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जब हम अपनी इज़्ज़त को कुचलने, मसलने वालों की क़ामयाबी पर भी ताली बजाते हैं!

Ayaz Sherwani
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السلامُ علیکم
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मुल्क में मुसलमानों के वजूद को खुले आम और बदतरीन जुमलों में, जिस तरह, बाल ठाकरे ने ललकारा और मुल्क का कानून तक, ठाकरे की मुस्लिम दुश्मनी की बिना पर बढ़ी हुई ताकत की वजह से खामोश रहा, उस तरह खुल कर, गालियां और मज़ाक उड़ाने की हिम्मत, विनय कटियार और प्रवीण तोगड़िया को भी बोहोत बाद में हुई ….

क्या शिव सेना की हिम्मत है कि …
मुसलमानों के दो स्थान पाकिस्तान या कब्रस्तान …
मुस्लिम ठिकाना हिन्द महासागर …..

एक धक्का दो मुसलमानों को हिन्द महासागर में धकेल दो …….. के नारे के बाद अस्सी के आखिर में … एक धक्का और दो बाबरी मस्जिद तोड़ दो …… जैसे हमारे हालात को बुज़दिली की चादर में ढकने वाले नारों को … नकार दे … जिन का असर आज साफ़ नज़र आता है …. जब रास्ते की तलाश में हम अपनी इज़्ज़त को कुचलने, मसलने वालों की कामयाबी पर भी ताली बजाते हैं।

इन नारों ने कितना नुकसान किया आज समझ में आता है के आज खौ़जदा का इतना खौफ है कि बेइज्जती और वजूद कोई माने नहीं रखता…..
जब बेइज्जती से ज़िंदगी गुजारना सीख ली जाती है तब फिर उन लोगों को मजबूत नहीं किया जाता, जो अपने नाम और काम से ही बे इज़्ज़त करने वालों के दिलों में देहशत पैदा करते हैं और कोई मुसलमान कह कर गाली देने की हिम्मत नहीं करता…

जब इज़्ज़त से ही समझौता होता है तब फिर उसी बे इज़्ज़ती की ज़िंदगी जीते हैं और वहम आे गुमान में भी नहीं आता के इज़्ज़त क्या है…..और अब क्या करें….कोई रास्ता नहीं है….वक़्त की ज़रूरत है….जैसे जुमले ही कुदरत कि मंशा ज़ाहिर कर देते हैं कि जिस कौम के लोगों को नायाब इज़्ज़त के साथ ज़िंदगी गुजारने भेजा था…वोह…बाल ठाकरे जैसे बद तारीन कौम दुश्मन और खुल कर औकात की बात करने वालों की सोच को भी ज़रूरत समझ लेती है और फिर वही कुदरती तौर पर ज़रूरत बना दी जाती है..

कोई हैरत नहीं की अब बाल ठाकरे की समाधी पर चादर चढाने वाले भी,कौम को अपनी ताक़त से डराएं….

जिस तरह बे ईमान न्यूज़ चैनल वालों का नंगा नाच और आरएसएस और बीजेपी के रहते बाबरी मस्जिद की शहादत से कश्मीर, ट्रिपल तलाक और खुल कर मेरे वजूद से नफ़रत नहीं भूल सकता, उसी तरह बाल ठाकरे की नफ़रत को भी नहीं भूल सकता

ملک میں،مسلمانوں کے وجود کو کھلے عام اور بدترین جملوں سے طرح بال ٹھاکرے نے للکارا اور ملک کا قانون تک،بال ٹھاکرے کی مسلم دشمنی کی بنا پر بڑی ہوئی طاقت کی وجہ سے خاموش رہا ۔۔۔ اس طرح کھل کر گالیاں اور مذاق اڑانے کی ہمت ونے کٹیار اور پروین توگڑیا کو بھی بہت بعد میں ہوئی۔
یہ بال ٹھاکرے کے نعرے تھے کہ
۔۔۔ مسلمانوں کے دو استھان ۔۔۔ پاکستان یا قبرستان
۔۔۔ مسلم ٹھکانہ عرب مہا ساگر
۔۔۔ ایک دھکا دو مسلمانوں کو عرب ساگر میں دھکیل دو۔۔۔۔۔۔۔۔۔کے نعرے کے بعد اسی کے آخر میں ایک دھکا اور دو بابری مسجد توڑ دو۔۔۔۔۔۔۔جیسے نعرے ہمارے حالات کو بزدلی کی چادر میں ڈھکنے والے نعروں کا اثر صاف نظر آتا ہے جب ہم راستے کی تلاش میں ہم اپنی عزت کو کچلنے،مسلنے والوں کی کامیابی پر بھی تالی بجاتے ہیں۔۔۔
اُن نفرت سے بھرے نعروں نے کتنا نقصان ہوا ہے وہ صاف نظر آتا ہے جب آج ہمارے لیے اپنی بے عزت اور وجود پر سوال بھی کوئی معنی نہیں رکھتا۔
جب بےعزتی سے زندگی گزارنا سیکھ لی جاتی ہےتو اُن لوگوں کو مضبوط نہیں کیا جاتا جو اپنے نام اور کام سے ہی بےعزت کرنے والوں کے دلوں میں دہشت پیدا کرتے ہیں اور اور کوئی مسلمان کہہ کر گالی دینے کی ہمت نہیں کرتا –
جب عزت سے ہی سمجھوتا ہوتا ہے تو پھر اسی بےعزتی کی زندگی جیتے ہیں اور وہم و گمان میں بھی نہیں آتا کہ اصل میں عزت کیا ہے ؟ اور۔۔۔۔اب کیا کریں ۔۔۔۔ کوئی راستہ نہیں ہے ۔۔۔۔ وقت کی ضرورت ہے ۔۔۔۔ جیسے جملی ہیں قدرت کی منشا ظاہر کر دیتے ہیں کہ جس قوم کے لوگوں کو نایاب عزت کے ساتھ زندگی گزارنے بھیجا تھا۔۔۔ وہ۔۔۔بال ٹھاکرے جیسے بدترین قوم دشمن اور کھل کر مسلم اوقات کی بات کرنے والوں سوچ کو بھی ضرورت سمجھ لیتی ہے اور پھر وہی قدرتی طور پر ضرورت بنا دی جاتی ہے –
کوئی حیرت نہیں کہ بال ٹھاکرے کی سمادھی پر بھی اردو نام کے چادر چڑھانے والے بھی اپنی طاقت سے اپنی ہی قوم کو ڈرائیں ۔۔۔
جس طرح بےایمان نیوز چینل والوں کا ننگا ناچ اور آر ایس ایس اور بی جے پی کے رہتے بابری مسجد کی شہادت سے کشمیر اور تین طلاق اور کھل کر میرے وجود سے نفرت نہیں بھول سکتا ۔۔۔۔ اسی طرح بال ٹھاکرے کی مسلمانوں کے لیے نفرت بھی نہیں بھول سکتا۔۔۔

 

witters own views, teesri jung not endorsing his views.

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