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तेलंगाना मुक्ति दिवस की सच्चाई और भाजपा की सांप्रदायिक्ता पर एक नज़र?

हर साल 17 सितंबर को भारतीय जनता पार्टी के मन में तेलंगाना के प्रति अपार भक्ति भाव उमड़ पड़ता है।

निज़ाम और उनके शासनकाल में हुए तथाकथित अत्याचारों को बहाना बनाकर निज़ाम के ख़िलाफ़ संघर्ष करने वाले बहादुरों और उनकी क़ुर्बानियों की गाथाएं ख़ूब सुनाते हैं।

यह सब सुनकर इतिहास से बेख़बर लोगों को यह आभास हो सकता है कि भाजपा या उनकी पूर्ववर्ती संस्थाओं के लोगों ने सचमुच में निज़ाम के ख़िलाफ़ संघर्ष किया होगा, लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि निज़ाम-विरोधी संघर्ष में न भाजपा, न ही उसकी मातृसंस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उनके सह-संगठनों की रत्तीभर भी भागीदारी थी।

भाजपा-आरएसएस के नेताओं की कोशिश यह साबित करने की है कि चूंकि उस वक्त के शासक मुसलमान थे इसलिए उन्होंने हिंदू धर्म के लोगों पर अत्याचार किए। वो तेलंगाना के लोगों के सशस्त्र विद्रोह को मुसलमान शासकों के खिलाफ हिंदू जनता के संघर्ष के रूप में पेश करने का प्रयास कर रहे हैं।

वास्तव में तेलंगाना के सभी धर्मों के लोगों ने निज़ाम के खिलाफ संघर्ष किया था। वह संघर्ष धर्म से परे था। इस सच्चाई के बावजूद भाजपा यह कोशिश कर रही है कि उस पर सांप्रदायिकता का रंग पोता जाए ताकि आगे चलकर उसे चुनावी फायदा मिल सके।

तेलंगाना सशस्त्र आंदोलन निरंकुश राजशाही-सामंती व्यवस्था को उखाड़ फेंककर लोकतंत्र की स्थापना करने के लिए हुआ था। वह संघर्ष किसी विशेष धर्म के ख़िलाफ़ नहीं हुआ था और न ही वह इस्लाम विरोधी आंदोलन था क्योंकि तत्कालीन शासक निज़ाम मुसलमान थे।

वास्तव में निज़ाम की राजशाही का मज़बूत और व्यापाक आधार हिंदू जागीरदार और जमींदार ही थे। विशेषकर हिंदू भूस्वामी ही उसकी राजशाही के मजबूत स्तंभ थे। वह संघर्ष सबसे पहले हिंदू ज़मींदारों के खिलाफ ही शुरू हुआ था जिसे दबाने के लिए निज़ाम की पुलिस और सेना मैदान में उतरी थी।

1946 से 1951 के बीच चले तेलंगाना सशस्त्र किसान संघर्ष के प्रति तेलंगाना के लोगों के दिलों में आज भी अपार आदर की भावना है। इसलिए भाजपा की कोशिश यह है कि इस भावना को भुनाते हुए ही उसे तोड़ा और मरोड़ा जाए और उसे सांप्रदायिकता का रंग दे दिया जाए ताकि भविष्य में होने वाले चुनावों में इससे फ़ायदा उठाया जा सके।

इतिहास के साथ भाजपा की छेड़छाड़ का एक और उदाहरण यह है कि वह 17 सितंबर 1948 को हैदराबाद की रियासत के भारतीय यूनियन में विलय को मुक्ति बताती है। भाजपा भारतीय यूनियन की फौजों ने निज़ाम को हराकर तेलंगाना की अवाम को मुक्ति दिलाई किन्तु सच्चाई यह है कि तब तक कम्युनिस्टों की अगुवाई में तेलंगाना की जनता ने निज़ाम हुकूमत की नाक में दम कर रखा हुआ था। तीन हज़ार से ज़्यादा गांवों में निज़ाम हुकूमत को तबाह कर दिया गया था और निज़ाम के जमींदारों की लाखों एकड़ जमीनें छीन ली गई थीं। गांवों में जन सरकारों का गठन हुआ था।

कहा जाता है कि भारत सरकार को यह डर सताने लगा था कि कहीं हैदराबाद कम्युनिस्टों के हाथों में न चला जाए। इसी डर से उन्होंने आनन-फानन में पुलिस कार्यवाही के नाम से तेलंगाना पर आक्रमण किया था और तेलंगाना का भारत में विलय किया था जबकि भारतीय यूनियन के साथ निज़ाम का यथास्थिति बनाए रखने का समझौता पहले से लागू था।

इसी को लेकर भाजपा के लोग प्रचार करते रहते हैं कि वल्लभभाई पटेल ने तेलंगाना को मुक्ति दिलाई थी। तो फिर भाजपा या आरएसएस के लोगों को इन सवालों का भी जवाब देना होगा कि अगर पटेल ने तेलंगाना को मुक्ति दिलाई थी तो उसी निज़ाम को पटेल ने तेलंगाना का ‘राज प्रमुख’ कैसे नियुक्त किया था? जब खुद निज़ाम ही राज प्रमुख हो तो वह किस तरह मुक्ति कहलाएगी?

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