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मोब्लिंचिंग और तथाकथित सेक्युलर लोगों की मानसिकता!

Joher Siddiqui
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मोब्लिंचिंग और तथाकथित सेक्युलर लोगों की मानसिकता!

कहते हैं, मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है, लेकिन जब किसी की मोब्लिंचिंग होती है, ठीक उसी वक़्त बचाने वाले लोग अपने मोबाइल फ़ोन से मौत के तांडव का वीडियो बना रहे होते है।

ये कैसी भीड़ है, जो हॉलीवुड की फिल्मों में दर्शाए गए जोम्बी की तरह बन गई है, जो भी उनकी तरह नहीं है, वो उन्हें मार डालना चाहते है, मैं अब इन घटनाओं को मोब्लिंचिंग नहीं कहना चाहता हूं, बल्कि इस तरह की घटनाएं सुनिश्चित तरीके से किया गया मडर है। लेकिन ऐसा क्यों है, हम हर बार, मार दिए गए लोगों के प्रति सहानुभूति और मारने वालों के प्रति सिर्फ़ गुस्सा दिखा कर चुप हो जाते है, और फिर कुछ ही दिनों बाद फिर से ऐसी ही घटना घट जाती है।

एक और अहम बात जो मै हमेशा नोटिस करता हूँ, जब किसी अपराध में उर्दू नाम का कोई शख्स शामिल होता है, उसकी सबसे ज़्यादा मज़म्मत उर्दू नाम के लोग ही करते हैं, लेकिन जब एक माइंडसेट की वजह से इस तरह की घटना घटती है, हिंदी नाम के बमुश्किल कुछ लोग ही आवाज़ उठाते है, ऐसा क्यों है? मैं आज वजह जानने की कोशिश कर रहा हूँ, मेरे आस पास कई ऐसे लोग है, जो सेक्युलर दिखने की भरपूर कोशिश करते हैं, लेकिन वो सिर्फ कोशिश ही करते है, होते नहीं है, और कोशिश भी सिर्फ इस लिए करते है, ताकि मुआशरे में अपने लिए बैलेंस बना सके।

मेरे लिए हर एक घटना जो ग़लत है, वो ग़लत है, लेकिन मेरे दोस्तों में ही कुछ एक ऐसे भी हैं, जिनके लिए हर एक घटना ग़लत नहीं है। सिर्फ़ मेरे क़ुर्बानी करने पर कोई सीधे आकर मेरे मज़हब को आतंक फैलाने वाला कह देता है, और मुझे नीच और आतंकवादी जैसे लक़ब से नवाज़ता है, उसपर, मैं जिसे अपना बेस्ट फ्रेंड समझता आया हूँ, उसका लाइक होता है, उसपर मेरी टिप्पणी के एवज में उस कॉमेंट करने वाले का फ़ेवर मेरे बेस्ट फ्रेंड के ज़रिए होता है। ये कैसी मानसिकता है, मुझे इस मानसिकता पर बात करनी है, आख़िर ऐसा क्या है, जिसने इतनी नफ़रत घोल दी कि एक ही तरह की बात पर नज़रिया तक बदल गया।

इन मोब्लिंचिंग मे उर्दू नाम वालों के साथ जो वारदात होती है क्या वो आतंकवाद नहीं है, अगर नहीं तो आतंकवादी होने का डेफिनेशन क्या है? क्या सिर्फ़ मुसलमान होना ही आतंकवाद है? क्या सिर्फ़ क़ुर्बानी करना जिससे जानवर के बदन से ख़ून निकलता है, जिसे हम और वो दोनों खाते है, नीच होने के साथ साथ आतंकवादी होना भी है? लेकिन उस नज़रिये पर सोर्फ़ मैं ही नीच और आतंकवादी कैसे हो गया, मेरे वो दोस्त क्यों नहीं हुए जिसने मुझे उसी वजह से नीच कहे जाने पर लाइक कर टिप्पणी करने वाले के फ़ेवर में मुझसे बहस की, वो खुद नीच और आतंकवादी क्यों नही हुए, आख़िर वो भी तो गोश्त खाते है, क्या वो जो गोश्त खाते हैं, वो किसी पेड़ पर उगता है?

हमारे मुआशरे में साम्प्रदायिकता घोल दी गई है, कल तक जो नफ़रत उनके ज़ेहन के किसी कोने में थी आज पूरी तरह से ज़ाहिर हो रही है। अक्सर हमसे ही सवाल किया जाता है, तुम लोग ऐसा लिखते ही क्यों हो, क्या ऐसा कहने वाले लोग इसपर बात करेंगे, ऐसी घटना घटती ही क्यों है, जिसकी वजह से हमें लिखना पड़ता है, अगर नहीं तो वैसे लोग अपने आप को किस तरह सेक्यूलर कहते है, और हम जैसे लोग ही उनपर यक़ीन कैसे कर लेते है? मुझे लगता है, ऐसे दो तरह के नज़रिए वाले लोग सबसे ज़्यादा सेक्यूर है, हमारे सामने वो सेक्युलर बन जाते हैं और उन जैसे लोगों के सामने कम्युनल बन जाते है, जो लोग एक मानसिकता के तहत भीड़ बन कर हम जैसे लोगों की ही हत्या कर देते हैं।।

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