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#सत्तर_सालो_में_मुसलमानों_ने_जो_बोया_वही_आज_काट_रहे हैं!

आजादी के इतने सालो बाद भी आज मुझे लगता है मदरसो ने सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान दिया नतीजा आज इसलामी तरबियत याफ्ता लोग आटे मे नमक के बराबर है
वरना आज कही ना कही मुसलमान समुदाय भी अपने खिलाफ संघर्ष करने के लिए मैदान मे मौजूद नजर आता

हमारी जमातो व संगठनो ने कभी लिबास टोपी और लम्बी लम्बी दुआओ से आगे कुछ सोचा ही नही और हमारे लीडरो व रहबरो ने संघर्ष के मुकाबले मे खानकाहो मे छिपकर बैठने को तरजीह दी जैसे बाकि धर्मो के राहिब करते है

इतनी गलतियो के बावजूद मुसलमानो की सबसे बड़ी गलती है कि कुरआन से रिश्ता तोड़ दिया और बगैर सोचे समझे जाने कुरआन को नाजरा पढने को महत्ता दी जबकि कुरआन से बगैर समझे हिदायत पाना ना मुमकिन है इसी लिए मुसलमानो की बड़ी तादाद दीन से ज्यादा खिलाडियो व फिल्मी एक्ट्रेस की मालूमात ज्यादा रखती है

60 या 70 सालो मे मुसलमानो ने जितनी मेहनत अपने अपने फिरको के लिए की उसकी 20% भी इसलाम के लिए करते तो आज मुल्क के हालात ऐसा ना होते तकरीरे चंदा बटोरने की जगह इस्लाह के लिए होती तो आज बेअसर ना होती बल्कि लोगो के लिए हिदायत का जरिए बनती

हमारे देश में बड़े बड़े इज्तमे होते है जिनमे लाखो रूपये खर्च होते है और जिनमे कई कई घंटो की दुआऐ होती है सब फिजूल है अगर हम बुराईयो के खिलाफ जद्दोजहद नही करते क्योंकि दीन भीड़ से वजूद मे कभी नही आया

आज मुसलमानो की मस्जिदे मदरसे इज्जत आबरू जान माल कुछ सुरक्षित नही और मुसलमान रात-दिन तस्बीहात मे मशरूफ है क्या यही दीन है क्या अल्लाह के रसूल स○ ने यही तालीम सहाबा को दी थी

जबकि हम देखते है तारीख के उन सुनहरे पलो को जब अल्पसंख्यक होकर बद्र मे मुसलमानो ने बहुसंख्यक काफिरो को शिकस्त दी हम देखते है उस वक्त को जब नबी-ए-करीम सल्ल○ पेट पर पत्थर बांधकर इस दीन के लिए जद्दोजहद करते थे हम देखते है उस नबी स○ को जो उहद के मैदान मे जख्मी होकर भी कुफ़्र से दो-दो हाथ करते थे और एक दिन पूरे अरब पर इसलाम का परचम लहराया था

अफसोस अल्लाह की इतनी मार के बावजूद भारत के मुसलमानो को ये सब याद नही आया नाकारा कौम के बदतरीन रहबरो ने इस कौम को दलितो से भी नीचे लाकर खड़ा कर दिया और अपनी नाकामी को छिपाने के लिए लोगो को बेवकूफ बनाते है कि मुसलमानो दुआ करो एक दिन अल्लाह जरूर कामयाब करेगा यही वो लोग है जो मुसलमानो मे रहबानियत फैला रहे है जिन्होने मुसलमान नोजवान नस्ल को बुजदिल बना दिया

इस कौम के बदतरीन लोग वो है जो दूसरो की इंतेज़ार मे खामोश बैठ जाते है और जुल्म को बर्दाश्त करते रहते है

मुस्लिम कौम के आलिम हो या जाहिल सभी बेफिक्र हर खतरे से अंजान जानवरो की तरह जी रहे है जबकि संघ बड़ी प्लानिंग के तहत हमारी ही नस्लो से हमारी कौम की कब्रे खुदवा रहा है किसी आलिम का कौल है कि “इसलाम व बुजदिली दोनो एक जगह जमा नही हो सकती”

आतिश-ए-नमरूद से अगर इब्राहीम डर गए होते आज आजर से भी बड़े बुत तराश होते, अल्फाज तल्ख हो सकते है इसके लिए ? लेकिन हकीकत से वही मुंह मोडेंगे जिन्होने अपने रहबरो को खुदा तस्लीम कर लिया हो

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