख़ून बह रहा हो और डॉक्टर का इंतज़ार कर रहा हो

उसका ख़ून बहता ही जाता है I

वैसे ही हम आगे आकर बताते हैं कि हमारे साथ बुरा हुआ है I

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पहली बार बताया गया था कि हमारे दोस्तों का क़त्ल किया जा रहा है

दहशत की चीख़ थी

फिर सौ लोगों को क़त्ल किया गया I

लेकिन जब हज़ार क़त्ल किये गये, और क़त्लेआम की कोई इंतेहा नहीं थी

ख़ामोशी की एक चादर पसर गयी I

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जब बुराई बारिश की तरह आती है, तो कोई भी नहीं चिल्लाता ‘रुको’!

जब अपराध ढेर में तब्दील होने लगते हैं, तो वे अदृश्य हो जाते हैं I

जब दुख असहनीय हो जाते हैं, चीख़ें नहीं सुनी जातीं I

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चीख़ें भी बरसती हैं गर्मी की बारिश की तरह I

— बेर्टोल्ट ब्रेष्ट

(अनुवाद:प्रकाश के रे )

(साथ का चित्र सुप्रसिद्ध इतालवी चित्रकार रेनातो गुत्तुस्सो का 1941 में बनाया गया चित्र ‘Crocifissione/Crucifixion’ है, जिसमें सलीब पर चढ़ाए गए ईसा की छवि को पुनर्सृजित करते हुए तत्कालीन इतालवी समाज में व्याप्त फासिस्ट आतंक को अभिव्यक्त किया गया है ! गुत्तुस्सो अभिव्यंजनावादी यथार्थवादी इतालवी चित्रकार था जो फासिस्ट दौर में प्रतिबंधित कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य भी था !)


मुदित मिश्र विपश्यी
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”सचमुच ऊँचा
होता है सदा नीचा।
सचमुच वेगवान
होता है सदा मन्द।
अति संवेदनशील
होता है चेतना—शून्य।
अतीव वाक्पटु
होता है मूक।
ज्वार और भाटा
दो रूप हैं
एक ही लहर के।
जिसका नहीं है
कोई मार्गदर्शक
उसी के पास है
पक्का मार्गदर्शक।
बहुत महान
होता है बहुत छोटा।
सब—कुछ है उसके पास
जो सब—कुछ
देता है लुटा।’’
….
किताब ए मीरदाद

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