धर्म

वह ही उपासना के योग्य है वह संपूर्ण जगत का स्वामी है : देखें वीडियो

मुदित मिश्र विपश्यी
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चेतनतत्त्व समष्टि जगत (ब्रह्माण्ड) से सहित है, यथा-

*सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् *।
**स भूमिं विश्वतो वृत्त्वात्यतिष्टद्दशाङ्गलम्॥*
( *श्वेता ० ३ । १४* )

अर्थ – वह पुरुष हजारों सिर, हजारों नेत्र और हजारों पाँवों वाला है। वह इस ब्रह्माण्ड को चारों ओर से घरकर भी दस अंगुल परे खड़ा है अर्थात् दसों दिशाओं में व्याप्त हो रहा है। समष्टि अन्तःकरण के एक और विभु होने से वह एक और सर्वव्यापक है और सर्वव्यापकता के कारण सर्वज्ञ है। इसका संज्ञा ईश्वर=पुरुष=विशेष=सगुण ब्रह्म=अपरब्रह्म और शबल ब्रह्म है। इसकी अपेक्षा से चेतनतत्त्व परमात्मा कहलाता है।

शुद्ध चेतन तत्त्व जडतत्त्व से निखरा हुआ केवल शद्ध ज्ञानस्वरूप है। यथा-

*एतावानस्य महिमातोज्यायाँश्च पूरुषः।*
*पादोऽस्य विश्वाभूतानि त्रिपादस्यामतं दिवि *॥
( *ऋ० १० । ९०।३* )

यह इतनी बड़ी तो उसकी महिमा है। पुरुष (परमात्मा-शद्धचेतन-तत्त्व) इससे कहीं बड़ा है। सारे भूत इसका एकपाद हैं। उसके तीन पाद अमतस्वरूप अपने प्रकाश में हैं। इसकी संज्ञा शुद्ध ब्रह्म-निर्गुण- ब्रह्म पर ब्रह्म और परमात्मा है। यह जडतत्त्व की सारी उपाधियों समष्टि, व्यष्टि, एकत्व, बहुत्व इत्यादि से परे केवल शुद्ध ज्ञानस्वरूप है।
व्यष्टि अन्तःकरणों के समष्टि अन्तःकरण के साथ सम्बन्धित होने से जीव ईश्वर का ही अंशरूप भिन्न-भिन्न स्थानों में बतलाया गया है। यथा-

*यश्चिन्मात्ररसोऽपि नित्यविमलोपाधेर्गुणैरीश्वरो हेयैः क्लेशमुखैर्गुणैर्विरहितो मुक्तः सदा निर्गुणः*।
*सोऽस्मान् बुद्धिगुणैः स्वयं निगडितान् स्वांशान् कृपासागरो दीनान्मोचयतु प्रभुर्गुणमयं पाशं दहन् लीलया *॥
( *योगवार्त्तिक पा० १ स० १* )

सांख्यने आत्मा के शुद्ध स्वरूप को सर्वव्यापक, निर्गुण, गुणातीत, निष्क्रिय, निर्विकार, अपरिणामी, कूटस्थ, नित्य माना है। जो सांख्य ग्रन्थों के इन टीकाकारों को भी अभिमत है। इसके अनुसार आत्मा में जाति नहीं रह सकती, क्योंकि जो विभु है उसमें जाति नहीं रहती-जैसे आकाश । इसके अतिरिक्त एक जाति में जो व्यक्तियाँ होती हैं, उन व्यक्तियों में परस्पर भेद अथवा विलक्षणता के निमित्त कारणरूप, अवयवों की बनावट, गुण, कर्म, देश, काल, दिशा आदि होते हैं।

उपर्युक्त बतलाये हए आत्मा के, लक्षण में इनमें से किसी भी निमित्त की सम्भावना नहीं हो सकती। इसके अतिरिक्त जब त्रिगुणात्मक जड़, अग्नि, वायु आदि के शुद्ध स्वरूपमें एकत्व है, तो गुणातीत आत्मा के शुद्ध ज्ञानस्वरूपमें बहुत्व कैसे सम्भव हो सकता है? कपिल-जैसे आदि विद्वान् और सांख्य-जैसी विशाल प्राचीन फिलासफी के साथ परुष अर्थ परब्रह्म के इस प्रकार के लक्षण का कोई मेल नहीं बैठ सकता। बहुत सम्भव है कि नवीन वेदान्तियों के कटाक्ष के विरोध में नवीन सांख्यवादियों ने भी अद्वैत के खण्डन और द्वैत के समर्थन में इस प्रकार की युक्तियों को प्रयोग करने में कोई दोष न समझा हो। फिर भी प्राचीन सांख्य और इन नवीन सांख्यवादियों में आत्माका शुद्ध केवली स्वरूप एक ही प्रकार का है।

कोई भेद नहीं है, केवल कहने मात्रके लिये एकत्व और बहुत्वमें भेद है। जाति से अभिप्राय सत्तामात्र ज्ञान स्वरूपक मानने कोई दोष नहीं आता ।

(ओमानंदतीर्थ,पातंजलयोगप्रदीप,पृष्ठ ८१)

मुदित मिश्र विपश्यी
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अग्निमग्निं हवीमभिः सदा हवन्त विश्पतिं।हव्यवाहं पुरुप्रियं ।।

ऋग्वेद १-१२-२।।??

हे उपासकों, आप आस्था और निष्काम समर्पित कर्मों द्वारा ईश्वर की उपासना करो। उस का आव्हान करो। वह ही उपासना के योग्य है। वह संपूर्ण जगत का स्वामी है। वह विद्वान मनुष्यों का प्रिय है। वह ही सबका रक्षक और प्रगति करने वाला है।??

O devotees, you invoke the resplendent God by faith and dedicated noble deeds. He is only worth to be prayed. He is the Lord of all. He is beloved of wise. He is the protector and promoter of the people.(Rig Veda 1-12-2)??

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