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क़ानून, करुणा और क़ाज़ी

Avyakta
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आज 1 अगस्त है। आज ही के दिन 1920 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन की शुरुआत की थी।

उस दिन के अपने वक्तव्य में महात्मा गांधी ने अन्य बातों के अलावा यह भी कहा था—

“दुनिया के किसी भी भाग में लोग एकाएक सुधारों को स्वीकार नहीं कर लेते। शुरुआत हमेशा थोड़े लोगों से होती है। और जब अधिकांश लोग थोड़े व्यक्तियों की दृढ़ता से अवगत हो जाते हैं, तब उनका अनुकरण करते हैं।

…सब लोगों के करने पर ही हम अमुक कार्य करेंगे, ऐसा सोचें तो सुधार होगा ही नहीं। इससे विलंब तो होता ही है, कभी-कभी उससे बहुत नुकसान भी हो जाता है। इसके अलावा सबकी या अधिकांश लोगों की बाट जोहना तो अपने कर्तव्य के प्रति हममें विश्वास की कमी को दिखाता है।”

गांधी के इस कथन को समाज में सुधारों के प्रति अनिच्छा और उदासीनता के कई संदर्भों में समझा जा सकता है।

पुरोहित सभी धर्मों में पाए जाते हैं। जबसे ये पुरोहित अपने-अपने मजहबों के ठेकेदार हो गए, उन्होंने सबसे अधिक पाबंदियां और कुप्रथाएँ महिलाओं पर ही लादीं।

इसलिए किसी भी मजहबी कुप्रथा में सुधार का सबसे अधिक विरोध पुरोहित ही करते हैं। या फिर वे लोग करते हैं जो अपनी दोषपूर्ण परवरिश की वजह से इन कुप्रथाओं को अंधविश्वास की हद तक उचित और ‘धर्मसंगत’ मानते हैं।

दूसरी बात कि समाज में सुधारों का ठेका केवल सरकारें नहीं ले सकतीं। यह उनके बस का भी नहीं है। सुधार की शुरुआत अगर व्यक्ति, परिवार और समाज के स्तर पर हो, तो वह दूरगामी और प्रभावी होता है।

उदाहरण के लिए, दहेज से लेकर मृत्युभोज तक को प्रतिबंधित करने के लिए केन्द्र और राज्य सरकारों ने कानून बनाए, लेकिन वे कितने कारगर हुए यह पड़ताल का विषय हो सकता है।

करुणा के अभाव में कानून क्या करेगा! करुणा के अभाव में काज़ी भी क्या करेगा! वही करेगा जो कानून और काज़ी के भीतर बैठा पुरुष या पुरोहित करेगा।

सवाल तो यह है कि पुरुष और पुरोहित के भीतर करुणा कैसे पैदा हो!

 

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