विशेष

अरबों का माल लूटने की अमरीका की नई चाल, जानिये!

अमरीका ने फ़ार्स खाड़ी रक्षा एलायंस बनाया और ग़ायब रहे तीन अरब देश, एलायंस का यह ड्रामा क्या ईरान जैसी ताक़त को आगे बढ़ने से रोक पाएगा? कहीं अरबों का माल लूटने की यह नई क़वायद तो नहीं?

घोषणा कर दी गई कि अमरीका के नेतृत्व में बने एलायंस ने फ़ार्स खाड़ी के जल क्षेत्र की रक्षा का अभियान शुरू कर दिया है। इसमें केवल छह देश शामिल हैं। इस पर हमें अरबी भाषा की यह कहावत याद आई कि प्रसव पीड़ा तो पहाड़ को हुई लेकिन पैदा हुआ चूहा!

कई देशों का इस एलायंस से दूर रहना साफ़ ज़ाहिर करता है कि अमरीका का प्रभाव सीमित हो गया है केवल मध्यपूर्व के इलाक़े में नहीं बल्कि विश्व स्तर पर भी यही हालत है। वह ज़माना बीत चुका है जब अमरीकी संस्थाएं तीस देशों और साठ देशों का गठबंधन आनन फ़ानन में बना लिया करती थीं। इराक़, लीबिया, सीरिया और अफ़ग़ानिस्तान में हम इसके उदाहरण देख चुके हैं।

यह बात भी ध्यान योग्य थी कि फ़ार्स खाड़ी के तीन बड़े अरब देश इस एलायंस से दूर रहे। कुवैत, ओमान और क़तर ने केवल इस लिए नहीं कि यह देश ईरान के मामले में निष्पक्ष रहने की नीति पर चल रहे हैं बल्कि इसलिए भी कि उन्हें अमरीका और ख़ास तौर पर वर्तमान ट्रम्प सरकार पर भरोसा नहीं रह गया है। ट्रम्प प्रशासन की नीतिया भड़काऊ और उत्तेजक हैं जिनसे कभी भी कोई क्षेत्रीय संकट पैदा हो सकता है तो अमरीका का रोल उत्तेजना फैलाने वाला है रक्षा करने वाला नहीं।

अमरीकी एलायंस में छह देश शामिल हुए हैं। यह देश हैं ब्रिटेन, सऊदी अरब, इमारात, बहरैन, आस्ट्रेलिया और अलबानिया जबकि अमरीका इसका नेतृत्व संभाल रहा है। हमें कहीं से यह नहीं लगता कि यह देश समुद्री परिवहन की रक्षा कर सकेंगे क्योंकि अमरीका और ब्रिटेन को छोड़कर इनमें किसी भी देश के पास ताक़तवर नौसेना नहीं है। अलबानिया, बहरैन, इमारात और सऊदी अरब के समुद्री बेड़े आपको कहां नज़र आते हैं? जबकि ईरान की बात की जाए तो उसकी नौसेना काफ़ी ताक़तवर है और वह समुद्री जहाज़ों को ध्वस्त कर देने वाले मिसाइल ख़ुद बनाता है। ईरान के पास अलग अलग आकार के सैकड़ों युद्धपोत और नौकाएं हैं। इस प्रकार की नौकाएं भी हैं जो राडार के स्क्रीन पर देखी नहीं जा सकतीं।

यह भी सवाल महत्वपूर्ण है कि इस एलायंस में वह देश शामिल क्यों नहीं हुए जो फ़ार्स खाड़ी के समुद्री मार्ग से अपनी ज़रूरत का तेल तथा अन्य चीज़ें ले जाते हैं? इनमें फ़्रांस, जर्मनी, बेल्जियम, चीन और भारत का नाम लिया जा सकता है। हालांकि इससे पहले तक इनमें से अधिकतर देश इस इलाक़े में अमरीका के युद्धों का हिस्सा हुआ करते थे। जवाब यह है कि असल में अमरीका ही सारे तनाव और विवाद की जड़ है जिसने परमाणु समझौते से निकल कर हालात को ख़राब किया है।

पिछले अनुभवों को सामने रखते हुए कहा जा सकता है कि ईरान के तेल टैंकर को जिबराल्टर स्ट्रेट में पकड़ा गया तो इसके जवाब में ईरान ने ब्रिटेन के दो जहाज़ पकड़ लिए और यही नहीं अमरीकी युद्धक नौकाओं के बीच से इन जहाज़ों को निकाल लिया जबकि अमरीका ने ब्रिटिश जहाज़ों को बचाने के लिए कोई क़दम नहीं उठाया। ट्रम्प ने तो एलान भी कर दिया कि वह सारे जहाज़ों की रक्षा के ज़िम्मेदार नहीं हैं केवल अमरीकी जहाज़ों की रक्षा करेंगे।

जब अधिकतर अमरीकी बेड़े और युद्धपोत फ़ार्स खाड़ी से भागकर अरब सागर में 800 किलोमीटर दूर जाकर ठहरे हैं ताकि ख़ुद को ईरानी मिसाइलों की पहुंच से दूर रखें तो फिर यह युद्धपोत फ़ार्स खाड़ी और हुरमुज़ स्ट्रेट में व्यापारिक जहाज़ों की रक्षा कैसे करेंगे?

तो असली माजरा यह है कि अमरीका इस एलायंस में शामिल तीन अरब देशों सऊदी अरब, इमारात और बहरैन को एक बार फिर दूहना चाह रहा है। ट्रम्प के पास इन देशों को लूटने की ख़ास दक्षता है। वह क़ीमत पहले ही वसूलते हैं, भारी क़ीमत वसूलते हैं बल्कि शायद “बख़शिश” (टिप) भी वसूलना नहीं भूलते।

साभार रायुल यौम

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *