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ज़ाहिदनामा : आज के भारत में “औरंगज़ेब” होना राजनैतिक कारणों से गुनाह है : तथ्य, तर्क और सच!

औरंगज़ेब और दारा शिकोह : तथ्य, तर्क और सच

प्राचीन और मध्ययुग में सत्ता और सिंहासन पर कब्ज़ा सदैव ही रक्तरंजित रहा है, और प्राचीन तथा मध्ययुग ही क्युँ ? आधुनिक युग में नेपाल की राजशाही एक ताज़ा उदाहरण है जब एक राजकुमार पारस ने 1 जून 2001को सिंहासन पर बैठे राजा के सारे परिवार की हत्या करके सत्ता और सिंहासन पर काबिज़ होने की कोशिश की।

(17 साल पहले नेपाल के राजा-रानी समेत शाही परिवार के 11 लोगों की हत्या कर दी गई थी

आज ही के दिन 2001 में नेपाल के शाही परिवार के 11 लोगों की हत्या कर दी गई थी। इसमें राजा-रानी और परिवार के 9 अन्य सदस्य शामिल थे। इस वारदात को देश के युवराज दीपेंद्र ने अंजाम दिया था। हत्याकांड के बाद दीपेेंद्र ने खुद को भी गोली मार ली थी। इस वजह से घटना के पीछे की वजह अभी रहस्य बनी हुई है। कहा जाता है कि दीपेंद्र अपनी शादी की बात को लेकर मां से नाराज था। साथ ही हथियार सौदे को लेकर राजा बीरेंद्र से नाराज था। उसे यह भी आशंका थी कि राजा कहीं निर्वाचित लोकतांत्रिक सरकार को पूरी सत्ता न सौंप दें। इसी वजह से उसने यह कदम उठाया। पूरे शाही परिवार के खात्मे के बाद बीरेन्द्र बीर बिक्रम शाह के छोटे भाई राजकुमार ज्ञानेंद्र नेपाल के राजा बने। )

 

इसके कारण में आपको “धर्म” नहीं मिलेगा क्युँकि मरने और मारने वाले दोनों का धर्म इस्लाम नहीं है। रक्तरंजित तख्यापलट, साम्राज्य विस्तार या सत्ता हस्तानांतरण के लिए युद्ध में “धर्म” तभी एक कारण होगा जब इनमें कहीं ना कहीं “इस्लाम” और “मुसलमान” विजेता होगा।

मुसलमान बादशाह जंग जीतकर सिंहासन पर बैठा तो वह ज़ालिम, हिन्दुकुश और कट्टर था जो अपने लोगों को मारकर सिंहासन पर बैठा, और मुसलमान बादशाह यदि हार गया तो यह जीतने वाले हिन्दू राजा का पराक्रम और शौर्य की गाथा होगी।

खबीस सिद्दीकी ने संघ की इसी लाईन पर “दारा शिकोह और औरंगज़ेब” के संबन्धों पर एक झूठ गढ़ा है। खबीस ने लिखा कि औरंगज़ेब बचपन से ही दारा शिकोह से उसके अन्य धर्म के प्रति आकर्षण से जलता था और उसे और उसके बेटे को मार दिया और उसकी मुंडी शाहजहाँ के सामने परोस दी, ब्ला ब्ला ब्ला इत्यादि

पर सच क्या है ? इसे जानने के लिए आपको इतिहासकार यदुनाथ सरकार की पुस्तक “हिस्ट्री आॅफ औरंगज़ेब” के पृष्ठ संख्या 9 से 11 पढ़ना पड़ेगा।

इसी इतिहास को दो जगह से और प्रमाणित किया जा सकता है, ऐनी मैरी मिशेल की पुस्तक “द एम्पायर आफ ग्रेट मुगल्स” में दारा शिकोह और औरंगज़ेब के संबन्धों का स्पष्ट चित्रण है, यही नहीं इस घटना का ज़िक्र शाहजहाँ के दरबार के कवि अबू तालिब ख़ाँ ने अपनी कविताओं में किया है। आप उसे भी पढ़ सकते हैं। हुआ यूँ कि

चार बेटों दारा शिकोह, शाह शुजा, औरंगजेब, मुराद बख्श
के पिता शाहजहाँ को हाथियों की लड़ाई देखने का बहुत शौक था, लालकिले के सामने से लेकर इत्मादुद्दौला तक ताजमहल के पीछे का पूरा मैदान इसी काम में प्रयोग किया जाता था और शाहजहाँ लालकाले में बैठ कर यह खूनी खेल देखा करता था। इसे इतिहासकारों ने “हाथीघाट का इतिहास” कहा है।

दरअसल अपने सबसे चहेते बेटे “दारा शिकोह” की शादी का जश्न मनाने के लिए 28 मई 1633 को लालकिले की परीखा के नीचे “हाथी युद्ध” का आयोजन हुआ। इसमें दो हाथियों “सुधाकर” और “सूरत सुंदर” का युद्ध हुआ। 18 वर्षीय दारा शिकोह की यह साजिश थी कि इसी युद्ध में 14 वर्षीय भाई “औरंगज़ेब” की हत्या करा दी जाय और उसने “सुधाकर” हाथी को शराब पिला दी।

युद्ध में यह हाथी “सुधाकर” भड़क गया और घोड़े पर बैठे “औरंगज़ेब” की ओर के लोगों को रौदने लगा। और फिर उस हाथी की चपेट में 14 वर्षीय “औरंगज़ेब” और शाहजहाँ के दो शेष बेटे भी आ गये, जो खतरा देख भाग खड़े हुए और “औरंगज़ेब” लोगों को बचाने के लिए उस हाथी से भिड़ गये और तलवार से हाथी के साथ युद्ध करने लगे। इसी सबके बीच मौका देखकर शाहजहाँ के दूसरे सबसे बड़े बेटे शाह सुजा ने हाथी की आँख में भाला मारा जिससे हाथी नीचे गिर गया।

और इस तरह औरंगज़ेब हाथी और दारा शिकोह की साजिश से अपने पराक्रम से जीत गये। पिता शाहजहाँ ने आगे बढ़कर औरंगज़ेब को गले लगा लिया। फिर डांटा, ‘तुम भी भागे क्यों नहीं?’ औरंगजेब ने जवाब दिया- मर भी जाता, तो कोई शर्म की बात नहीं थी। मौत तो हर किसी को आनी है। शर्म तो मेरे उन भाइयों को आनी चाहिए, जिस तरह वे भागे।

यह दारा शिकोह की बचपन में ही औरंगज़ेब को मार देने की वह साजिश थी जिसने औरंगज़ेब के हृदय में दारा शिकोह के प्रति द्वेष पैदा कर दिया और वह दारा शिकोह से सतर्क हो गये।

अब खबीश सिद्दीकी से पूछिए कि कौन किससे बचपन से द्वेष रखता था ? उसके पास ना जवाब होगा ना तर्क होगा ना तथ्त, सिर्फ़ संघियों को खुश करने की कहानियाँ होंगी।

अब दूसरे हिस्से “दारा शिकोह” की हत्या पर आते हैं। यह फ्रांसिस बर्नियर की किताब “ट्रैवल्स इन द मुगल एंपायर” से आप पुष्टि कर सकते हैं।

मुगल राजकुमार दारा शिकोह बादशाह शाहजहां का बेहद करीब था और उसके अगला बादशाह बनने की पूरी संभावना थी पर ऐसा हो न सका तो इसकी वजह उसका बदमिजाज, घमंडी और युद्ध कौशल में कमजोर होना रहा।

दारा शिकोह की हार की वजह औरंगजेब से ज्यादा वो शख्स था जिसने युद्ध के दौरान ऐन वक्त पर दारा को धोखा देकर अपनी जूतों से हुई पिटाई का बदला ले लिया और वह था दारा शिकोह का सेनापति खलीलुल्लाह जिसने बिल्कुल मौके पर दारा शिकोह की उसके साथ की गयी बत्तीमीजी का विश्वासघात करके बदला लिया। यह बात 1657 की है जब शाहजहां के मरने की अफवाह जंगल की आग की तरह फैलने लगी थी और चारों राजकुमारों ने बादशाह बनने की तैयारी कर ली थी।

शाहजहां को पता था कि उसकी सल्तनत में सत्ता के लिए 4 बेटों के बीच युद्ध रोकना तकरीबन नामुमकिन है। वह किसी भी तरह इस टकराव को रोकना चाहता था। और इसी कारण शाहजहां ने अपने साम्राज्य को 4 हिस्सों में बांट दिया।

शाह शूजा को बंगाल दिया गया, औरंगजेब को दक्कन यानी दक्षिण का इलाका मिला, मुरादबख्श को गुजरात दिया गया और दारा शिकोह को काबुल और मुल्तान मिला।

शातिरपना देखिए कि दारा शिकोह को छोड़कर सबने अपने जिम्मेदारी संभाल ली जबकि दारा शिकोह बादशाह के पास ही बना रहा। वह ₹2 करोड़ महीने का मुआवजा लेकर शाहजहाँ के साथ ही लगा रहा।

चारों ने खुद को मजबूत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। शूजा, मुरादबख्श और औरंगजेब जहां फौजी ताकत बटोर रहे थे वहीं दारा की कोशिश थी कि कैसे शाहजहां को भरोसे में लेकर सिंहासन पर कब्जा किया जाए।

लंबे वक्त तक दारा और बाकी तीन भाइयों को बीच शह और मात का खेल चलता रहा। दारा ने शाहजहां को भरोसे में लेकर कई ऐसे फरमान जारी करवाए जिससे तीनों भाई दारा को लेकर अविश्वास से भर गए।

यह अविश्वास स्वयं दारा शिकोह ने पैदा किया, दारा वक्त के साथ इतना मजबूत हो चुका था कि उसके लिए शाही दरबार में शाहजहां के करीब ही अपना सिंहासन बनवा लिया था। शाहजहाँ मुमताज की याद में पीकर ताजमहल निहारा करते और दारा शिकोह उनकी ओर से आदेश जारी करने लगा था। दारा को सबसे ज्यादा डर औरंगजेब से था। उसने एक नहीं कई बार औरंगजेब के खिलाफ फरमान भिजवाए। इससे औरंगजेब और दारा के बीच दुश्मनी और गहरी हो गई।

खबीश सिद्दीकी को लगता है कि यह दुश्मनी उसके उपनिषदों, गीता और रामारण के संस्कृत से फारसी में अनुवाद के कारण हुई ?

दारा ने अपने पिता और बाकी भाइयों के बीच नफरत बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. वह गुप्त रूप से भाइयों को भेजे गए या फिर उनकी तरफ से आए संदेशों को शाहजहां को दिखाकर यह साबित करने की कोशिश करता रहा कि तीनों साजिश कर रहे हैं। पर गौर करने वाली बात यह है कि अब खुद शाहजहां को दारा शिकोह पर भरोसा नहीं था। उसे लगता था कि दारा उसे जहर देने की योजना बना रहा है. उस वक्त दारा और औरंगजेब के बीच जो पत्र व्यवहार हुआ वो खुद शाहजहां के लिए खौफ पैदा करने वाला था।

इसी बीच सितंबर 1657 में शाहजहां की तबियत बिगड़ी और यह अफवाह फैलाई गयी कि उसकी मौत हो चुकी है। सारा दरबार गफलत में चला गया। आगरा की जनता में भ्रम फैल गया. कई दिनों तक दुकानें बंद रहीं. चारों राजकुमारों के बीच बादशाह बनने के लिए खुली जंग शुरू हो गई।

दारा के लिए बादशाह ने बिछाई बिसात शाहजहां को पता था अब खून बहने का वक्त आ चुका है. उसने अपने सबसे करीबी दो सरदारों को बुलाया. इसमें से एक का नाम कासिम खान था। कासिम शाहजहां का भरोसेमंद लेकिन दारा से बहुत नफरत करता था।उसने काफी अनिच्छा से इस जिम्मेदारी को स्वीकारा। दूसरे सरदार थे राजा जय सिंह।

दारा ने दोनों जनरलों को भरोसे में लिया। सेना के साथ जाते वक्त दारा ने उन्हें अमूल्य तोहफे दिए। शाहजहां ने दारा को सलाह दी कि औरंगजेब से निपटने में संयम का परिचय दे।औरंगजेब को एक के बाद एक कई संदेशवाहक भेजे गए लेकिन कोई लौट कर नहीं आया।

समय जैसे जैसे आगे बढ़ रहा था दारा शिकोह-औरंगजेब की भिड़ंत और निश्चित होती जा रही थी। दारा को उसके साथियों ने काफी रोका वो जल्दबाजी न करे। लेकिन दारा शिकोह जिसे लगता था कि शाही खजाना, भारी सेना और पिता का साथ जब उसके साथ है तो उसे कोई नहीं हरा सकता। उसने कूच का फैसला कर लिया।

खबीश सिद्दीकी जी, दारा शिकोह संस्कृत से फारसी में गीता, रामायण और उपनिषद का अनुवाद करने के लिए युद्ध करने नहीं जा रहा था, सिंहासन के लिए युद्ध करने जा रहा था, औरंगज़ेब को मारने जा रहा था।

सेना के साथ औरंगज़ेब के साथ जंग करने के पहले खुद दारा शिकोह अपने पिता शाहजहां के सामने विदाई लेने के लिए पेश हुआ तो दुखी पिता शाहजहाँ ने बेटे को गले लगाया।

शाहजहां ने कहा- ‘ठीक है बेटा, अगर तुमने रास्ता चुन ही लिया है तो ऊपर वाला तुम्हारी ख्वाहिशों की हिफाजत करे’. लेकिन साथ ही गंभीर होते हुए कहा- ‘अगर तुम युद्ध हारते हो तो सोच लेना कि मेरा सामना कैसे कर पाओगे।

सत्ता और सिंहासन पाने के पागलपन में पिता की बातों से ज्यादा प्रभावित हुए बिना दारा ने आगरा से 20 मील दूर चंबल की ओर कूच कर दिया। और वहां पहुंचने के बाद दारा ने तंबू गाड़ने का आदेश दिया। लेकिन इधर औरंगजेब तेजी से आगे बढ़ते हुए आगरा से 5 मील दूर यमुना के किनारे अपनी सेना के साथ आ चुके थे। दारा को जब ये खबर लगी तो उसने जो मोर्चेबंदी की थी उसे छोड़कर वो मुकाबला करने के लिए वापस आया।

खबीश सिद्दीकी, यह होती है युद्ध में चाल और बेवकूफी, यह उपनिषद, रामायण और गीता को अरबी में अनुवाद करने के लिए नहीं लड़ी जा रही थी।

आखिरकार यमुना तट पर दोनों सेनाएं “सामूगढ़” में आमने सामने आ डटीं। दोनों सेनाएं करीब तीन दिन तक एक दूसरे के सामने डटी रहीं।

युद्ध रोकने के लिए शाहजहां ने एक के बाद एक कई फरमान दारा शिकोह को भेजे। सब में एक ही संदेश था कि वह जल्दबाजी न करे और सुलेमान शिकोह का इंतजार करे।

पिता की चिंता से बेपरवाह दारा शिकोह ने एक ही जवाब लिखा कि ‘मैं औरंगजेब और मुराद बख्श के हांथ-पांव बांधकर आपके सामने जल्दी पेश करूंगा’।

अब बताईए रामायण , गीता और उपनिषद को फारसी में अनुवाद कराने के लिए यह युद्ध था या सिंहासन पाने के लिए ? खबीश सिद्दीकी जी ?

29 मई 1658 को “सामूगढ़” में भीषण युद्ध शुरू हुआ। तमाम तलवार तीर भाले बम गोला बारूद चले और फिर दारा शिकोह की सेना में हर कोई औरंगजेब के डर से भागने लगा। औरंगजेब अभी भी अपने हाथी पर सवार था। अगले कुछ पलों में पूरा दृश्य बदल गया. औरंगजेब हिंदुस्तान का बादशाह बन चुका था. दारा को वहां से भागना पड़ा. बाद में दारा पकड़ा गया और मार दिया गया। युद्ध वही जीतता है जो बलवान होता है, और शासन वही करता था जो युद्ध जीतता था।

युद्ध की पूरी जानकारी के लिए फ्रांसीसी बर्नियर की किताब पढ़ें

Travels in the Mogul Empire, A.D. 1656-1668
by Bernier, François, 1620-1688; Constable, Archibald

Publication date 1916
Topics Mogul Empire, India — Description and travel, India — History
Publisher Oxford : University Press
Collection robarts; toronto
Digitizing sponsor MSN
Contributor Robarts – University of Toronto
Language English

 

बाकी औरंगज़ेब के दारा शिकोह के अन्य धर्म पर अध्ययन करने से औरंगज़ेब को दुश्मनी होती तो वह अपने 50 साल के शासन में तमाम मंदिरों के लिए ज़मीन क्युँ दान में देते ? वह यदि हिन्दूकुश होते तो उनके लगभग सभी सेनापति हिन्दू क्युँ होते ?

पढ़िए इतिहासकार और उड़ीसा के पूर्व राज्यपाल तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मध्यकालीन इतिहास विभाग के प्रोफेसर वी• एन• पांडेय की यह पुस्तक


इतिहास के साथ अन्याय

लेखक: प्रो. बी. एन. पांडेय
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इसी प्रकार जब मैं इलाहाबाद नगरपालिका का चेयरमैन था (1948 ई0 से 1953 ई0 तक) तो मेरे सामने दाख़िल-ख़ारिज का एक मामला लाया गया। यह मामला सोमेश्वर नाथ महादेव मन्दिर से संबंधित जायदाद के बारे में था। मन्दिर के महंत की मृत्यु के बाद उस जायदाद के दो दावेदार खड़े हो गए थे। एक दावेदार ने कुछ दस्तावेज दाख़िल किये जो उसके ख़ानदान में बहुत दिनों से चले आ रहे थे। इन दस्तावेज़ों में शहंशाह औरंगज़ेब के फ़रमान भी थे। औरंगज़ेब ने इस मन्दिर को जागीर और नक़द अनुदान दिया था। मैंने सोचा कि ये फ़रमान ज़ाती होंगे। मुझे आश्चर्य हुआ कि यह कैसे हो सकता है कि औरंगज़ेब जो मन्दिरों को तोड़ने के लिए प्रसिद्ध है, वह एक मन्दिर को यह कह कर जागीर दे सकता है कि यह जागीर पूजा और भोग के लिए दी जा रही है। आख़िर औरंगज़ेब कैसे बुतपरस्ती के साथ अपने को शरीक कर सकता था।

मुझे यक़ीन था कि ये दस्तावेज़ जाली है, परन्तु कोई निर्णय लेने से पहले मैंने डॉ0 सर तेज बहादुर सप्रू से राय लेना उचित समझा। वे अरबी और फ़ारसी के अच्छे जानकार थे। मैंने दस्तावेज़ें उनके सामने पेश करके उनकी राय मालूम की तो उन्होंने दस्तावेज़ों का अध्ययन करने के बाद कहा कि औरंगज़ेब के ये फ़रमान असली और वास्तविक हैं। इसके बाद उन्होंने अपने मंशी से बनारस के जंगमबाड़ी शिव मन्दिर की फ़ाइल लाने को कहा। यह मुक़द्दमा इलाहाबाद हाईकोर्ट में 15 साल से विचाराधीन था। जंगमबाड़ी मन्दिर के महंत के पास भी औरंगज़ेब के कई फ़रमान थे, जिनमें मन्दिर को जागीर दी गई थी।

इन दस्तावेज़ों ने औरंगज़ेब की एक नई तस्वीर मेरे सामने पेश की उससे मैं आश्चर्य में पड़ गया। डॉक्टर सप्रू की सलाह पर मैंने भारत के विभिन्न प्रमुख मन्दिरों के महंतों के पास पत्र भेज कर उनसे निवेदन किया कि यदि उनके पास औरंगज़ेब के कुछ फ़रमान हों जिनमें उन मन्दिरों को जागीर दी गई हो तो वे कृपा करके उनकी फ़ोटो-स्टेट कापियाँ मेरे पास भेज दें। अब मेरे सामने एक और आश्चर्य की बात आई। उज्जैन के महाकलेश्वर मन्दिर, चित्रकूट के बालाजी मन्दिर, गोहाटी के उमानन्द मन्दिर, शत्रुंजाई के जैन मन्दिर और उत्तर भारत में फैले हुए अन्य प्रमुख मन्दिरों एवं गुरुद्वारों से सम्बन्धित जागीरों के लिए औरंगज़ेब के फ़रमानों की नक़लें मुझे प्राप्त हुईं। ये फ़रमान 1065 हि0 से 1091 हि0, अर्थात् 1685 ई0 के बीच जारी किए गए थे।

हालांकि हिन्दुओं और उनके मन्दिरों के प्रति औरंगज़ेब के उदार रवैये की ये कुछ मिसाले हैं, फिर भी इनसे यह प्रमाणित हो जाता है कि इतिहासकारों ने उसके सम्बन्ध में जो कुछ लिखा है, वह पक्षपात पर आधारित है और इससे उसकी तस्वीर का एक ही रुख़ सामने लाया गया है। भारत एक विशाल देश है, जिसमें हज़ारों मन्दिर चारों ओर फैले हुए हैं। यदि सही ढंग से खोजबीन की जाए तो मुझे विश्वास है कि और बहुत-से ऐसे उदाहरण मिल जाएँगे जिनसे औरंगज़ेब के ग़ैर-मुस्लिमों के प्रति उदार व्यवहार का पता चलेगा। औरंगज़ेब के फ़रमानों की जाँच-पड़ताल के सिलसिले में मेंरा सम्पर्क श्री ज्ञानचन्द्र और पटना म्यूज़ियम के भूतपूर्व क्यूरेटर डॉ0 पी0एल0 गुप्ता से हुआ। ये महानुभाव भी औरंगज़ेब के विषय में ऐतिहासिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण रिसर्च कर रहे थे। मुझे ख़ुशी हुई कि कुछ अन्य अनुसन्धानकर्ता भी सच्चाई को तलाश करने में व्यस्त हैं और काफ़ी बदनाम औरंगज़ेब की तस्वीर को साफ़ करने में अपना योगदान दे रहे है। औरंगज़ेब जिसे पक्षपाती इतिहासकारों ने भारत में मुस्लिम हुकूमत का प्रतीक मान रखा है, उसके बारे में वे क्या विचार रखतेहैं इसके विषय में यहाँ तक कि शिब्ली जैसे इतिहास गवेशी कवि को कहना पड़ा:

तुम्हें ले-दे के सारी दास्ताँ में याद है इतना।
कि औरंगज़ेब हिन्दू-कुश था, ज़ालिम था, सितमगार था।।

औरंगज़ेब पर हिन्दू-दुश्मनी के आरोप के सम्बन्ध में जिस फ़रमान को बहुत उछाला गया है, वह ‘फ़रमाने-बनारस’ के नाम से प्रसिद्ध है। यह फ़रमान बनारस के मुहल्ला ग़ौरी के एक ब्राह्मण परिवार से संबंधित है। 1905 ई0 में इसे गोपी उपाध्याय के नवासे मंगल पाण्डेय ने सिटी मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया था। इसे पहली बार ‘एशियाटिक-सोसाइटी’ बंगाल के जर्नल (पत्रिका) ने 1911ई0 में प्रकाशित किया था। फलस्वरूप रिसर्च करने वालों का ध्यान इधर गया। तब से इतिहासकार प्रायः इसका हवाला देते आ रहे हैं और वे इसके आधार पर औरंगज़ेब पर आरोप लगाते हैं कि उसने हिन्दू मन्दिरों के निर्माण पर प्रतिबन्ध लगा दिया था, जबकि इस फ़रमान का वास्तविक महत्व उनकी निगाहों से ओझल रह जाता है।
यह लिखित फ़रमान औरंगज़ेब ने 15 जुमादुल-अव्वल 1065 हि0 (10 मार्च 1659 ई0) को बनारस के स्थानीय अधिकारी के नाम भेजा था जो एक ब्राह्मण की शिकायत के सिलसिले में जारी किया गया था। वह ब्राह्मण एक मन्दिर का महंता था और कुछ लोग उसे परेशान कर रहे थे। फ़रमान में कहा गया है:

‘‘अबुल हसन को हमारी शाही उदारता का क़ायल रहते हुए यह जानना चाहिए कि हमारी स्वाभाविक दयालुता और प्राकृतिक न्याय के अनुसार हमारा सारा अनथक संघर्ष और न्यायप्रिय इरादों का उद्देश्य जन-कल्याण को बढ़ावा देना है और प्रत्येक उच्च एवं निम्न वर्गों के हालात को बेहतर बनाना है। अपने पवित्र क़ानून के अनुसार हमने फ़ैसला किया है कि प्राचीन मन्दिरों को तबाह और बर्बाद न किया जाए, अलबत्ता नए मन्दिर न बनाए जाएं।

हमारे इस न्याय पर आधारित काल में हमारे प्रतिष्ठित एवं पवित्र दरबार में यह सूचना पहुँची है कि कुछ लोग बनारस शहर और उसके आस-पास के हिन्दू नागरिकों और मन्दिरों के ब्राह्मण-पुरोहितों को परेशान कर रहे हैं तथा उनके मामलों में दख़ल दे रहे हैं, जबकि ये प्राचीन मन्दिर उन्हीं की देख-रेख में है। इसके अतिरिक्त वे चाहते हैं कि इन ब्राह्मणों को इनके पुराने पदों से हटा दें। यह दख़लंदाजी इस समुदाय के लिए परेशानी का कारण है।

इस लिए यह हमारा फ़रमान है कि हमारा शाही हुक्म पहुँचते ही तुम हिदायत जारी कर दो कि कोई भी व्यक्ति ग़ैर-क़ानूनी रूप से दखलंदाजी न करे और न उन स्थानों के ब्राह्मणों एवं अन्य हिन्दू नागरिकों को परेशान करे। ताकि पहले की तरह उनका क़ब्ज़ा बरक़रार रहे और पूरे मनोयोग से वे हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के लिए प्रार्थना करते रहें। इस हुक्म को तुरन्त लागू किया जाये।”

इस फ़रमान से बिल्कुल स्पष्ट है कि औरंगज़ेब ने नए मन्दिरों के निर्माण के विरुद्ध कोई नया हुक्म जारी नहीं किया, बल्कि उसने केवल पहले से चली आ रही परम्परा का हवाला दिया और उस परम्परा की पाबन्दी पर ज़ोर दिया। पहले से मौजूद मन्दिरों को ध्वस्त करने का उसने कठोरता से विरोध किया। इस फ़रमान से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि वह हिन्दू प्रजा को सुख – शान्ति से जीवन व्यतीत करने का अवसर देने कर इच्छुक था।

यह अपने जैसा केवल एक ही फ़रमान नहीं है। बनारस में ही एक और फ़रमान मिलता है जिससे स्पष्ट होता है कि औरंगज़ेब वास्तव में चाहता था कि हिन्दू सुख-शान्ति के साथ जीवन व्यतीत कर सकें। यह फ़रमान इस प्रकार है:

‘‘रामनगर (बनारस) के महाराजाधिराज राजा रामसिंह ने हमारे दरबार में अर्ज़ी पेश की है कि उनके पिता ने गंगा नदी के किनारे अपने धार्मिक गुरू भगवत गोसाईं के निवास के लिए एक मकान बनवाया था। अब कुछ लोग गोसाईं को परेशान कर रहे है। अतः यह शाही फ़रमान जारी किया जाता है कि इस फ़रमान के पहुँचते ही सभी वर्तमान एवं आने वाले अधिकारी इस बात का पूरा ध्यान रखें कि कोई भी व्यक्ति गोसाईं को परेशान एवं डरा-धमका न सके, और न उनके मामले में हस्तक्षेप करे, ताकि वे पूरे मनोयोग के साथ हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के स्थायित्व के लिए प्रार्थना करते रहें। इस फ़रमान पर तुरन्त अमल किया जाए।” (तारीख़-17 रबीउस्सानी 1091 हि0)

जंगमबाड़ी मठ के महंत के पास मौजूद कुछ फ़रमानी से पता चलता है कि औरंगज़ेब कभी यह सहन नहीं करता था कि उसकी प्रजा के अधिकार किसी प्रकार से भी छीने जाएं, चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान। वह अपराधियों के साथ सख़्ती से पेश आता था। इन फ़रमानों में एक जंगम लोगों (शैव सम्प्रदाय के एक मत के लोग) की ओर से एक मुसलमान नागरिक नज़ीर बेग के विरुद्ध शिकायत के सिलसिले में है। यह मामला औरंगज़ेब के दरबार में लाया गया, जिस पर शाही हुक्म दिया गया कि बनारस सूबा इलाहाबाद के अफ़सरों को सूचित किया जाता है कि परगना बनारस के नागरिकों अर्जुनमल और जगमियों ने शिकायत की है कि बनारस के एक नागरिक नज़ीर बेग ने क़स्बा बनारस में उनकी पाँच हवेलियों पर क़ब्ज़ा कर लिया है। उन्हें हुक्म दिया जाता है कि यदि शिकायत सच्ची पाई जाए और जायदाद की मिल्कियत का अधिकार प्रमाणित हो जाए तो नज़ीर बेग को उन हवेलियों में दाख़िल न होने दिया जाए, ताकि जंगमियों को भविष्य में अपनी शिकायत दूर करवाने के लिए हमारे दरबार में न आना पड़े।

इस फ़रमान पर 11 शाबान, 13 जुलूस (1672 ई0) की तारीख़ दर्ज है। इसी मठ के पास मौजूद एक दूसरे फ़रमान में जिस पर पहली रबीउल-अव्वल 1978 हि0 की तारीख़ दर्ज है, यह उल्लेख है कि ज़मीन का क़ब्ज़ा जंगमियों को दिया गया। फ़रमान में है-

‘‘परगना हवेली बनारस के सभी वर्तमान और भावी जागीरदारों एवं करोड़ियों को सूचित किया जाता है कि शहंशाह के हुक्म से 178 बीघा ज़मीन जंगमियों को दी गई। पुराने अफ़सरों ने इसकी पुष्टि की थी और उस समय के परगना के मालिक की मुहर के साथ यह सुबूत पेश किया गया है कि ज़मीन पर उन्हीं का हक़ है। अतः शहंशाह की जान के सदक़े के रूप में यह ज़मीन उन्हें दे दी गई। ख़रीफ़ की फ़सल के प्रारम्भ से ज़मीन पर उनका क़ब्ज़ा बहाल किया जाय और फिर किसी प्रकार की दख़लंदाजी न होने दी जाए, ताकि जंगमी लोग उसकी आमदनी से अपनी देख-रेख कर सकें। ”

इस फ़रमान से केवल यही पता नहीं चलता कि औरंगज़ेब स्वभाप से न्यायप्रिय था, बल्कि यह भी साफ़ नज़र आता है कि वह इस तरह की जायदादों के बंटवारे में हिन्दू धार्मिक सेवकों के साथ कोई भेदभाव नहीं बरतता था। जंगमियों को 178 बीघा ज़मीन संभवतः स्वंय औरंगज़ेब ही ने प्रदान की थी, क्योंकि एक दूसरे फ़रमान ( तिथि 5 रमजान, 1071 हि0) इसका स्पष्टीकरण किया गया है कि यह ज़मीन मालगुज़ारी मुक्त है।

औरंगज़ेब ने एक दूसरे फ़रमान (1098 हि0) के द्वारा एक-दूसरी हिन्दू धार्मिक संस्था को भी जागीर प्रदान की । फ़रमान में कहा गया है:
‘‘बनारस में गंगा नदी के किनारे बेनी-माधो घाट पर दो प्लाट ख़ाली हैं, एक मर्क़ज़ी मस्जिद के किनारे रामजीवन गोसाईं के घर के सामने और दूसरा उससे पहले। ये प्लाट बैतुल-माल की मिल्कियत हैं। हमने यह प्लाट रामजीवन गोसाईं और उनके लड़के को ‘इमाम’ के रूप में प्रदान किया, ताकि उक्त प्लाटों पर ब्रहम्मणों एवं फ़क़ीरों के रहने के लिए मकान बनाने के बाद वे ख़ुदा की इबादत और हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के स्थायित्व के लिए दुआ और प्रार्थना करने में लग जाएं। हमारे बेटो, वज़ीरों, अमीरों, उच्च पदाधिकारियों, दारोग़ा और तर्वमान एवं भावी कोतवाली के लिए अनिवार्य है कि वे इस आदेश के पालन का ध्यान रखे और उक्त प्लाट, उपर्युक्त व्यक्ति और उसके वारिसों के क़ब्ज़े ही में रहने दे और उनसे न कोई मालगुज़ारी या टैक्स लिया जाए और न उनसे हर साल नई सनद मांगी जाए।”
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और फिर भी किसी को औरंगज़ेब के किसी और धर्म से नफरत की गलतफहमी है तो बनारस स्थीत “धनेड़ा की मस्जिद” या कर्नाटक स्थीत “गोलकुंडा” मस्जिद चला जाए।

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Mohd Zahid

इतिहास के झरोखे से:- (घनेड़ा की मस्जिद और बादशाह औरंगज़ेब)

हज़रत औरंगजेब आलमगीर की हुकूमत में काशी (बनारस) में एक ब्राहमण की लड़की थी जिसका नाम शकुंतला था, बेहद खूबसूरत और बढ़ते यौवन का तेज धारण किए उस लड़की को एक मुसलमान जाहिल और ऐय्याश सेनापति आसिफ खान ने अपनी हवस का शिकार बनाना चाहा और उसके बाप से कहा कि “

अपनी बेटी को डोली में सजा कर मेरे महल में सात दिन में भेज देना।”

ब्राम्हण सेनापति का आदेश सुनकर परेशान रहने लगा, घर में चुपचाप और एकांत में रोता रहता जिसे देखकर शकुंतला ने अपने पिता से उसकी परेशानी की वजह पूछी।

ब्राहमण ने आसिफ खान का आदेश अपनी बेटी शकुंतला को सुनाया , उनके पास कोई रास्ता नहीं था, ऐसे में ब्राहमण पिता से बेटी ने कहा कि आप सेनापति आसिफ खान से एक महीने का वक़्त ले लो, हो सकता है तब तक बचने का कोई रास्ता निकल जाये।

ब्राहमण ने सेनापति से जाकर कहा कि, “मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि हम सात दिन में सजाकर लड़की को भेज सके मुझे एक महीने का वक़्त दें।”

सेनापति ने सोचा कि बिना किसी ज़ोर ज़बरदस्ती के लड़की मिल रही है तो वक्त देना बेहतर है और उसने ब्राम्हण से कहा कि “ठीक है ठीक महीने के बाद अपनी पुत्री को सजा संवार कर भेज देना”, ब्राहमण ने अपनी लड़की से जाकर कहा “वक़्त मिल गया है अब क्या करोगी ??

लड़की ने मुग़ल शहजादे का लिबास पहना और अपनी सवारी को लेकर दिल्ली की तरफ़ निकल गई कुछ दिनों के बाद दिल्ली पहुँची वो दिन जुमे का दिन था, और जुमे के दिन हज़रत औरंगजेब आलमगीर नमाज़ के बाद जब “जामा मस्जिद” से बाहर निकलते थे तो लोग अपनी फरियाद एक चिट्ठी में लिख कर मस्जिद की सीढ़ियों के दोनों तरफ़ खड़े रहते और हज़रत औरंगजेब आलमगीर वो चिट्ठियाँ उनके हाथ से लेते।

वो लड़की (शकुंतला) भी इस क़तार में जाकर खड़ी हो गयी, उसके चहरे पे नकाब था, और लड़के का लिबास पहना हुआ था , जब उसके हाथ से चिट्ठी लेने की बारी आई तब हज़रत औरंगजेब आलमगीर ने अपने हाथ पर एक कपड़ा डालकर उसके हाथ से चिट्ठी ली तब शकुंतला बोली

“महाराज! मेरे साथ यह नाइंसाफी क्यों ?? सब लोगों से आपने सीधे तरीके से चिट्ठी ली और मेरी फरियाद को हाथों पर कपड़ा रखकर ???”

तब हज़रत औरंगजेब आलमगीर ने फ़रमाया कि “इस्लाम में ग़ैर मेहरम (पराई औरतों) को हाथ लगाना भी हराम है और मैं जानता हूँ तू लड़का नहीं लड़की है”

बादशाह औरंगज़ेब ने शकुंतला की चिट्ठी सबसे पहले वहीं पढ़ी और उसे लेकर लालकिला आग गये।

शकुंतला बादशाह के संरक्षण में कुछ दिन तक वहां ठहरी, शकुंतला को बादशाह औरंगज़ेब के दिए इस मेहमान नवाज़ी से उम्मीद बँधी कि उसकी इज़्ज़त तार तार होने से अब बच जाएगी।

कुछ दिनों बाद बादशाह हज़रत औरंगजेब आलमगीर ने उससे कहा “बेटी ! तू लौट जा तेरी डोली सेनापति के महल पहुँचेगी अपने वक़्त पर”

शकुंतला सोच में पड़ गयी की यह क्या कह दिया बादशाह ने ??

वह निराश होकर अपने घर लौटी और अपनी इज़्ज़त को तबाह व बर्बाद कराने के लिए मजबूर होकर तैय्यार होने लगी तो उसके ब्राहमण पिता ने पूछा क्या हुआ बेटी ?

वो बोली एक ही रास्ता था मै हिन्दुस्तान के बादशाह के पास गयी थी लेकिन उन्होंने भी ऐसा ही कहा कि डोली उठेगी।

लेकिन मेरे दिल में एक उम्मीद की किरण है वो यह है कि मैं जितने दिन वहाँ रुकी बादशाह ने मुझे 15 बार बेटी कह कर पुकारा था और एक बाप अपनी बेटी की इज्ज़त नीलाम नहीं होने देगा।

फिर वह दिन आया जिस दिन शकुंतला की डोली सज-धज कर सेनापति के महल पहुँची, सेनापति ने डोली देख कर अपनी अय्याशी की ख़ुशी में फकीरों को पैसे लुटाना शुरू किया, जब पैसे लुटा रहा था तब एक कम्बल-पोश फ़क़ीर जिसने अपने चेहरे पर कम्बल ओढ रखी थी, उसने कहा “मैं ऐसा-वैसा फकीर नहीं हूँ,मेरे हाथ में पैसे दे।”

उसने हाथ में पैसे दिए और उन्होंने अपने मुंह से कम्बल हटाया तो सेनापति देखकर हक्का बक्का रह गया,,क्योंकि उस कंबल
में कोई फ़क़ीर नहीं बल्कि हज़रत औरंगजेब आलमगीर खुद थे।

उन्होंने कहा कि तेरा एक ब्राहमण की लड़की की इज्ज़त पर हाथ डालना मुसलमान हुकूमत पे दाग लगा सकता है और हज़रत औरंगजेब आलमगीर ने इंसाफ फ़रमाया

“चार हाथी मंगवाकर सेनापति के दोनों हाथ और पैर बाँध कर अलग अलग दिशा में हाथियों को दौड़ा दिया जाए”

और सेनापति को चीर दिया गया।

फिर बादशाह औरंगजेब आलमगीर ने ब्राहमण के घर के पास बने एक चबूतरे पर दो रकात नमाज़ नफिल शुक्राने की अदा की, और दुआ किया कि

“ऐ अल्लाह! मैं तेरा शुक्रगुजार हूँ कि तूने मुझे एक ग़ैर इस्लामिक लड़की की इज्ज़त बचाने के लिए, इंसाफ करने के लिए चुना।”

फिर हज़रत औरंगजेब आलमगीर ने शकुंतला से कहा कि बेटी एक ग्लास पानी लाना!!! लड़की पानी लेकर आई, तब औरंगजेब ने फ़रमाया कि

“जिस दिन दिल्ली में मैंने तेरी फरियाद सुनी थी उस दिन से मैंने क़सम खायी थी कि जब तक तेरे साथ इंसाफ नहीं होगा पानी नहीं पिऊंगा”

तब शकुंतला के बाप (पंडित जी) और काशी बनारस के दूसरे हिन्दू भाइयों ने उस चबूतरे की जगह मस्जिद तामीर की जिसका नाम रखा गया।

“धनेड़ा की मस्जिद”

और ब्राहमणो ने ऐलान किया कि ये बादशाह औरंगजेब आलमगीर के इंसाफ की ख़ुशी में हमारी तरफ़ से उपहार है…

सेनापति को जो सजा दी गई वो इंसाफ़ एक सोने की तख़्त पर लिखा गया था जो आज भी धनेड़ा की मस्जिद में मौजुद है।

हजरत औरंगज़ेब काशी(बनारस) की एक ऐतिहासिक मस्जिद (धनेडा की मस्जिद) यह एक ऐसा इतिहास है जिसे पन्नो से तो हटा दिया गया है लेकिन निष्पक्ष इन्सान और हक़ परस्त लोगों के दिलो से (चाहे वो किसी भी कौम का इन्सान हो) मिटाया नहीं जा सकता, और क़यामत तक इंशा अल्लाह! मिटाया नहीं जा सकेगा…।

जिन ब्राम्हण संघी इतिहासकारों ने आज औरंगज़ेब को हिन्दूकूश प्रचारित करके खलनायक बना दिया उन पर शकुंतला की आत्मा ज़रूर धिक्कार रही होगी।

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दरअसल, आज के भारत में “औरंगज़ेब” होना राजनैतिक कारणों से गुनाह है, यह भारत आज का भारत ना होता तो भारत के इतिहास का सबसे शानदार बादशाह कहा जाता जिसने भारत की सीमाओं को कंधार तक फैला दिया था।

यह प्रदीप जोशी का चारा “खबीश सिद्दीकी” कभी नहीं समझेगा।

 

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