धर्म

बलिदान, त्याग और साहस की याद दिलाने वाला मुहर्रम का महीना पर विशेष : पार्ट 2

मुहर्रम के महत्व के लिए यही काफ़ी है कि लगभग चौदह सौ साल गुज़र जाने के बाद भी हर साल, पूरी दुनिया में लोग इमाम हुसैन के बलिदान को याद करते हैं।

निश्चित रूप से यह इमाम हुसैन के महान आंदोलन का ही असर है कि आशूरा के इस आंदोलन के विभिन्न आयामों पर अब तक न जाने कितने शिया, सुन्नी, ईसाई और अन्य धर्मों से संबंध रखने वाले बुद्धिजीवियों ने अध्ययन किये और किताबे लिखी हैं? । मुहर्रम और आशूरा की घटना के बारे में एक महत्वपूर्ण सवाल यह किया जाता है कि क्या वजह है कि पैग़म्बरे इस्लाम के स्वर्गवास के मात्र पांच दशक बाद ही इस्लामी समाज की यह दशा हो गयी थी कि उसमें यज़ीद जैसे शासक को यह अवसर मिला कि वह पैगम्बरे इस्लाम के नवासे और उनके परिजनों को इस प्रकार शहीद करे और उनके घर की महिलाओं को बंदी बना कर बाज़ारों में घुमाए?। यह कौन सी परिस्थतियां थी जिनकी वजह से यज़ीद का साहस इतना बढ़ गया था कि उसने इमाम हुसैन और उनके परिजनों के साथ इस व्यवहार के बाद मदीना नगर पर चढ़ाई कर दी और उसके सिपाहियों ने पैगम्बरे इस्लाम के नगर में वह तबाही मचाई जिसका उदाहरण नहीं मिलता।

यदि इस प्रकार के काम तत्कालीन साम्राज्यों, ईरान या रोम द्वारा किया गया होता तो फिर उस पर कोई आश्चर्य नहीं होता, या अगर किसी अन्य धर्म के मानने वालों नें इमाम हुसैन, उनके परिजनों और मदीना नगर के साथ इस प्रकार का व्यवहार किया होता तब भी बहुत असाधारणा घटना नहीं थी लेकिन यदि कुछ लोग, इस्लाम का नाम लेकर सत्तासीन हों और फिर स्वयं को मुसलमान कहने वालों की मदद और सहयोग से, पैगम्बरे इस्लाम के ही परिजनों को घेर कर अत्याधिक बर्बरता के साथ मार डालें तो निश्चित रूप ये यह ऐसी घटना है जिस पर अधिक विचार और अध्ययन की ज़रूरत है। यह जानना ज़रूरी हो जाता है कि यह त्रासदी कैसे शुरु हुई, उसकी शुरुआत किसने की और किस ने इस्लामी इतिहास के माथे पर कलंक का यह टीका लगा दिया? वास्तव में किसी भी आंदोलन के उद्देश्यों को समझने के लिए यह बहुत ज़रूरी होता है कि पहले उन हालात को समझा जाए जिनमें उस आंदोलन ने अंगड़ाई ली।

इमाम हुसैन, पिता हज़रत अली और भाई इमाम हसन के शहीद होने के बाद इस्लामी समाज के नेतृत्व की संवेदनशीलता से अवगत थे। सफर सन 50 हिजरी में इमाम हसन की शहादत के बाद पैग़म्बरे इस्लाम के महान अभियान को आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी जब इमाम हुसैन के कांधों पर आई तो इस्लामी समाज विषम राजनीतिक परिस्थितियों से जूझ रहा था और समाज भी उस लक्ष्य से कोसों दूर हो चुका था जहां तक पैग़म्बरे इस्लाम ने उसे पहुंचाने के लिए रात दिन परिश्रम किया था।

राजनीतिक मंच पर मुआविया ने इस्लामी नेतृत्व को जो मूल रूप से साधारण जीवन व न्याय स्थापना का प्रतीक था, पैतृक राजशाही में बदलने का सपना देखा था, जिसके परिणाम में इमाम हुसैन के पिता हज़रत अली और भाई इमाम हसन के विरुद्ध कई युद्ध भड़काए थे। मोआविया को अपना सपना पूरा होता प्रतीत हो रहा था और इसके लिए उसने इमाम हसन की शहादत के बाद मैदान साफ़ देख कर भूमिका प्रशस्त करना आरंभ कर दिया था। मुआविया एक चतुर राजनीतिज्ञ था उसने अरब जगत के भ्रष्ट किंतु प्रभावी लोगों को पद और धन के सहारे अपने साथ मिला लिया था किंतु इमाम हुसैन को जिन का लोगों के हृदयों पर राज था तथा कुछ अन्य लोगों को छेड़ने का साहस नहीं किया बल्कि इमाम हुसैन और उन के समर्थकों को छोड़कर बाक़ी लोगों का समर्थन जुटाने में व्यस्त हो गया इधर इमाम हुसैन भी अपने ईश्वरीय दायित्व के अनुसार लोगों के मार्गदर्शन में व्यस्त थे।

लोगों को यज़ीद की सत्ता स्वीकार करवाने के लिए मुआविया हज पर गया और मदीना नगर जाकर उसने मुसलमानों से यज़ीद के लिए आज्ञापालन की प्रतिज्ञा की मांग की और अपने बेटे यज़ीद की सराहना करते हुए कहाः यज़ीद पैग़म्बरे इस्लाम की जीवनशैली से परिचित और कुरआन का ज्ञान रखने वाला है और उसका धैर्य और संयम पत्थरों से अधिक है।

इमाम हुसैन यदि यहां चुप बैठे रहते तो यह मुआविया की बातों की पुष्टि के अर्थ में होता इसी लिए वे खड़े हुए और ईश्वर का गुणगान करने के बाद कहने लगे। हे मुआविया! तू वास्तविकता से दूर हो चुका है, भोर का उजाला अंधकारमय रात पर छा गया है और सूर्य के प्रकाश ने दिये को मांद कर दिया है।

यहां तक कि इमाम हुसैन ने कहा जो कुछ तूने यज़ीद, उसके गुणों और राजनीति के बारे में कहा तू लोगों को अपनी इन बातों से भ्रम में डालना चाहता है, तू यह सोचता है कि लोगों की नज़रों से दूर और किसी अपरिचित व्यक्ति के बारे में बात कर रहा है। यज़ीद जो कुछ करता है वह यह है कि वह भौंकते कुत्तों से खेलता है, कबूतर बाज़ी करता है और गाने वालियों और निरथर्क कामों और अपनी इच्छाओं की पूर्ति में व्यस्त रहता है ।

इसके बाद इमाम हुसैन ने मुआविया से कहाः उसे अपना उत्तराधिकारी बनाने से बच तुझे क्या आवश्यकता है कि इतनी बुराईयों के बाद एक और बुराई अपने कर्म पत्र में बढ़ा ले।

इमाम हुसैन के विरोध के बावजूद मुआविया ने अपना उत्तराधिकारी अपने बेटे यज़ीद को बना दिया और जब तक जीवित रहा सत्ता तक यज़ीद के पहुंचने का मार्ग प्रशस्त करता रहा ।

मुआविया के निधन के बाद उसका बेटा यज़ीद सिंहासन पर बैठा। मुआविया ने मरने से पूर्व अपने बेटे यज़ीद को सत्ता बनाए रखने के लिए कई रणनीतियां बताई थीं जिनमें मुख्य रूप से और बल देकर यह कहा था कि इमाम हुसैन को अपनी आज्ञापालन पर विवश करने का प्रयास न करना किंतु उस समय के भ्रष्ट समाज में जब यज़ीद एशिया, युरोप और अफ़्रीका तक फैले इस्लामी शासन की गद्दी पर बैठा तो उसने सोचा कि उस से अधिक शक्तिशाली कौन हो सकता है?

मदीना नगर में जहां इमाम हुसैन अपने श्रद्धालुओं के साथ अपने दायित्व का निर्वाह कर रहे थे मुआविया के निधन का समाचार यज़ीद द्वारा आज्ञापालन की प्रतिज्ञा की मांग के साथ पहुंचा। यज़ीद ने मदीना में अपने राज्यपाल मरवान को लिखा था कि हुसैन से मेरी आज्ञापालन की प्रतिज्ञा ले या फिर उनका सिर काट कर मेरे पास भेज दे।

यज़ीद के राज्यपाल ने इमाम हुसैन को बुलवाया और उनके सामने पत्र रख दिया। इमाम हुसैन ने पत्र पढ़ा और ऐतिहासिक वाक्य कहाः मेरे जैसे लोग, उस जैसे लोगों की आज्ञापालन की प्रतिज्ञा नहीं लेते। इमाम हुसैन ने यज़ीद की आज्ञापालन की प्रतिज्ञा से इन्कार कर दिया किंतु मरवान में उनकी हत्या का साहस नहीं था। इमाम हुसैन राज्यपाल के दरबार से घर लौट आए। मदीना नगर में खलबली मच गयी। सब को आश्चर्य हो रहा था कि यज़ीद का इतना दुस्साहस हो गया कि वह पैग़म्बरे इस्लाम के नवासे इमाम हुसैन तक से अपनी आज्ञापालन की प्रतिज्ञा लेना चाह रहा है।

इमाम हुसैन का महासंघर्ष आरंभ हो गया था। सत्य असत्य के मध्य सदैव से जारी लड़ाई का एक अन्य और संभवतः सब से अधिक महत्वपूर्ण चरण आरंभ हो रहा था।

असत्य के प्रतीक यज़ीद ने सत्य के प्रतीक अर्थात इमाम हुसैन को ललकारा था। मदीना में परिस्थितियां बड़ी तेज़ी से बदल रही थीं। इराक़ के अन्य नगरों से इमाम हुसैन के नाम हज़ारों पत्र आ रहे थे जिनमें इमाम हुसैन का साथ देने और यज़ीद का विरोध करने पर बल दिया जा रहा था।

इमाम हुसैन ने सोच विचार के बाद मदीना नगर छोड़ देने का निर्णय लिया और अपने पूरे परिवार के साथ मदीना नगर से निकल पड़े। कहां जाना है? इस बात का ज्ञान इमाम हुसैन को था विदित रूप से वे मक्का नगर जाकर हज करना चाह रहे थे। इमाम हुसैन ने इतिहास की यह महत्वपूर्ण यात्रा आंरभ की और अपने साथ चलने वालों का बड़ी दूरदर्शिता के साथ चयन किया। क्योंकि यह अत्याधिक महत्वपूर्ण संघर्ष था इस लिए इस संघर्ष में भाग लेने वालों का असाधारण होना आवश्यक था। कर्बला की घटना ने सिद्ध कर दिया कि इमाम हुसैन ने अपने साथियों के चयन में क्यों इतनी सूक्ष्मता से काम लिया?

इमाम हुसैन मक्का नगर पहुंचे तो यज़ीद द्वारा भेजे गये कुछ लोग हज के विशेष वस्त्रों में शस्त्र छुपा कर मक्का पहुंच गये। वे वहीं पर इमाम हुसैन की हत्या करना चाहते थे ताकि यह दिखाया जा सके कि कुछ अज्ञात लोगों ने उनकी हत्या कर दी किंतु इस प्रकार से इमाम हुसैन का संदेश जिसने कर्बला के बाद यज़ीद के शासन की नींव हिला डाली, सीमित हो जाता इसी लिए इमाम हुसैन ने मक्का छोड़ने का निर्णय लिया।

पूरे इस्लामी शासन पर यज़ीद का अधिकार था, समाज के प्रभावी लोग उसके आदेशपालन की प्रतिज्ञा कर चुके थे किंतु इसके बावजूद इमाम हुसैन से अपना आदेश पालन की प्रतिज्ञा लेने पर यज़ीद का आग्रह यह दर्शाता है कि उसे भी यह भलींभांति पता था कि सैनिक दृष्टि से वह चाहे जितना शक्तिशाली हो किंतु यदि इमाम हुसैन ने उसकी पुष्टि नहीं की तो उसकी राजनीतिक स्थिति डांवाडोल रहेगी और केवल तलवार के बल पर ही वह लोगों पर शासन कर सकता है। इसी लिए यज़ीद चाह रहा था कि इमाम हुसैन उसका आदेश मानने की प्रतिज्ञा करके उसकी सत्ता और स्वंय उसे औपचारिकता प्रदान कर दें किंतु इमाम हुसैन ने यह कहकर कि मेरे जैसा, यज़ीद जैसे की आज्ञापालन की प्रतिज्ञा नहीं कर सकता यह संदेश दिया कि यदि असत्य की पुष्टि करने से सत्य का अस्तित्व ही ख़तरे में पड़ जाए तो फिर किसी भी स्थिति में ऐसा नहीं करना चाहिए भले ही उसके लिए मनुष्य को अपनी जान ही गंवानी पड़े।

विभिन्न क्षेत्रों से इमाम हुसैन के पास आने वाले पत्रों की संख्या हज़ारों में पहुंच गयी थी किंतु कूफा वासियों ने विशेष रूप से आप को निमंत्रण दिया था, साथ ही यह भी वचन दिया था कि वे यज़ीद के मुक़ाबले में उनका साथ देंगे। इमाम हुसैन ने अपने एक भाई मुस्लिम बिन अक़ील को कूफा भेजने का निर्णय लिया ताकि वह वहां की परिस्थितियों की समीक्षा करें। मुस्लिम बिन अक़ील कूफा नगर रवाना हुए। एक ऐसी यात्रा आरंभ की जिसके बाद वह कभी लौट कर न आ सके। मुस्लिम बिन अक़ील को आशूर के महासंग्राम के शहीद होने वाले पहले सिपाही के रूप में याद किया जाता है। कर्बला का आंरभ कूफे से हो चुका था। समाज की गंदगी को अपने और अपनों के खून से धुलने का कठिन काम, इमाम हुसैन ने शुरु कर दिया था।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *