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सावरकर, गोलवलकर व दिग्विजय नाथ : कभी न भूलने वाला सच!

Rajender Godara
15 March 2018
Govt. Dungar College Bikaner (Rajasthan)
(Rajasthan)

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सावरकर, गोलवलकर व दिग्विजय नाथ

आप सोचेंगे इन तीनों का मेल क्या है ?
इन तीनों में क्या समानता है ?
और गांधीजी की हत्या से इन का क्या सम्बंध है ?

तो साहब लोग तैयार हो जाइये
ये वो तिकङी है जो मुख्य रूप से महात्मा गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार थी वास्तव में नाथूराम गौडसे इन का एक मोहरा था इन के अलावा भी कुछ और लोग या संगठन या कोई बाहरी लोगों का भी बीसवीं सदी के इस महामानव की हत्या में अप्रत्यक्ष हाथ हो सकता है पर प्रत्यक्ष रूप से गांधीजी की हत्या में इन का जो रोल था वो उस रोल से बहुत बङा था जितना की दुनिया के सामने आया

विनायक सावरकर जिन के नाम के आगे पता नहीं वीर कब व क्यों लग गया किसी को इस बारे में जानकारी हो तो बताना
क्यों की संघ के जो प्रचारक सावरकर के बारे में संघ की शाखाओं में जो ज्ञान बखारते है उस में सावरकर का सबसे बङा कारनामा गांधी जी की हत्या को ही बताते है वो प्रचारक सावरकर को मिली डबल आजीवन कारावास व काला पानी की पोर्ट ब्लेयर जेल में कोल्हू में बेल की जगह जोते गये सावरकर और उस के भाई के बारे में भी बताते है पर उन सबका सबसे ज्यादा जोर गांधी हत्या पर ही होता है जिसे वे हर तरीके से साम दाम दण्ड भेद सब कुछ लगाकर दुनिया का सबसे जायज वध ( वे गांधीजी की हत्या को गांधी वध कहते है जैसे की रावण वध कंश वध या दुर्योधन वध कहा जाता है )
बताते है

वैसे मेरी आज की पोस्ट मुख्यतः गोरखपुर पीठ के पीठाधीश्वर महंत दिग्विजय नाथ पर है जो योगी आदित्य नाथ के गुरू मंहत अवैधनाथ के गुरू थे
पर शुरुआत में कुछ व्यख्यान इन दो मंहतों गोलवलकर व सावरकर का जिन के नाम के आगे तो मंहत नहीं लगता पर इन दोनों का दर्जा आर एस एस व हिंदू महासभा में किसी मंहत या मठाधीश से कम भी नहीं था

नाथूराम गौडसे ने जो बयान कोर्ट में दिया था और जिसे संघ बढा चढा कर एक किताब ” गांधी वध क्यों ” या ” मैं ने गांधी को क्यों मारा ” में दर्शाया गया है और जिसे संघ कहता है की इस पुस्तक पर 1948 से ही बेन लगा दिया गया था पर सच्चाई एन उल्ट है 1952 के चुनावों में इस किताब को खुलेआम बांटा था और दिग्विजय नाथ ने तो सैंकड़ों प्रतियां खुद अपने हाथों से गोरखपुर व आसपास के ईलाके में बांटी थी उस के बाद भी कभी इस पुस्तक पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया था

मुख्यतः ये बयान या न्यायालय में दिया गया भाषण जो की नाथूराम गौडसे ने पढा था सावरकर व गोलवलकर ने ही लिखा था इन दो वकीलों ने अपनी सारी वकालत उस बयान को लिखने में लगा दी जिस के बारे में उन का दावा था की ये बयान आने वाली पीढियों को रास्ता दिखायेगा और ये ही बयान गौडसे के साथ साथ सावरकर गोलवलकर व उन के संगठनों को भी अमर बना देगा पर गौडसे को तो ना हिंदी आती थी ना अंग्रेजी वो टपोरी तो उस बयान को पढ भी नहीं सकता था तब सावरकर ने अंग्रेजी में लिखे उस बयान को मराठी में अनुवाद किया पर लगभग अनपढ गौडसे को तो मराठी भी मामूली पढनी आती थी औऱ तब गौडसे ने उसे थीरे धीरे एक एक अक्षर जोङ कर पढा ऐसे लगता था जैसे तीसरी चौथी का कोई छात्र एक एक आखर जोङ कर हिंदी का कोई अध्याय पढता है

बहरहाल सावरकर व गोलवलकर इस हत्या की बङी मछलिया थी मछली ही नहीं बल्कि मगरमच्छ थे पर इन पर फिर कभी लिखुंगा आज तो मंहत दिग्विजय नाथ का नंबर है

बापू की हत्या और मंहत दिग्विजय नाथ नाथ समुदाय की धर्मपीठ जो की गुरु मतश्य नाथ के शिष्य गुरू गोरखनाथ की परम्परा से चल रही है लम्बा ना चलकर में मंहत दिग्विजय नाथ पर ही आता हूं नन्हे सिंह जिनका जन्म 1894 में उदयपुर में हुआ था माता पिता बचपन में ही गुजर जाने के कारण इन्हें गोरखपीठ भेज दिया गया जहां तबके मठाधीश योगी बाबा ब्र्ह्मनाथनने उन्हें दीक्षा दी और नाम दिया योगी दिग्विजय नाथ 1935 में इन्हीं दिग्विजय नाथ ने गुरू के स्वर्गारोहण के बाद गद्दी धारण की और नाम मंहत दिग्विजय नाथ धारण किया

27 जनवरी 1948 को मंहत दिग्विजय नाथ ने खुलेआम दिये अपने तथाकथित उपदेश में गांधीजी की हत्या को देश के लिए जरुरी बताया उन्होंने 20 जनवरी को गांधी जी की हत्या के असफल प्रयास के असफल होने को देश का दुर्भाग्य बताया और आगे ये भी कहा की वे 1937 से हिंदू महासभा के तबसे पदाधिकारी है जब सावरकर पहली बार इस के अध्यक्ष बने और हिंदू महासभा का अंत तक प्रयास रहेगा की आजाद भारत में महात्मा गांधी कम से कम सांस ले

इन्हीं दिग्विजय नाथ ने 1943 में एक पिस्टल खरीदी जिसका बाकायदा अंग्रेजी सरकार से लाइसेंस लिया गया और ये पिस्टल 1944 में चोरी हो गई जिसकी रिपोर्ट बाकायदा थाने में लिखाई गई कहा जाता है की उस जमाने में कानून व्यवस्था ऐसी थी की अगर किसी के जूते भी खो जाये तो 24 घण्टे के अंदर पुलिसकर्मी ढूंढ लेते थे पर वो पिस्तौल साढे तीन साल बाद तब मिली जब

नाथूराम गौडसे नामक दंरिदे ने उसी पिस्तौल से गांधीजी की हत्या की गांधीजी पर पहला हमला पिस्टल से 1944 से ही शुरू हो गए थे अब पता नहीं वे हमले इसी दिग्विजय नाथ की नामी पिस्तौल के गुम हो जाने के साथ ही कैसे शुरू हुए ???

30 जनवरी 1948 को बापू की हत्या के बाद मंहत दिग्विजय नाथ को भी अन्य षडयंत्रकारीयों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया और 9 महिने तक चले शुरूआती मुकदमे के फैसले तक वे जेल में रहे और सावरकर व गोलवलकर की तरह ही साक्ष्य में कमी के कारण बरी हुए न्यायालय ने तब भी कहा था की वे ये नहीं कहते की सावरकर गोलवलकर व दिग्विजय नाथ इसलिये बरी हो रहे है की वे निरपराध है बल्कि इसलिये बरी हो रहे है क्यों की इन के खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं पेश किये गए ध्यान दिजियेगा न्यायधीश महोदय ने ये नहीं कहा की इन के खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं है बल्कि कहा की पुख्ता सबूत पेश नहीं किये गए

गांधीजी की हत्या के बाद जस्टिस जीवन लाल कपूर ने भी कहा की सावरकर गोलवलकर व दिग्विजय नाथ की भूमिका बेहद संदिग्ध है और जस्टिस कपूर ने ये भी कहा की एक मठ के मठाधीश का इस में अहम रोल होना ही ये सिद्ध करने के लिए काफी है की इस हत्या से देश में हिंदू मुश्लीम दंगा भङकाने की एक बहुत बङी योजना थी जिसे सरकार की तुरंत कारवाई ने नाकाम कर दिया

जस्टिस कपूर ने इस पर और जांच खास तौर से मंहत दिग्विजय नाथ की भूमिका और उस की सावरकर और गोलवलकर की जुगलबंदी भी गम्भीरता से और जांच करवाने की आवश्यकता जताई

इन्ही मंहत दिग्विजय नाथ ने 1952 के चुनाव में कहा था की अगर हिंदू महासभा की सरकार बनती है और विनायक सावरकर प्रधानमंत्री बनते है तो मुश्लमानों से वोट डालने का हक दस साल के लिए छिन लिया जायेगा और दस साल के बाद भी उस की समीक्षा उसी तरह की जायेगी जैसे की आरक्षण की की जायेगी और अगर आरक्षण आगे कायम रहा तो मुशलमानों को भी वोट डालने पर प्रतिबंध आगे भी जारी रहेगा पर हिंदू महासभा का तो खाता ही नहीं खेला और मंहत के सपने धरे रह गये

ये ही मंहत दिग्विजय नाथ 1967 में गोरखपुर से सांसद चुने गए हिंदू महासभा के नाम पर पर उस पार्टी की मान्यता नहीं थी इसलिये इन्हें निर्दलीय सांसद ही माना गया इन के बाद मंहत अवैध नाथ 1970 में गोरखपुर से सांसद चुने गय वे भी हिंदू महासभा के नाम पर निर्दलीय सांसद ही थे मंहत अवैध नाथ ही 1989 में निर्दलीय तब इन्हें हिंदू युवा वाहिनी का बताया गया पर चुनाव आयोग की मान्यता ना होने के कारण इन्हें निर्दलीय सांसद ही माना गया और 1991 व 1996 में भाजपा से सांसद चुने गये जिनका निधन अभी कोई दो साल पूर्व हुआ है और जिनके अंतेय्षटी में प्रधानमंत्री मोदी जी भी शामिल हुए

इस के बाद 1998 1999 2004 2009 व 2014 मे योगी आदित्य नाथ लगातार भाजपा की टिकट पर गोरखपुर से लगातार सांसद रहे अभी पिछले साल उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बनने पर उन्होंने गोरखपुर के सांसद पद से इस्तीफा दे दिया कल हुए उपचुनाव में लगभग 30 साल बाद गोरखपुर के मठाधीश से गोरखपुर के सांसद की सीट जनता ने वापिस ले ली

दस बार गोरखपुर पीठ के मठाधीश गोरखपुर के सांसद बने अपने आप में बहुत बङी बात है पर गांधीजी की हत्या का पाप क्या कभी इस पीठ के पीछे हमेशा रहेगा कभी ना भूलने वाला सच

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