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एक देश के रूप में इसराइल को नष्ट करने का मतलब यहूदियों को नष्ट करना नहीं है : अली ख़मेनई

ईरान के सर्वोच्च नेता अयतोल्लाह अली ख़मेनई ने कहा है कि ईरान यहूदियों को नष्ट नहीं करना चाहता है लेकिन सभी धर्मों के लोगों को इसराइल का भविष्य तय करना चाहिए.

1979 में इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान ने इसराइल को मान्यता देने से इनकार कर दिया था और वो फ़लीस्तीनी समूहों को समर्थन करता है. इसराइल लंबे समय से कहता रहा है कि ईरान उसे नष्ट करना चहता है और मध्य-पूर्व में उसे अपना प्रमुख दुश्मन मानता है.

तेहरान में एक इस्लामिक कॉन्फ़्रेंस में ख़मेनई ने कहा, ”एक देश के रूप में इसराइल को नष्ट करने का मतलब यहूदियों को नष्ट करना नहीं है. इसका मतलब यह है कि फ़लस्तीन के लोग, चाहे वो मुसलमान, ईसाई या यहूदी हों- उन्हें अपनी सरकार को चुनना चाहिए.” ख़मेनई ने पश्चिमी बलों की उसके परमाणु प्रोग्राम को रोकने के लिए भी आलोचना की.

ख़मेनई ने कहा, ”असैन्य परमाणु ऊर्जा की ज़रूरत सभी देशों की है लेकिन पश्चिम के देश इस पर एकाधिकार चाहते हैं. पश्चिम के लोग जानते हैं कि हमें परमाणु हथियार नहीं चाहिए क्योंकि हमारे धार्मिक सिद्धांत भी इसकी इजाज़त नहीं देते.” अमरीका का मानना है कि ईरान परमाणु बम बनाने को लेकर वर्षों से काम कर रहा है इसीलिए उसने कई तरह के कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा रखे हैं.

साल 1979 में ईरान की क्रांति ने कट्टरपंथियों को सत्ता में आने का मौक़ा दिया और तभी से ईरानी नेता इसराइल को मिटाने की बात करते रहे हैं. ईरान, इसराइल के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता है और उसका कहना है कि इसराइल ने मुसलमानों की ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा कर रखा है.

दूसरी तरफ़, इसराइल भी ईरान को एक ख़तरे के तौर पर देखता है. उसने हमेशा ही ये कहा है कि ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं होने चाहिए. मध्य-पूर्व में ईरान के बढ़ते असर से भी इसराइल के नेताओं की चिंताएं बढ़ जाती हैं.

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