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मस्जिद और मदरसों में होने वाले धार्मिक आयोजनों/जलसों में ग़ैर-मुस्लिम समाज के लोगों को अतिथि बना कर बुलाया जाना चाहिए!

Parvez Iqbal
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“सामाजिक समरसता के लिए ज़रूरी है संवाद”
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हाल ही मैं मौलाना अरशद मदनी साहब ने संघ कार्यालय जाकर संघ प्रमुख मोहन भागवत जी से मुलाकात की…इससे पहले RSS नेता इंद्रेश मौलाना मदनी से मिलने देवबंद मदरसे गए थे…मौलाना अरशद मदनी साहब और संघ प्रमुख मोहन भागवत की मुलाकात पर सवाल उठाए जा रहे हैं….कुछ मुस्लिम इस मुद्दे को लेकर मदनी साहब के संघ कार्यालय पर जाने को लेकर उन्हें ट्रोल कर उन पर सवाल उठा रहे हैं….इससे पहले संघ नेता इंद्रेश को देवबंद मदरसे में बुलाये जाने पर भी इसी तरह सवाल उठाए गए थे…

सवाल यह उठता है कि संवाद या कहीं भी आने जाने या किसी को मदरसे में बुलाये जाने में एतराज़ कियूं जताया जाए…मेरा स्पष्ट मानना है कि संवाद से कभी कोई नुकसान नहीं होता बल्कि संवाद से गलतफहमियां दूर होती हैं…आज मदरसों को लेकर जो भ्रांतियां फैली हुई हैं उसमें कहीं न कहीं अन्य समाज के लिए इन मदरसों की रहस्यमय गोपनीयता भी ज़िम्मेदार है…मदरसा संचालकों ने पता नहीं कियूं (सम्भवतः चंदे के धंधे को गोपनीयता बनाये रखने के लिए) मदरसों को किले की तरह बना दिया है जिसमे दीगर समाज के लोग तो ठीक ही ठीक आम मुस्लिम भी आसानी से दाखिल नहीं हो सकता…मदरसा संचालकों से मुलाकात किसी मंत्री या किसी बड़े सरकारी अफसर से मिलने के बराबर ही दुश्वार है…विशुद्ध तालीम के लिए बने और तालीम देते मदरसों और उनके संचालकों की रहस्यमय गोपनीयता से इस्लाम विरोधियों को मदरसों के बारे में भ्रांतियां फैलाने में सफलता मिली है…ऐसे में अगर देवबंद मदरसे में संघ नेता इंद्रेश को बुला कर एक नई शुरुवात की जाती है या मौलाना अरशद मदनी साहब संघ कार्यालय जाकर संघ प्रमुख से मुलाकात करते हैं तो इसमें क्या हर्ज है…मेरा तो यह मानना है कि मदरसे के दरवाजे न सिर्फ सभी वर्गों के लिए खोले जाने चाहिए बल्कि एक विधिवत प्रोग्राम बना कर अन्य समाज के लोगों को मदरसे और मस्जिदों में विजिट करवाई जानी चाहिए…मस्जिद और मदरसों में होने वाले धार्मिक आयोजनों/जलसों में दीगर गैरमुस्लिम समाज के लोगों को अतिथि बना कर बुलाया जाना चाहिए ताकि वो इस्लाम को करीब से देख/सुन/समझ सकें..
उम्मीद करता हूँ यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा।
(परवेज़ इक़बाल)

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