देश

Battle of Kerbala : दसवीं मोहर्रम इस्लामिक तारीख़ के लिहाज़ से बेहद अहम दिन : Report


Battle of Kerbala
Painted in late 19th–early 20th century
By Abdallah Musavvvar

This monumental canvas depicts scenes from the battle of Kerbala and the martyrdom of Imam Husayn (the third Shi’i Imam and Ali’s grandson) and his family at the hands of the Sunni caliph Yazid in the Kerbala desert in 680 A.D. Canvases like this example were used as backdrops for recitation of the story of Husayn’s martyrdom. They were portable; the reciter or pardehdar would nail them to a wall of a building and point to the relevant scenes as he recited the story. The narrative unfolds from left to right. The reciter’s expressive and performative telling of the story is meant to elicit an emotional response from the audience as they hear about the agonies suffered by Husayn’s followers in the scorching Kerbala desert.

Image and text credit:
© The Metropolitan Museum of Art

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Ayub Khan Jharkhand

लातेहार : चंदवा में मुहर्रम ताजिया का मातमी जुलूस शांतिपूर्वक संपन्न हो गया।

या हुसैन या अली के नारों से शहर गुंज उठा।

पुलिस प्रशासन ड्रोन कैमरे से जूलूस की निगरानी कर रही थी।

पुलिस निरीक्षक सह थाना प्रभारी मोहन पांडे के नेतृत्व में भी पुलिस मुस्तैद थी।

थाना परिसर में पुलिस इंस्पेक्टर मोहन पॉडे ने परंपरा के तहत
शुक्रबजार, कामता, बेलवाही और कुजरी के ताजियादारों को शिल्ड देकर सम्मानित किया।

वहीं सामाजिक कार्यकर्ता अयुब खान, बाबर खान, असगर खान, मुंशी मियां, ग्यास खान, रौशन टेलर ने पुलिस इंस्पेक्टर मोहन पॉडे को पगड़ी देकर सम्मानित किया, साथ ही साथ रामयश पाठक तथा मीडिया प्रतिनिधियों को भी पगड़ी देकर संम्मानित की गई।

कामता करबला में फात्हा व सलाम के साथ मुहर्रम शांतिपूर्ण संपन्न हो गया।

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Ssp Aligarh

आज दिनांक 10/09/2019 को श्रीमान वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक श्री आकाश कुलहरि महोदय के आदेशानुसार एवं श्रीमान पुलिस अधीक्षक नगर श्री अभिषेक महोदय के निर्देशन एवं श्रीमान क्षेत्राधिकारी नगर प्रथम श्री विशाल पाण्डेय के पर्वेक्षण में व प्रभारी निरीक्षक श्री इंद्रेश पाल सिंह थाना देहली गेट के नेतृत्व में शांति व्यवस्था के द्रष्टिगत, मोहर्रम जुलूस की ड्रोन कैमरे के द्वारा सीसीटीएनएस टीम के अरविन्द उपाध्याय एवं अजीत कुमार द्वारा देहली गेट थाना क्षेत्र की निगरानी की गयी |

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Swami Sarang

मेरे अमनपसंद मित्रों
10 मुहर्रम को विश्वशान्ति की राह में इमाम हुसैन (अ.स.) के किरदार के परछाईं के साये में मैं अपनी खिराजे अकीदत ज़ंजीर जानि के ज़रिए पेश करने के लिए विक्टोरिया स्ट्रीट लखनऊ में हाज़िर रहूँगा,संसार मे शांति के रास्ते में ख़ून का पुरसा देने की ज़रूरत पड़ती है।
मेरा विरोध हर उस अत्याचार और अत्याचारी के ख़िलाफ़ है जो देश और समाज से अपनी राय भिन्न रखता है,मेरा विरोध देश और दुनिया में फैले आतंकवाद से है,मेरी चाहत है की लोगों को एक होना चाहिए।आप सब के साथ की और दुआ की दरकार है।
#आशुरा_2010 # Swami Sarang
#ShreeSwamiSarangGlibslPeaceFoundatiom

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Himanshu Kumar

अगर मैं इतिहास में किन्हीं लोगों से प्रभावित हूं तो इसमें दो नाम सबसे खास है

एक जीसस और दूसरे हुसैन

मैं जब इन दोनों को याद करता हूं मेरी आंखें भीग जाती है

वैसे मैं नास्तिक हूं

लेकिन इन दोनों का ताल्लुक किसी ईश्वर से ज्यादा इस दुनिया से और इस दुनिया के जुल्मों के खिलाफ लड़ने से है

जीसस ने सूदखोर व्यापारियों को कोड़े लेकर मंदिर से भगाया था

और हुसैन ने जालिम यजीद के खिलाफ बगावत करी थी

दोनों ने ही जानबूझकर अपने दौर के ढ़ोंग और जुल्म के खिलाफ आवाज उठाई मौत का रास्ता चुना

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Hameed Qaiser_Pakistan

10 محرم الحرام کے بعد یزیدیوں کی قید میں جب رسول پاک صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم کی نواسی سیدہ زینب سلام اللہ علیہا قافلہ لے کر دمشق پہنچیں تو بازاروں اور گھروں کی چھتوں پر لوگ جمع ہوگئے کسی کو کچھ پتہ نہیں تھا کہ یہ کٹے ہوئے سر کن کے ہیں اور یہ جو قیدی آرہے ہیں کون ہیں؟
صرف اتنا اعلان کیا ہوا تھا کہ حکومت کے کچھ باغیوں کو قتل کردیا گیا ہے اور ان کے سر یزید کے دربار میں پہنچائے جارہے ہیں۔ لوگ باغیوں کو دیکھنے کے لئے چھتوں پر چڑھ رہے تھے۔
بازار دمشق میں ہجوم ہو گیا۔ قافلہ رک گیا۔

(آج وہ بازار حمیدیہ کہلاتا ہے جس کی تصویر ساتھ دی گئی ہے)
بھوک، پیاس اور پریشان حالی تھی۔ چھت سے ایک خاتون نے دیکھا کہ قیدی ہیں پریشان حال ہیں تو اس نے پانی، کچھ کھانے کی چیزیں، کچھ کپڑے، دوپٹے اور ضرورت کا سامان بھیجا۔
نواسی رسول سیدہ زینب سلام اللہ علیہا نے سارا کچھ دیکھ کر اس خاتون کو بلوایا جب وہ قریب آئی تو آپ رضی اللہ عنہ نے فرمایا : بی بی تو نے ہمارے ساتھ بڑی نیکی کی ہے کوفہ سے لے کر دمشق تک کسی نے ہمیں پوچھا تک نہیں کسی نے ہمارے حال کی خبر نہیں لی تم کون ہو؟ اور ہمیں کیا سمجھ کر ہم سے اتنی بھلائی کی‘‘۔
اس نے کہا : ’’میں آپ کچھ نہیں جانتی دراصل میں اپنی اوائل عمر میں مدینہ رہتی تھی اور حضرت فاطمۃ الزہراء سلام اللہ علیہا کی خادمہ تھی جب انکا وصال ہوگیا تو مدینہ چھوڑ کر دمشق آ گئی‘‘۔
آپ سلام اللہ علیہا نے فرمایا : ’’اگر تم نے اتنی نیکی کی ہے تو تمہیں کیا معلوم ہے ہم کون ہیں‘‘؟
اس نے جواب دیا : ’’مجھے اور تو کچھ معلوم نہیں لیکن جب سیدہ کائنات رضی اللہ عنہا کے وصال کا آخری وقت تھا تو میں نے عرض کیا بی بی مجھے کچھ وصیت کر دیں اس وصیت پر عمر بھر عمل کروں گی وہ مجھے جانتی تھیں کہ میں دمشق سے ہوں انہوں نے مجھے وصیت کی کہ بیٹا ایک ہی وصیت ہے کبھی قیدی نظر آئیں توان سے اچھا سلوک کرنا۔
میں نے سیدہ فاطمۃ الزہراء رضی اللہ عنہا کی وصیت پر عمل کیا ہے‘‘۔
سیدہ زینب سلام اللہ علیہا آنکھوں میں آنسو لئے فرمانے لگیں۔ ’’اللہ تیرا بھلا کرے بتا تو نے ہم سے اتنی نیکی کی ہم تیرے لئے کیا دعا کریں ہم تو اس وقت خود مہاجر ہیں۔ قیدی، مظلوم، بے یارو مددگار ہیں ہم تیرے لئے کیا دعا کرسکتے ہیں‘‘۔
اس نے کہا : ’’بی بی میری ایک ہی آرزو ہے‘‘
سیدہ زینب سلام اللہ علیہا نے پوچھا : ’’کیا آرزو ہے‘‘؟
اس نے کہا : جب میں وہاں سے چلی تھی اس وقت سیدہ فاطمۃ الزہراء رضی اللہ عنہا کے چھوٹے چھوٹے شہزادے تھے حسن اور حسین رضی اللہ عنہما اور بی بی زینب رضی اللہ عنہا اب زمانہ گزر گیا۔
میری اس وقت سے آرزو ہے کہ مجھے حسن و حسین رضی اللہ عنہما اور زینب رضی اللہ عنہا کی زیارت ہوجائے آپ رضی اللہ عنہا دعا کر دیں کہ مجھے ان کی زیارت ہوجائے۔ بی بی زینب رضی اللہ عنہا نے فرمایا : ’’تیری دعا قبول ہوگئی ہے۔
میں زینب (سلام اللہ علیہا ) ہوں قیدی ہوں اور یہ جو سر کٹا ہوا نیزے پر دیکھ رہی ہو یہ سیدہ کائنات فاطمۃ الزہرا سلام اللہ علیہا کے بیٹے حسین (علیہ السلام ) ہیں۔

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The Bara Imambara Complex at Lucknow,ca. 1800

The unknown artist of this work has created a bird’s-eye view of the Bara Imambara complex in the style of a European topographical study. It is a valuable historical record of several parts of the site, which were demolished during the Indian uprising of 1857. The distant gardens and structures seen on the upper left, for example, no longer exist. The Bara Imambara, whose name means “big shrine,” comprises the massive congregational mosque (seen at an angle at the upper right) and several interlocking forecourts.

It is an important place of worship for Shia Muslims, who celebrate the religious festival of Muharram. This massive structure was commis-sioned by Nawab Asaf al-Daula of Lucknow as part of a famine-relief project.

Image and text credit:
© The Metropolitan Museum of Art
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Surayya Baquaie Ansari

दसवीं मोहर्रम इस्लामिक तारीख के लिहाज से बेहद अहम दिन।
जन्नत और जमीन की तखलीक़ का दिन। आदम और हव्वा के जन्नत से निकलने के बाद ज़मीन पर मिलने का दिन। क़ाबा की नींव रखने का दिन। कयामत का दिन। रोजे महशर का दिन। और हजरत इमाम हुसैन की शहादत दिन।

भूख-प्यास, दौलत, माल जैसी तमाम चीजें जो किसी के लिए सबसे अहम हो सकती हैं, को दरकिनार करते हुए अन्याय, झूठ, अत्याचार, शोषण, दमन, लालच, बेईमानी जैसी वैयक्तिक/सामाजिक बुराई की मुखालिफत का दिन।

खुश्क़ हलक, सूखे मश्क़, तीन दिन की प्यास के बाद भी चलते तीर, भाले, जिस्म के रेज़े, कटे बाज़ुओं के इन्तेहाई ज़ुल्म पर भी सच्चाई ने, सादगी ने, हक़ ने, झूठ से, बातिल से, शोषक से समझौता नहीं किया।

लेकिन तारीख की तवारीख समझने में दिलचस्पी किसे है! ढोल पीटने, ताजिया उठाने में सारा मजा है। हमने इस्लामिक मूल्यों,आदर्शों को नोहा, मातम, ताजिया, जुलूस,अलम से तब्दील कर लिया। झूठ, मक्कारी, लूट, बेईमानी, रिशवतखोरी, हराम कमाई को शरबत, मलीदा और खिचड़ा भर से रोक कर शुद्ध मान लिया है।

मेरा concern सिर्फ शिया नहीं हैं। कर्नलगंज में ताजिया सुन्नी रखते हैं। सारा जोर इस बात का रहता कि किस गांव, इलाके की ताजिया सबसे खूबसूरत, ऊंची और महंगी है।
इतना भर तो आशूरा नहीं है ना !
हो सके और ना हो सके तो भी, बच्चों को इस दिन अहमियत समझाएं। कार्टून channel रोक कर इमाम हुसैन की शहादत का असल मतलब बताएं।
“चलो तनि मेला घूमि आवा जाए”
और “किसकी पीठ पर सबसे ज़्यादा छुरियों के घाव” भर आशूरा नहीं है।

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Mohd Aamir Rasheed

आज योमैं ए अशरे पर आशिकाने हुसैन के लिए एक सबील का आयोजन कर अज़ादारे हुसैन की सेवा हुसैन के चाहने वालो में अपना नाम दर्ज कराके बहुत गर्व व ख़ुशी का अहसास हुआ ।
यहाँ मौहम्मद आमिर रशीद ने कहा कि ईमाम हुसैन नवासा ए रसूल थे, जिन्होंने हक़्क़ और इस्लम बचाने के लिए अपनी जान क़ुर्बान दी ,उस वक़्त के ज़ालिम बादशाह यज़ीद ने हर तरफ अपनी ज्यादती और बल के दम पर लोगो को परेशान का उत्पीड़न कर रहा था, वो अपने दौर में इसलाम में भी बहुत सी ग़लत चीज़ो को अपने दम पर जोड़ना चाहता था जिसका विरोध इमाम हुसैन ने किया, इमाम हुसैन 54 वर्ष की आयु में जंग ए कर्बला में अपने 72 साथियों के साथ तीन दिन के प्यासे यह लोग कर्बला की जंग में शहीद हुए।जिसमे नन्हा बचा अली अश्गर, अली अकबर क़ासिम ऑन और मुहम्मद शामिल थे।
आमिर ने कहा की इमाम हुसैन के 72 साथियो में 52 लोग उनके परिवार के थे यह विश्व के इतिहास में पहली ऐसी जंग है जिसमे हक़्क़ को बचाने के लिए इमाम हुसैन अपने ही ख़ानदान के 52 लोगों को भूका प्यासा शहीद होना पड़ा था।
आज मुस्लमान जगह जगह पिट लुठ जलील हो रहा है वो सिर्फ इसी लिए की हमने हुसैन के पैग़ाम को भुला दिया है, हमे हर हाल में हुसैनी मुस्लमान बनना होगा इमाम हुसैन की क़ुरबानी से हमे यह सीख मिलती है की समाज में बदलाव व क्रांति की शरुआत अपने घर से ही शुरू करनी पढ़ती है।

 

kashmir

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