देश

#NRC_आधी हक़ीक़त आधा फ़साना : #NRC के लिए आवश्यक दस्तावेज


नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीज़नशिप (NRC)
आधी हक़ीक़त आधा फ़साना

मुल्क भर में NRC मेन्टेन किए जाने से मुतअल्लिक़ होम मिनिस्ट्री की जनिब से जो हुक्म नामा जारी हुआ है वो आपकी ख़िदमत में पेश है।
इस हुक्म नामे को पढ़ें और बार बार पढ़ें तो आप पाएंगे के इस हुक्म नामे में और सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली पोस्ट में ज़मीन आसमान का फर्क़ है।
इस हुक्म नामे में न तो किसी ख़ास मज़हब (इस्लाम) से तअल्लुक़ रखने वाले हिन्दुस्तानियों का ज़िक्र है, न 1947 या 1956 का ज़िक्र है, न डॉक्युमेंट्स की लिस्ट है।
फिर वो क़ौन लोग हैं जिन्होंने 10 डॉक्युमेंट्स की लिस्ट जारी करके सारे हिन्दुस्तान के मुसलमानों को ख़ौफ़ और दहशत में मुब्तला कर दिया है, ये आपको सोचना है।
हुकूमत की जनिब से जो हुक्म नामा जारी हुआ है वो आपके सामने है, इसके अलावा कोई दूसरा हुक्म नामा (मेरे इल्म के मुताबिक़) जारी नहीं हुआ है और अगर हुआ है और किसी के पास है तो मुझे इत्तेला करें।
NRC पर पैनिक होने की ज़ुरूरत नहीं है, पढ़े लिखे लोगों को आगे आना चाहिए, तहक़ीक़ करनी चाहिए और बे वजह का ख़ौफ़ फैलाने वाली पोस्ट्स को वायरल करने से बचना चाहिए।

निवेदक/- Dr-Nasir Amrohvi

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Mohd Sharif
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एक हदीस में अल्लाह के रसूल स अ व ने फ़रमाया, “मोमिन आपस में एक दूसरे के साथ मेहरबानी, मोहब्बत और हमदर्दी करने की वजह से एक जिस्म की तरह हैं कि अगर जिस्म के एक अंग में दर्द हो तो सारा जिस्म उस तकलीफ़ में शरीक होकर अनिद्रा और बुख़ार से पीड़ित हो जाता है।

अर्थात शरीर के किसी भाग में कष्ट होने पर जिस तरह पूरा शरीर बेचैन हो जाता है उसी तरह दुनिया के किसी भी भाग में अगर मुसलमानों को कष्ट पहुंच रहा हो या पहुंचाया जा रहा हो तो आपसी मेहरबानी, मोहब्बत और हमदर्दी के जज़्बे की वजह से सारी दुनिया के मुसलमानों में बेचैनी होनी चाहिए जिसके नतीजे में उस कष्ट से छुटकारे के लिए सभी मुसलमानों को कोशिश करनी चाहिए ताकि सभी को सुकून हासिल हो सके।

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Syed Tashhirul Islam
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Nrc के लिए आवश्यक दस्तावेज

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पंखुरी पाठक
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पिछले कुछ दिनों में भारत की जनता को बताया गया कि #कश्मीर अब भारत का हिस्सा बन गया है। सरकार जानती है कि 99.99% लोग कभी कश्मीर नहीं गए और वहाँ के बारे में बस उतना जानते हैं जितना TV और प्रॉपगैंडा के माध्यम से बताया जाता है ।
मैं वर्षों से कश्मीर जा रही हूँ पर आज तक ऐसा प्रतीत नहीं हुआ कि अब तक जम्मू कश्मीर भारत से अलग था ।
कश्मीर घाटी मुझे कभी हिमाचल या उत्तराखंड से भिन्न नहीं लगी ।
ना ही कश्मीर के लोग अन्य भारतियों से अलग लगे.. हाँ अन्य पहाड़ी क्षेत्रों के लोगों जैसे सरल और सत्कारशील ज़रूर लगे ।
सालों से भारत में कश्मीर और कश्मीरियों के प्रति दुष्प्रचार किया गया है ।
यह सच है कि वहाँ कुछ लोग अलगावादी विचारधारा रखते हैं ।
लेकिन इसमें आम कश्मीरी का क्या दोष ?
वह तो अन्य भारतियों की तरह शिक्षा , स्वास्थ्य , रोज़गार और बेहतर जीवन चाहते हैं ।
बहुत लोगों को भाजपा सरकार का कश्मीर पर निर्णय इसलिए अच्छा लगा क्यूँकि कहीं ना कहीं कश्मीरियों के प्रति एक अविश्वास व घृणा है ।
यह विचार आपने घर बैठे बना लिए।
इस नफ़रत को किनारे रख अगर आप कश्मीर जाते तो दिल में मुहब्बत ले कर वापस आते और जानते कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग था और है ।
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Digital Rare Book:
Where Three Empires Meet – A narrative of recent travel in Kashmir, Western Tibet, Gilgit, and the adjoining countries
By Edward Frederick Knight (1852-1925)
Published by Longmans, Green and Co., London – 1894

Book Preface:

Various circumstances took me to Kashmir in the spring of 1891. I did not see much of the Happy Valley itself ; but for the greater part of a year I was travelling among those desolate mountain-tracts that lie to the north of it, where the ranges of the Hindoo Koosh and Karakoram form the boundary between the dominions of the Maharajah and that somewhat vaguely defined region which we call Central Asia.

Great changes are now being effected in Kashmir : we are actively interfering in the administration of the country, and introducing much-needed reforms, which will produce important results in the immediate future. The affairs of this State are likely soon to attract a good deal of attention, and therefore a description of the country as it is to-day, and some account of the relations which exist between the Indian Empire and her tributary, and of the steps that are being taken to safeguard Imperial interests on that portion of our frontier may not be inopportune.

I have, so far as is possible, confined myself to a narrative of my own experiences, to a plain statement of what I myself saw, without attempting to theorise as to what ought to be done or left undone on the frontier. The Indian Government can be trusted to do everything for the best, as heretofore ; and while it is foolish for people at home, to airily criticise the policy of those highly-trained Anglo-Indian experts who have made the complicated problems of our Asiatic rule the study of a lifetime, it is still more foolish for one to do so who has spent but a year in the East, and who, therefore, has just had time to realise what a vast amount he has yet to learn.

In the course of my journey I was luckily enabled to accompany my friend, Mr. Walter Lawrence, the Settlement Officer who has been appointed to the Kashmir State, on one of his official tours, and saw something of his interesting and successful work ; I visited the mystic land of Ladak with Captain Bower, the explorer of Tibet ; reached Gilgit in time to take part in Colonel Durand’s expedition against the raiding Hunza-Nagars; and fell in with other exceptional opportunities for observing how things are managed on the frontier, both in peace and war.

Kashmir has been called the northern bastion of India. Gilgit can be described as her farther outpost. And hard by Gilgit it is that, in an undefined way, on the high Roof of the World — what more fitting a place ! — the three greatest Empires of the Earth meet — Great Britain, Russia, and China. Hence the title I have given to this book.

E.F.K.

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