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अफ़्ग़ानिस्तान : रोज़ी के परिवार के छः सदस्य इस हमले में मारे गए हैं!

Wasim Akram Tyagi
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तस्वीर में दिख रही बुज़ुर्ग महिला का नाम रोज़ी है। रोज़ी के सामने जो जूतियां रखीं हैं वे इनके पोती, पोते, बेटे और बहु की हैं, जिन्हें एक रोज़ पहले अफग़ानिस्तान सेना के एक हमले में अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। रोज़ी अब इन्हीं जूतियों को हाथ में लेकर रहती हैं क्योंकि अपने परिवार के मासूमों निशानी के तौर पर उनके पास सिर्फ यही बचा है। रोज़ी अपना सर पीटते हुई ख़ुदा से शिकायत करती है कि उसके बच्चों के बजाय उसे ही मार दिया होता। अफगान सेना के हमले में इस ग़रीब बुज़ुर्ग महिला का सबकुछ तबाह हो गया, उसे इस बात की चिंता की चिंता सताए जा रही है कि आने वाला मौसम सर्दियों का है, और उसके पास खाने के लिये इतना अनाज़ भी नहीं बचा है जिससे वह सर्दी में गुजारा करले। जवान बेटे, बहू, और पोती पोतियों के मारे जाने के बाद रोज़ी को ‘रोज़ी’ की चिंता भी लगातार सता रही है। रोज़ी के परिवार के छः सदस्य इस हमले में मारे गए हैं। यह बुजुर्ग महिला उस वक़्त बेसहारा हो गई जब इन्हें ‘सहारे’ की सबसे अधिक ज़रूरत थी। जिन लोगों की जान इस हमले में गई है उनका क़सूर सिर्फ इतना था कि वे ग़रीब थे और ग़रीबी के चलते इस क्षेत्र से पलायन नहीं कर पाए, तालिबान और अफगान सेना की लड़ाई में ग़रीब यहां की ग़रीब अवाम मौत का निवाला बन रही है. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक़ अफगानिस्तान में इस तरह की घटनाओ को सामान्य घटना माना जाने लगा है। समझ में नहीं आता कि मावाधिकारों की बात करने वाली संस्थाऐं इस तरह की घटनाओं पर क्यों नहीं बोल पातीं? आप चाहें तो इसे तक़दीर का लिखा कहकर अपनी संवेदना को शान्त कर सकते हैं लेकिन ये रोज़ी इंसानी त्रासदी की शिकार है।

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