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ये NRC हमें बाड़े में कैद करने जैसा है, इसे फाड़कर फेंक दिया जाना चाहिए : अमरनाथ मधुर का लेख

Amarnath Madhur
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जब आधार की बात हुई थी तो ये समझाया गया था कि इसके बाद किसी को कोई अन्य डाक्यूमेंट रखने की जरुरत नहीं पड़ेगी| आधार हर आदमी की पूरी कुंडली खंगाल देगा| लेकिन हमने देखा कि आधार के बाद भी पैन कार्ड ,राशनकार्ड, निवास प्रमाण पत्र,जन्म प्रमाण पत्र ,जाति प्रमाण पत्र वोटर कार्ड आदि दर्जनों प्रमाण पत्र ज्यादातर जगह जरूर मांगे जाते हैं |इसका मतलब है कि आधार नंबर का वैध उद्देश्य पूरा नहीं हुआ है हाँ किसी को अवैध तरीके से उत्पीड़ित करना हो तो आधार के आधार पर ऐसा करना आसान हो गया है | लेकिन पता नहीं फिर भी क्यों सरकार को एन आर सी यानी नेशनल रेजिन्डिशयल रजिस्टर अर्थात राष्ट्रिय नागरिकता पंजिका बनाने की जरुरत पड़ गयी है |

कहा जा रहा है कि देश के अनेक भागों में अवैध घुसपैठियों के कारण राष्ट्र की सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो गया है जिससे निपटने में एन आर सी से मदद मिलेगी | कैसी मदद मिलेगी ? इसे लेकर भी सरकार ने साफ़ साफ़ बता दिया है कि जो हिन्दू शरणार्थी होंगे ( ध्यान दें हिन्दू केवल शरणार्थी होता है जबकि बाकी सब घुसपैठियें होते हैं ) उन्हें नागरिकता दी जायेगी और जो अन्य अवैध बाशिंदें होंगे उन्हें देश से निकाल बाहर किया जाएगा |

ये सोच असम के हालत के कारण उत्पन्न हुयी है जहाँ बांग्लादेशी घुसपैठियों जो ज्यादातर मुस्लिम हैं ने वहाँ की मूल आबादी को अल्पसंखयक कर दिया है | इससे स्थानीय लोगों को अपने घर में ही पराया होने का एहसास होने लगा है | निश्चित ही कोई भी समुदाय ऐसी अप्रिय स्थिति में सहज नहीं रहेगा | लेकिन इसे थोड़ा विस्तार से समझना होगा |क्यूंकि ये समस्या प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के साथ साथ मानसिकता की भी है| जब कश्मीर के पूर्ण विलय को लेकर देश में गर्वानुभूति का माहौल बनाया जा रहा हो और वहाँ जाकर बसने के लिए उछाल मारी जा रही हो तो तब स्थानीय लोगों के अल्पसंखयक हो जाने की चिंता क्यों की जा रही है ? क्या अंडमान निकोबार और अरुणाचल में बाहरी लोगों को नहीं बसाया गया है ? अगर इससे देश की एकता मजबूत होती है तो फिर पूर्वोत्तर में बाहरी लोगों के बसने से क्या समस्या है ? अगर सवाल बांग्लादेशी नागरिकों के अवैध प्रवास का है जो कि वास्तव में नहीं है, क्यूंकि पूर्वोत्तर के लोगों को शिकायत तमाम गैर स्थानीय लोगों से है केवल बंगलादेशी लोगों से नहीं है, फिर भी हम मान लें की समस्या बंगलादेशी नागरिकों से ही है तो उन्हें समस्या क्यों माना जाए ? उनके लिए तो हमने पाकिस्तान से लड़ाई लड़ी है, अपना खून दिया है | क्या हम उन्हें खाने के लिए रोटी और सर छिपाने के लिए झोंपड़ी नहीं दे सकते हैं ? उनसे हमारा खून का रिश्ता है, वो हमारे देश का एक हिस्सा रहे हैं | इतिहास, भूगोल, साहित्य, संस्कृति सब कुछ हमारा साझा है और आज भी हम साझा होने का स्वप्न देखते हैं | तो क्या अखंड भारत के हमारे सपने में सिर्फ जमीन ही आएगी ? वहाँ के लोग नहीं आयेगें ?

कथित राष्ट्रवादी अखंड भारत की चाहे जो तस्वीर रखते हों हम इस उपमहाद्वीप में एक ऐसा भाईचारा चाहते हैं जहाँ सरहदें बेड़ियाँ ना बनें |हमारे खाने कमाने नाचने गाने खुलने कूदने के लिए एक बड़ा सा आँगन हो एक खुला आकाश हो | ये एन आर सी हमें बाड़े में कैद करने जैसा है| इसे फाड़कर फेंक दिया जाना चाहिए |

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