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#वो अली बिरादरान,  मौलाना शौकत अली और मौलाना मोहम्मद अली जौहर की ‘माँ’ हैं

Md Umar Ashraf
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साल 2019 खिलाफ़त तहरीक का शताब्दी वर्ष है, यानी 2019 में खिलाफ़त तहरीक को पूरे 100 साल हो गए. खिलाफ़त तहरीक ही वो तहरीक है जिसने मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा गांधी बनाया. इसी तहरीक ने महात्मा गांधी को पूरे हिंदुस्तान का दौरा करने का मौका दिया. और पूरे हिंदुस्तान ने पहली बार गांधी को जाना और सुना. महात्मा गांधी ने ख़िलाफ़त तहरीक से मिले सकारात्मक रिस्पांस का फ़ायदा उठाते हुए ‘असहयोग आंदोलन’ कि शुरुआत की. 1857 के बाद ख़िलाफ़त तहरीक और असहयोग आंदोलन के गठजोड़ ने एक बार फिर से हिंदुस्तान के हिंदू और मुसलमानों को एक सफ़ में लाकर खड़ा कर दिया. वह कांधे से कंधा मिलाकर हिंदुस्तान की आज़ादी के ख़ातिर एक साथ जमा हुए.

एक तरफ़ 2019 में भारत सरकार गांधीजी की 150वीं जयंती धूम धाम से मना रही है, वहीं जामिया मिलिया इस्लामिया ने भी अपने 100वें वर्षगाठ को धूम धाम से मनाने का एलान कर दिया है, इन तमाम आयोजन के बीच एक बड़ा आंदोलन बिल्कुल ही भुला दिया गया है, और वह है “ख़िलाफ़त तहरीक”. ना ही इसे किसी के द्वारा याद किया जा रहा है, ना ही इसे सेलिब्रेट. चाहे महात्मा गांधी हो या फिर जामिया मिलिया इस्लामिया, इन दोनों की तरक़्क़ी के पीछे जिस मूवमेंट का सबसे बड़ा हाथ है, वह है ख़िलाफ़त तहरीक. जहां ऑल इंडिया ख़िलाफ़त कमेटी के ख़र्चे पर गांधीजी को पूरे हिंदुस्तान का दौरा कराया गया, वहीं ऑल इंडिया ख़िलाफ़त कमेटी से जुड़े लोगों ने ही जामिया मिलिया इस्लामिया की बुनियाद 1920 में डाली. जामिया मिलिया इस्लामिया की बुनियाद डालने वालों में हकीम अजमल ख़ान, मौलाना मोहम्मद अली जौहर, मौलाना शौकत अली और डॉक्टर मुख़्तार अंसारी जैसे लोगों का नाम सबसे आगे है, वहीं इसकी बुनियाद शेख उल हिंद महमूद उल हसन ने डाली थी.

 

ख़िलाफ़त तहरीक को लीड करने में जिन लोगों का नाम आता है, उसमें अली बिरादरान यानी मौलाना शौकत अली और मौलाना मोहम्मद अली जौहर का नाम सबसे ऊपर है, इन्होंने ही इस तहरीक को इसके बुलंदी पर पहुंचाया. पर इन दोनों भाइयों की तरक़्क़ी के पीछे एक बहुत बड़ी शख़्सयत खड़ी है, और उसका नाम है, आबदी बनो बेगम, जिन्हे हिंदुस्तानी मुहब्बत से ‘बी अम्मा’ कहते हैं, वो अली बिरादरान यानी मौलाना शौकत अली और मौलाना मोहम्मद अली जौहर की वाल्दा है यानी ‘माँ’ हैं.

 

 

बुलंदियों का बड़ा से बड़ा निशान छुआ
उठाया माँ ने गोद में तब आसमान छुआ

जवानी में ही बेवा हो जाने वाली आबदी बनो बेगम ने अपने बच्चों की ना सिर्फ़ परवरिश की, बल्के पढ़ाई के लिए उन्हे अपने से दूर इंग्लैंड तक भेजा. वहीं ख़िलाफ़त तहरीक के दौरान ‘बी अम्मा’ ना सिर्फ़ अपने दोनों बेटों के साथ थीं, बल्के कई ऐसे मौके आए जब उन्होंने ख़िलाफ़त तहरीक को लीड किया. पूरे हिंदुस्तान का दौरा किया और तिलक फ़ंड और ख़िलाफ़त कमेटी के लिए कई लाख रुपया उस ज़माने में चंदे के रूप में जमा किया. उनकी तक़रीर सुनकर औरतें अपने गहने और ज़ेवर तक दान कर दिया करती थीं. जब उनके दोनों बेटे मौलाना शौकत अली और मौलाना मोहम्मद अली जौहर जेल गए तो इन्होंने अपने बेटे को बहुत प्रेरित किया, के घबराना नहीं है. उनकी प्रेरणा को शफ़ीक़ रामपुरी ने कुछ इस तरह लिखा है:

बोलीं अमाँ ‘मोहम्मद-अली’ की
जान बेटा ख़िलाफ़त पे दे दो
साथ तेरे हैं ‘शौकत-अली’ भी
जान बेटा ख़िलाफ़त पे दे दो

गर ज़रा सुस्त देखूँगी तुम को
दूध हरगिज़ न बख़्शूँगी तुम को
मैं दिलावर न समझूँगी तुम को
जान बेटा ख़िलाफ़त पे दे दो

ग़ैब से मेरी इमदाद होगी
अब हुकूमत ये बर्बाद होगी
हश्र तक अब न आबाद होगी
जान बेटा ख़िलाफ़त पे दे दो

खाँसी आए अगर तुम को जानी
माँगना मत हुकूमत से पानी
बूढ़ी अमाँ का कुछ ग़म न करना
कलमा पढ़ पढ़ ख़िलाफ़त पे मरना

पूरे उस इम्तिहाँ में उतरना
जान बेटा ख़िलाफ़त पे दे दो
होते मेरे अगर सात बेटे
करती सब को ख़िलाफ़त पे सदक़े

हैं यही दीन-ए-अहमद के रस्ते
जान बेटा ख़िलाफ़त पे दे दो
हश्र में हश्र बरपा करूँगी
पेश-ए-हक़ तुम को ले के चलूँगी

इस हुकूमत पे दावा करूँगी
जान बेटा ख़िलाफ़त पे दे दो
चैन हम ने ‘शफ़ीक़’ अब न पाया
जान बेटा ख़िलाफ़त पे दे दो

अब जहाँ ख़िलाफ़त तहरीक को पुरी तरह भुला दिया गया है, तो वहां ‘बी अम्मा’ को भला कौन याद करता है?

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