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तो एक फ़ाख़ता अपनी चोंच में पानी ला कर आग पर डाल रही थी….

जब इब्राहिम अलैहिस्सलाम को आग में डाला जा रहा था तो एक फाख़ता अपनी चोंच में पानी ला कर आग पर डाल रही थी लेकिन उल्लु….
नमरूद बादशाह ने हज़रत इब्राहीम अलैहि अस्सलाम को ज़िंदा जलाने का फ़ैसला कर लिया था। एक बड़े मैदान में आग भड़काई जा रही थी दूर दूर से जंगल काटकर लकड़ियां लाकर इस आग में डाली जा रही थीं कई हफ़्तों की मेहनत से आग भड़क उठी इस के शोले आसमान तक पहुंच रहे थे।

इस का धुआँ चारों तरफ़ फैल कर लोगों को हैबतज़दा कर रहा था ।इस भड़कती हुई आग से दूर एक पहाड़े-ए-चमन में एक छोटी सी फ़ाख़ता का नशेमन था। जिस में वो सुकून से ज़िंदगी गुज़ार रही थी उस के क़रीब ही एक उल्लू का घोंसला था जो रात को गशत करके दुनिया जहान की ख़बरें जमा किया करता था।
जब भड़कती हुई आग का धुआँ फ़ाख़ता के नशेमन तक पहुंचा तो इस ने घबराकर उल्लू से पूछा कि ये क्या माजरा है ?

उल्लू ने कहा तुम को मालूम नहीं हमारे बादशाह ने इब्राहीम को ज़िंदा जलाने के लिए आग दहकाई है। फ़ाख़ता का कलेजा धक से रह गया इस ने घबराकर पूछा कौन इब्राहीम वही ख़लील-उल-ल्लाह। उल्लू ने अपनी आँखें चमकाकर कहा हाँ वही इब्राहीम।ये ख़बर सुन कर फ़ाख़ता बेइख़्तयार रोने लगी उस ने चीख़ कर कहा नहीं नहीं! ऐसा नहीं होसकता! अल्लाह के दोस्त को कोई नहीं जला सकता।

उल्लू ने हंस कर कहा… तुम कौन चीज़ हो रोकने वाली, क्या पिद्दी और क्या पिद्दी का शोरबा। फ़ाख़ता ने रोते हुए कहा नहीं नहीं !में ऐसा नहीं होने दूंगी। वो फड़फड़ाती हुई अपने नशेमन में लौट आई उस की समझ में नहीं आरहा था कि क्या करे ।उसने अपने बच्चों पर विदाई की नज़र डाली और नशेमन से निकल गई ।

उस ने गिड़गिड़ा कर दुआ की ए मेरे रब!इब्राहीम को बचा ले। वो क़रीब के चश्मे पर गई और अपनी चोंच में पानी भर कर तेज़ी से फैली हुई आग की तरफ़ उड़ने लगी आग के शोले भड़क रहे थे लेकिन फ़ाख़ता की ज़बान पर एक ही दुआ थी मेरे रब!इबराहीम को बचा ले और उस की चोंच में पानी के चंद क़तरे थे। जिन से वो भड़कती हुई आग को बुझाना चाहती थी जब वो शोलों के क़रीब पहुंची और आग से उस के पर जलने लगे तो इस ने वो चोंच भरे पानी आग पर डाल दिया और फिर तेज़ी से दुबारा चोंच भरने के लिए चशमा की तरफ़ पलटी फ़ाख़ता ने कई फेरे लगाए । वो थक कर चूर होगई ।

आग की गर्मी से इस के बाज़ू जल गए,बिल आख़िर वो अपने नशेमन के क़रीब बेदम होकर ज़मीन पर गिर पड़ी। उल्लू जो ये सब तमाशा देख रहा था उस ने ज़ोर का क़हक़हा लगाया और कहा बेवक़ूफ़ चिड़िया ये चोंच भर पानी से आग का दरिया बुझाने चली थी। फ़ाख़ता ने चमककर कहा तुम क्या जानो मैंने अपना इनाम पालिया। जब मेरा मौला मुझ से पूछेगा कि ए फ़ाख़ता हम ने तुम को तमाम नेअमतें दीं थीं लेकिन जब हमारा ख़लील आग में डाला जा रहा था तब तुम ने क्या क्या? तब में अर्ज़ करूंगी मेरे मौला! मैंने अपनी बिसात भर कोशिश आग बुझाने में लगादी, फ़ाख़ता ने ये कहते कहते दम तोड़ दिया और उल्लू सोचने लगा ये छोटी सी चिड़िया जीत गई । अफ़सोस में ताक़तवर होते हुए भी कुछ ना कर सका।

दुनिया के हर दौर में नमरूद और इब्राहीम अलैहि अस्सलाम की कश्मकश जारी है ।आज भी आग है औलाद-ए-इबराहीम है, नमरूद है चारों तरफ़ फैली हुई आग को बुझाने की ज़रुरत है
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जब कोई पूछेगा कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र ने एक पूरे राज्य पर को बंद कर दिया लोगों के मौलिक अधिकार भी छीन लिए तब आप क्या कर रहे थे
तो मैं कहूंगा कि मैंने विरोध के लिए नौकरी से इस्तीफा दे दिया था
कन्नन गोपीनाथान IAS, केरल कॉडर

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हिटलर के जर्मन में कुत्ते की एक नस्ल पूरी दुनियां में पाई जाती है जिसे जर्मन शेफर्ड कहते है।

गड़रिया एक ओर बैठा रहता है और कुत्ते को निर्देश देता रहता है। कुत्ता इतना खूंखार होता है कि अकेला या दो मिलकर बहुत बड़े रेवड को काबू में रखते हैं साथ ही उन्हें खदेड़ कर बाड़े में ले आते है जब गड़रिया उन्हें बन्द कर देता है।

डिस्कवरी वाले भी ग़ज़ब के कार्यक्रम बनाते हैं।।

कल रामलीला मैदान दिल्ली के चित्र देखे तो अन्ना हजारे का आंदोलन याद आ गया जब देश का प्रत्येक नागरिक भ्र्ष्टाचार के विरुद्ध मोमबत्तियां जला रहा था और लोकपाल के सपने देख रहा था।

अचानक मोदी जी का अवतरण हुआ और एकदम वही जनता हिन्दू-मुस्लिम तथा राष्ट्रवादी हो गई।

भ्र्ष्टाचार, लोकपाल, आर्थिक अव्यवस्था अचानक गायब हो गई और गोरक्षा से लेकर विशेष समुदाय एवम देश सौ करोड़ कथित जनता का दोषी ठहराया जाने लगा जिसे सबने मान लिया।

कभी कभी लगता है कि हम भी उन भेड़ो जैसे ही है जो ख़ुद बाड़े में बन्द होकर कम्बल मिलने की उम्मीद रखते हैं लेकिन भूल जाते है कि गड़रिया ऊन के लिए हमे ही मुंडेगा और ऊन नही होगी तो ज़िब्ह करके पका लेगा।।

गड़रिया तो दूर बैठकर अपने शेफर्ड से हमे हक़वाता रहता है।।

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