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फ़िलिस्तीन की ज़मीन पर नाजायज़ देश इस्राईल का वजूद : मुस्लिम हुक्मरानों के मुंह पर तमाचा है : रिपोर्ट

जानिये बीसवीं सदी के लज्जाजनक घोषणापत्र “बालफ़ोर घोषणापत्र” के बारे में

ईरानी छात्रों ने शुक्रवार को बीसवीं सदी के सबसे ज़्यादा लज्जानक घोषणापत्रों में से एक “बालफ़ोर घोषणापत्र” के पारित होने के वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर, तेहरान स्थित ब्रितानी दूतावास के बाहर प्रदर्शन किया। इसी तरह छात्रों ने फ़िलिस्तीनी राष्ट्र के ख़िलाफ़ ब्रिटेन की नीतियों की निंदा की।

समाचार एजेंसी फ़ार्स के मुताबिक़, प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने फ़िलिस्तीन का ध्वज फहराया। इसी तरह छात्रों ने ब्रिटेन सरकार की नीतियों और ज़ायोनी शासन के अपराध की निंदा में नारे लगाए।

“बालफ़ोर घोषणापत्र” ब्रिटेन के इतिहास का सबसे लज्जाजनक घोषणापत्र समझा जाता है जिससे फ़िलिस्तीन पर ज़ायोनियों के अवैध क़ब्ज़े और इस्राईल को अवैध वजूद देने का रास्ता साफ़ हुआ।

यह घोषणापत्र तत्कालीन ब्रितानी विदेश मंत्री आर्थर जेम्ज़ बालफ़ोर ने 2 नवंबर 1917 को यहूदी संप्रदाय के नेता बैरन रॉथचाइल्ड के नाम पारित किया था। इस घोषणापत्र में फ़िलिस्तीन की भूमि पर अवैध इस्राईल के वजूद को क़ायम करने की इजाज़त दी गयी।

यह घोषणापत्र फ़िलिस्तीन की पीड़ित जनता की बहुत सी यातना का कारण बना।

फिलस्तीन फौज के ज़रिये आज़ाद करवाया जायेगा 

(an old  article )

मुअज़्ज़िज़ भाईओ :
अल-क़ूदस की आज़ादी बातों से नहीं बल्कि मुस्लिम अफ़्वाज की सीहोनी रियासत से जंग के ज़रीये ही मुम्किन है

आज दो दिन की लाहासिल (अप्रर्याप्‍त) और बे मक़सद बहसों के बाद 28 मार्च 2010 ई. को अरब हुक्‍मरानों ने अपनी बाईसवीं सिमट कान्फ़्रैंस का इख्‍तताम (End) सुरते लीबिया में किया। जिससे पहले 25 और 26 मार्च को उनके वज़राइ ख़ारिजा (विदेश मंत्रयों) ने भी उसकी तैय्यारी के लिए मुलाक़ातें की थीं और इस कान्फ़्रैंस के लिए एजंडा तैय्यार किया था। इस सिमट कान्फ़्रैंस में जो क़रारदादें पास हुईं वो माज़ी की तरह पुरानी और नई इसतारों से भरी पड़ी थीं जैसाकि अमन process, अरब। इसराईली तसादुम (Arab Israeli conflict), अरब का पहल करने का इक़दाम (the Arab initiative), हरमे इब्राहीम और मस्जिदे बिलाल को खोलने से इसराईल का इनकार इसके साथ-साथ नई आबादकारियों से बाज़ आने से यहूदीयों का इनकार और इसके मुज़ाकरात (वार्ता) पर वास्ता या बिलवासता (direct or indirect) असरात…. इराक़ और इमारात में सूरते हाल, सूडान, सोमालिया और कमोरस के जज़ाइर (द्वीपों) में अमन और तरक़्क़ी की हिमायत, और ख़ित्ते को ऐटमी हथियारों से पाक करना वग़ैरा वग़ैरा …. और इसके बाद मज़ीद एक और सिमट कान्फ़्रैंस के लिए एक इज़ाफ़ी क़रारदाद भी मंज़ूर की गई जिसमें ये हुक्‍मरान सिर्फ़ मेलजोल और एक दूसरे को शाबाशियां देंगे। ये सब बेवुक़त और बे मक़सद क़रारदादें हैं जो असल मसला को हल नहीं करतीं बल्कि उसे और उलझा देती हैं और ये सिर्फ़ फुज़ूलीयात हैं जिनका कोई मतलब नहीं। यहां तक कि सिमट के इख्‍तताम पर आलामीया भी जल्दी-जल्दी पढ़ दिया गया जैसे शायद ये हुक्‍मरान इससे शर्मिंदा थे।

बहरहाल वज़ीरे ख़ारिजा की शुरूआती मुलाक़ातों से सिमट कान्फ़्रैंस के आलामीया तक दो नुकात तवज्जो तलब हैं।

पहला ये कि बर्तानवी एजैंट पूरी मेहनत के साथ अरब लीग की क़रारदादों को मुतास्सिर और कंट्रोल करनी की कोशिशों में मसरूफ़ थे। यमन ने अरब लीग की जगह अरब यूनीयन बनाने की तजवीज़ पेश की और जिस तरह लेबनानी सदर और इसके वफ़द ने फ़ौरन इसका ख़ैर मुक़द्दम किया इससे वाज़ेह था कि इनका इस पर पहले से गठजोड़ था। और फिर क़ज़ाफ़ी ने कहा कि इस पर इत्तिफ़ाक़े राय है, दूसरी तरफ़ क़ज़ाफ़ी ने सिमट का सदर होने की हैसियत से अरब लीग के सैक्रेटरी जनरल के एहतिसाब और ख़ास सिमट कान्फ़्रैंसें तलब करने के इख़्तयारात का भी मुतालिबा किया। इस सबसे वाज़ेह होता है कि बर्तानिया अपने एजैंटों के ज़रीये अरब लीग का मुतबादिल (विकल्‍प) ढ़ूढ़ने की कोशिश कर रहा है यानी अरब लीग की जगह वो कुछ और क़ायम कर सके, और वो इसलिए कि अरब लीग जिसे 22 मार्च 1945 ई. को बर्तानिया ने क़ायम किया था पिछले कुछ सालों में अमरीका की दस्ते रास्त बन चुकी है जो कि अरब लीग की क़रारदादों से वाज़ेह है…. अरब लीग का मर्कज़ क़ाहिरा में है और मसरुका सदर अमरीकी एजैंट है, वो सुपरवाइज़र की हैसियत से अरब लीग और सैक्रेटरी जनरल दोनों की रखवाली करता है। अगरचे बर्तानिया और इसके एजैंट कोशिशें कर रहे हैं लेकिन इसके बावजूद उनकी कामयाबी के लक्षण कम हैं, बल्कि ज़्यादा इमकान (लक्षण) तो इस बात का है कि ये कोशिशें सिर्फ़ पानी की गहराई का अंदाज़ा लगाने के लिए हैं कि देखें क्या नतीजा निकलता है ताकि इसके मुताबिक़ आइन्दा इक़दामात उठाए जा सकें।

दूसरा मौज़ू अल-क़ूदस का है, क़रारदादों ने कम अज़ कम इस मौज़ू पर बात ज़रूर की है जिसकी बिना पर पूरी कान्फ़्रैंस इस शीरीं ज़बानी (मीठे बोल) से लुत्‍फ अंदोज़ हुई….. कान्फ़्रैंस में फ़ातिहाना (विजयी) अंदाज़ में दावा किया गया कि उन्होंने अल-क़ूदस को आज़ाद करवाने की योजना को रूप दे दिया है जिसकी बुनियाद तीन सतूनों (स्‍तम्‍भों) पर होगी, सियासी, क़ानूनी और मालीयाती….. तो उन्होंने अक़्वामे मुत्तहदा (संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ) से मुतालिबा (Dimand) किया कि वो अपनी ज़िम्मेदारीयां निभाए और अरब, इसराईली झगडा़ ख़त्म करवाने के लिए मुनासिब क़दम उठाए। फिर उन्होंने फ़ैसला किया कि वो बैत-उल-मुक़द्दस में इसराईल की तरफ़ से किए जाने वाले मज़ालिम के ख़िलाफ़ आलमी अदालत (International Court) में जाऐंगे। उन्होंने ये फ़ैसला भी किया कि वो अल-क़ूदस को 50 करोड़ डॉलर की रक़म भी देंगे ताकि वो इसराईल के नए आबादकारी के मंसूबों का मुक़ाबला कर सकें। और उन्होंने अरब लीग की सरबराही में अल-क़ूदस के लिए एक बाइख्तियार कमिशनर को तैनात करने का फ़ैसला भी किया। और सबसे अहम इन सब हुक्‍मरानों ने अल-क़ूदस के साथ अपनी मुहब्बत जताने और अल-अक़सा की क़दरदानी के लिए एक दूसरे पर सबक़त (पहल) ले जाने की सरतोड़ कोशिशें कीं। कान्फ़्रैंस से पहले होने वाली वुज़रा की मुलाक़ात में, मिस्र के वज़ीरे ख़ारजा ने अपने हम असुरों से सबक़त ले जाने की कोशिश की और कहा कि मिस्र ने कान्फ़्रैंस का नाम अल-क़ूदस कान्फ़्रैंस रखने की तजवीज़ दी थी तो अरब लीग के लिए शाम के मुस्तक़िल नुमाइंदे ने एहतिजाज किया कि नहीं बल्कि ये इसके मुल्‍क ने दूसरे अरब मुमालिक के वुज़राए ख़ारजा से ऐसा करने का मुतालिबा किया था कि वो इस कान्फ़्रैंस का नाम अल-क़ूदस कान्फ़्रैंस रख दें…. पस अरबों का स्कोर बराबर रहा, चाहे वो मियाना रौ है या नहीं। बिलाशुबा अमरीकीयों ने उर्दगान के लिए इस ख़ित्ते में बेबाकी और जोशीली तक़ारीर करने का किरदार चुन रखा है, जिसकी बदौलत इसने अल-क़ूदस और इसके तक़द्दुस (पवित्रता) के बारे में वो बातें की हैं जो अरब भी नहीं कर सके। और अगर अशकीनाज़ी, जो यहूदी फ़ौज का सरबराह है, अभी कल ही उर्दगान की पेशकश पर तरक़्क़ी में एक मिल्ट्री कान्फ़्रैंस में शामिल ना हुआ होता तो लोगों ने उसकी धुआँदार तक़रीर को यहूदी रियासत के ख़िलाफ़ ऐलानिया जंग समझ लेना था।

ऐ लोगो! इन हुक्‍मरानों के दिमाग़ हैं लेकिन ये सोचते नहीं, उनके कान हैं लेकिन ये सुनते नहीं, उनकी आँखें हैं लेकिन ये देखते नहीं; ये अंधे हैं, आँखों से नहीं बल्कि ये दिलों से अंधे हैं जो उनके सीनों में हैं! क्‍या अल-क़ूदस को एक ऐसा कमिश्‍नर आज़ाद करवा सकता है जिसके पास ख़ुद कोई इख्तियार नहीं? क्या अक़्वामे मुत्तहदा को उसे आज़ाद करवाने का कहने से ये आज़ाद हो सकता है जिसने ख़ुद उस यहूदी रियासत को फिलस्तीन मैन क़ायम किया? और क्या उसे आलमी अदालत के ज़रीये आज़ाद करवाया जा सकता है जो ना तो भलाई को हुक्म देती है और ना ही मुनकिर को रोकती है? क्या अल-क़ूदस की शान में ये गर्मा गर्म तक़ारीर उसे आज़ाद करवा सकती हैं जबकि इनका मुक़र्रर अपने मुल्‍क में यहूदी सिफ़ारत ख़ाने का इफ़्तिताह कर रहा हो और अल-क़ूदस के क़ातिलों की मेज़बानी कर रहा हो?

ऐ लोगों! तुम्हारे दरमियान वो लोग मौजूद हैं जो कहते हैं कि अगर ये हुक्‍मरान मक़बूज़ा (अधिग्रहित) फिलस्तीन से नाता तोड़ भी लें तो भी वो अल-अक़सा और अल-क़ूदस को नहीं छोड़ेंगे, अपने तक़्वे की वजह से ना भी हो तो कम अज़ कम शर्म की वजह से ही…… लेकिन ये अल-क़ूदस है जो ना सिर्फ़ हर तरफ़ से डसा जा रहा है बल्कि इसके दिल पर भी वार हो रहा है, इसके गुंबद पर, उसकी मस्जिद पर, यहूदी इसमें हर तरफ़ से दाख़िल हो चुके हैं, उन्होंने इसके नीचे से ज़मीन खोद डाली है और इसके तक़द्दुस को पामाल कर दिया है। उन्होंने इसके आगे और पीछे आबादियां बना ली हैं। इससे बढ़कर ये कि उन्होंने कान्फ़्रैंस के इफ़्तिताह की रात ग़ाज़ा के ऊपर जारहाना हमला किया और ऐलान किया कि उनकी नई आबादकारी की पॉलिसी किसी तब्‍दीली के बगै़र जारी रहेगी, और ये हुक्‍मरान अपनी मुलाक़ातों, मारकबादों, खानों और क़हक़हों के दौरान चुप साधे ये सब देखते और सुनते रहे।

ऐ मुसलमानों! बेशक अल-क़ूदस को सिर्फ़ एक ऐसा हुक्‍मरान ही आज़ाद करवा सकता है जो अपने ख़ालिक़ अल्लाह (سبحانه وتعالى) के साथ मुख़लिस हो और अल्लाह के रसूल (صلى الله عليه وسلم) के साथ सच्चा हो, जो मुस्लिम फौज़ों की कमान सँभालेगा और तमाम योग्‍य लोगों को इसमें जमा करेगा……. उसे एक मज़बूत और मुत्तक़ी हुक्‍मरान ही आज़ाद करवा सकता है जिसमें उमर बिन खत्‍ताब (رضي الله عنه) जैसी खूबियां हूँ जिसने अल-क़ूदस को हिज्रत के पंद्रहवीं साल में आज़ाद करवाया था, वो एक ऐसा हुक्‍मरान होगा जो उमर बिन खत्‍ताब (رضي الله عنه) के क़ौल को पूरा करे जिसने कहा था कि अल-क़ूदस में कोई यहूदी आबाद नहीं हो सकेगा। ऐसे हुक्‍मरान में सलाहउद्दीन की खूबियां होगी जिसने अल-क़ूदस को 583 हि. में सलीबियों की गन्‍दगी से पाक किया था और वो क़ाज़ी मुहीउद्दीन जैसा होगा जिसने अल-क़ूदस की आज़ादी के बाद पहले जुमा के ख़ुत्बे में इस आयत की तिलावत की थी :

 

فَقُطِعَ دَابِرُ الْقَوْمِ الَّذِيْنَ ظَلَمُوْا ۭوَالْحَـمْدُ لِلّٰهِ رَبِّ الْعٰلَمِيْنَ 45؀
”फिर उन ज़ालिमों की जड़ काट दी गई और अल्लाह ही के लिए सब तारीफ़ है जो तमाम जहानों का पालने वाला है।” (तर्जुमा मआनिए क़ुरआन सूरह अलअनाम 6:45)

ऐसा हुक्‍मरान सुल्‍तान अब्‍दुल हमीद दोयम की ख़ुसूसीयात का हामिल होगा जिसने अल-क़ूदस की हिफ़ाज़त की और हर्टज़ल और इसके हवारियों को 1901 में फिलस्तीन की ज़मीन देने से इनकार कर दिया, हालाँकि वो इसके लिए हुकूमत के खज़ाने को एक बडी़ रक़म भी देने को तैय्यार थे। इसने कहा था, ”फिलस्तीन मेरी मिल्कियत नहीं, बल्कि ये उसकी मिल्कियत उन लोगों के पास है जिन्होंने इसके लिए अपना ख़ून दिया है। यहूदी अपने अरबों रुपये अपने पास रखें, मुझे अपने जिस्म से एक ख़ंजर को आर पार करना ज़्यादा आसान है बजाय इसके कि मैं फिलस्तीन को अपनी रियासत से अलग होता देखूं। ऐसा कभी नहीं होगा।”

इन यहूदियों के शिकंजे से अल-क़ूदस मुस्लिम अफ़्वाज ही आज़ाद करवाऐंगी जब वो उन पर वहां से हमला करेंगी जहां से ये कभी सोच भी नहीं सकते और उन पर एक ऐसा हमला करेंगी कि ये शैतान की सब सरगोशियां भूल जाऐंगे और मुस्लिम अफ़्वाज के लश्कर दोनों में से एक रहमत की तरफ़ दौड़ेंगे: फ़तह या शहादत, जैसा कि अल्लाह (سبحانه وتعالى) ने फ़रमाया कि :

فَاِمَّا تَثْقَفَنَّهُمْ فِي الْحَرْبِ فَشَرِّدْ بِهِمْ مَّنْ خَلْفَهُمْ لَعَلَّهُمْ يَذَّكَّرُوْنَ 75؀
”और अगर तुम उन पर जंग में ग़लबा पा लो तो उन्हें ऐसी सख़्त सज़ा दो कि उनके पिछले देखकर भाग जाएं, ताकि उन्हें इबरत हो।” (तर्जुमा मआनिए क़ुरआन, सूरह अलअनफ़ाल 8:57)

وَاقْتُلُوْھُمْ حَيْثُ ثَقِفْتُمُوْھُمْ وَاَخْرِجُوْھُمْ مِّنْ حَيْثُ اَخْرَجُوْكُمْ وَالْفِتْنَةُ اَشَدُّ مِنَ الْقَتْلِ ۚ وَلَا تُقٰتِلُوْھُمْ عِنْدَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ حَتّٰى يُقٰتِلُوْكُمْ فِيْهِ ۚ فَاِنْ قٰتَلُوْكُمْ فَاقْتُلُوْھُمْ ۭكَذٰلِكَ جَزَاۗءُ الْكٰفِرِيْنَ ١٩١؁
”और उन्हें निकाल दो जहां से उन्होंने तुम्हें निकाला है….” (तर्जुमा मआनिए क़ुरआन, सूरह अलबक़रा 2:191)

ऐ मुसलमानों! ये ऐसे होगा।

ऐ मुस्लिम अफ़्वाज के जवानो! इससे एतराज़ करने वालों के पास कोई चारा नहीं, और इस उज़्र (मज़बूरी) की कोई गुंजाइश नहीं, तो ऐसा ना कहो कि ये हुक्‍मरान तुम्हें रोक रहे हैं, बल्कि ताक़त तो तुम्हारे हाथों में है, दरअसल ये तुम हो जो उन्हें तहफ़्फ़ुज़ देते हो उनकी गर्दनों के फंदे तो तुम्हारे हाथों में हैं। अगर तुम उनकी इताअत करोगे तो तुम गुनाहगार और हद से गुज़रने वाले हो जाओगे और रसूलल्लाह (صلى الله عليه وسلم) के हौजे कौसर पर नहीं जा पाओगे। और अगर तुमने उनके जुर्म में उनकी मुआवनत ना की और उनके झूठ का एतबार ना किया तो रसूलल्लाह (صلى الله عليه وسلم) तुममें होंगे और तुम हौजे कौसर तक पहुंच जाओगे, और अच्छाई का सिला तो सिर्फ़ अच्छाई है। तिरमिज़ी में काब इब्‍ने अजरा से रिवायत है कि रसूलल्लाह (صلى الله عليه وسلم) ने फ़रमाया :

اعذک باللہ یا کعب بن عجرہ من امراء یکونون من بعدی فمن غشی ابوابھم فصدقھم فی کذ بھم و أعاءھم علی ظلمھم فلیس منی ولست منہ ولا یرد علی الحوض ومن غشی ابوابھم فلم یصدقھم فی کذبھم ولم یعنھم علی ظلمھم فھو منی و انا منہ و سیرد علی الحوض
”मैं तुम्हारे लिए बेवक़ूफ़ की हुक्मरानी की अल्लाह से पनाह मांगता हूँ। पूछा कि वो कौन होंगे तो रसूलल्लाह (صلى الله عليه وسلم) ने फ़रमाया, मेरे बाद ऐसे हुक्‍मरान आयेंगे जिनके झूठ पर यक़ीन किया जाएगा और उनके फ़रमांबर्दार उनके जब्र (ज़ुल्‍म) में उनकी मदद करेंगे। वो मुझसे नहीं और मैं इनमें से नहीं और वो कभी हौजे कौसर पर मेरे पास ना आ सकेंगे। लेकिन जिन्होंने उनकी फ़रमांबर्दारी ना की, और उनके झूठ पर यक़ीन ना किया और ना ही उनके जब्र में उनकी मदद की वो मुझ से हैं और मैं उन से हूँ और वो हौजे कौसर पर मुझसे मुलाक़ात करेंगे।”

ऐ मुस्लिम अफ़्वाज के जवानो! ख़िलाफ़त के क़याम में हिज़्ब अलतहरीर तुम्हारी मदद कर रही है तो तुम भी उसकी मदद करो और यहूदियों से जिहाद के लिए वो तुम्हें पुकार रही है तो उसकी पुकार पर उठ खड़े हो, यहूद से लड़ना तो मुक़र्रर है, अल्लाह (سبحانه وتعالى) क़ुरआन में फ़रमाते हैं :

فاذا جاء وعد الاخرۃ لیسو عوا وجوحکم ولید خلو ا المسجد کما دخلوہ اول مرۃ ولیثبروا ما علو تثبیرا عسی ربکم ان یر حمکم و ان عدتم عد تا وجعلنا جھنم للکافرین حصیرا

मुस्लिम में इब्‍ने अमर (رضي الله عنه) से रिवायत है कि रसूलल्लाह (صلى الله عليه وسلم) ने फ़रमाया :

لتُقا تِلُنَّ الٗیَھُودَ فَلَتَقٗتُلُنَّھُمٗ حَتَّی یَقُولَ الٗحَجَرُ یَا مُسٗلِمُ ھَذا یَھُودِیَّ فتَعَالَ فَاقٗتُلٗہُ
”और तुम ज़रूर यहूद से जिहाद करोगे हत्ता कि पत्थर कहेगा : ऐ मुसलमान, यहां एक यहूदी है आओ और उसे क़त्‍ल कर दो।”

क्या तुममें कोई अक्‍़लमंद आदमी है जो अपने जवानों के साथ उठे और अपने रास्ते में रुकावट बनने वाले सब हुक्‍मरानों को रूंधता हुआ इस्लाम के हुक्म को नाफ़िज़ करे, यानी रसूलल्लाह (صلى الله عليه وسلم) के तरीक़े पर ख़िलाफ़त, और यूं अल-अक़सा को आज़ाद करवाए और फिर उसे यहूदियों के नापाक हाथों से आज़ाद करवाने के बाद अपने पहले ख़ुत्बे में वो कहे जो क़ाज़ी मुहीउद्दीन ने कहा था :

فَقُطِعَ دَابِرُ الْقَوْمِ الَّذِيْنَ ظَلَمُوْا ۭوَالْحَـمْدُ لِلّٰهِ رَبِّ الْعٰلَمِيْنَ 45؀
”फिर उन ज़ालिमों की जड़ काट दी गई और अल्लाह ही के लिए सब तारीफ़ है जो तमाम जहानों का पालने वाला है।” (तर्जुमा मआनिए क़ुरआन सूरह अलअनआम 6:45)

अल्लाह (سبحانه وتعالى) इसका ज़िक्र अपने साथ वालों से करेंगे, और जन्नतों में इसके साथ अल्लाह के मलाइका होंगे और दुनिया में इसके साथ मोमिनीन होंगे, इससे इस दुनिया में भी मुहब्बत की जाएगी और आख़िरत में भी, और बेशक यही असल कामयाबी है।

يٰٓاَيُّھَا الَّذِيْنَ اٰمَنُوا اسْتَجِيْبُوْا لِلّٰهِ وَلِلرَّسُوْلِ اِذَا دَعَاكُمْ لِمَا يُحْيِيْكُمْ ۚ وَاعْلَمُوْٓا اَنَّ اللّٰهَ يَحُوْلُ بَيْنَ الْمَرْءِ وَقَلْبِهٖ وَاَنَّهٗٓ اِلَيْهِ تُحْشَرُوْنَ 24؀
”ऐ ईमान वालो! अल्लाह और उसके रसूल (صلى الله عليه وسلم) की आवाज़ पर लब्बैक कहो जिस वक़्त वो तुम्हें इस काम की तरफ़ बुलाऐं जिसमें तुम्हारे लिए ज़िंदगी है और जान लो कि अल्लाह आदमी और इसके दल के दरमियान आड़ बिन जाता है और बेशक उसी की तरफ़ तुम सब जमा किए जाओगे।” (तर्जुमा मआनिए क़ुरआन, समरह अलअनफ़ाल 8:24)
12 रबी एलिसानी, 1431 हि.

संयुक्त राष्ट्र संघ की करारदाद नम्बर 1860 मुस्लिम हुक्मरानों के मुंह पर एक तमाचा है

1860 मुस्लिम हुक्मरानों के मुंह पर एक तमाचा है. उन्होंने न सिर्फ़ यह की अपनी फौजों को गाज़ा के मुसलमानों की मदद के लिए नहीं भेजा बल्कि उन्हें संयुक्त राष्ट्र संघ की करारदाद के ज़रिये यहूदीयों के सुपुर्द कर दिया.

गाज़ा की पट्टी पर यहूदी रियासत के वहशियाना हमले के मुताल्लिक़ 9 जनवरी को संयुक्त राष्ट्र संघ की सिक्यूरिटी काउंसिल ने करारदाद नम्बर 1860 मंज़ूर की. इस करारदाद के मतन में इस तरह मक्कारी बरती गयी है जिस तरह 1967 के इस्राईली हमले के बाद करारदाद नम्बर 242 मैं इस्तेमाल की गयी थी. करारदाद के मतन में यहूदी फौजों की इन्खला (withdrawal) का ज़िक्र करते हुए “मखसूस सरज़मीन” (the land) की बजाये कोई भी ज़मीन (a land) का लफ्ज़ इस्तेमाल किया गया. ताकि यहूदियों के लिए उन इलाको पर कब्जा बरक़रार रखने की गुंजाईश मौजूद हो जिस पर उन्होंने कब्जा कर रखा है.

इसी तरह इस क़रारदाद में यहूदी फौजों की इन्खला (वापसी) की बजाये यह कहा गया है की ज़ंग बंदी की जाए जो की इन्खला का बाईस होगा. किस तरह और क्यों कर यह ज़ंग बंदी यहूदी फौजों की इन्खला (वापसी) की “वजह” बनेगी. इससे पहले कई वाज़ह करारादादें यहूदियों के हमलों को नहीं रोक सकी है तो फिर किस तरह यह मुबहम करारादादें यहूदियों के हमलों को रोकने का सबब बन सकती है ?!

अगरचे संयुक्त राष्ट्र संघ की सिक्यूरिटी काउंसिल की यह करारादादें काग़ज़ के टुकडों से ज़्यादा कुछ नहीं और करारदादों पर यहूदी रियासत अमल नहीं करती. यह करारादादें सयुंक्त राष्ट्र संघ की रद्दी की टोकरी को भरने का काम करती है और इन सब के बावजूद भी अमेरिका और उनके हवारियों ने सिक्यूरिटी काउंसिल की जानिब से इस करारदाद को मंज़ूर करने की मुखालिफत की बात की ताकि यहूदी रियासत को गाज़ा पर वहशियाना हमले में मुसलमानों का मज़ीद खून बहाने की मोहलत मिल जाए और यहूदी रियासत अपने मकसद को पुरा कर ले…..

मुस्लिम दुनिया के हुक्मरानों ने अमेरिका की इत्तेबा की और उन्होंने अमरीका के इस “मक़सद” को खुशदिली से कुबूल किया और इस पर रजामंदी का इज़हार किया. पस उन्होंने इस करारदाद पर आपस में इख्तालाफ किया और वोह इस करारदाद पर मुत्तफिक न हुए ताकि यहूदी रियासत को मज़ीद मोहलत मिल जाए.

जब यहूदी रियासत ने देखा की उसे शदीद मज़ाहमत का सामना है और उसने जान लिया की वोह अपने मकसद को अस्करी कार्यवाही से हासिल नहीं कर सकती है. और दूसरी तरफ़ उन्हें चुनाव (इलेक्शन) का सामना है यह मामला तूल पकडेगा और वोह चाहते हैं की इनके लिए “फतह” का माहौल हो ख्वाह यह “फतह” ज़ंग के ज़रिये हो या अमन के ज़रिये. इस सूरतेहाल में अमरीका सरगर्म हुआ ताकि इस मकसद को सिक्यूरिटी काउंसिल के ज़रिये हासिल किया जाए. चुनाचे कोंडोलीसा राइस मुख्तलिफ मुलाकातों और मीटिंगों में बुनियादी किरदार अदा कर रही थी. और उसने मुस्लिम दुनिया के बुत बने हुक्मरानों को हरकत में लाना शुरू किया. और वोह सिक्यूरिटी काउंसिल की ज़ियारत के लिए रवाना हो गए. और इस मुसलसल कोशिश में उन्होंने दिन-रात एक कर दिए. यह वोह हुक्मरान हैं जो गाज़ा में मुसलमानों की मदद के लिए अपनी फौजों को हरकत में लाने को इस तरह देखते हैं जैसे मौत को देख रहे हो. जबके सूरते हाल यह है की अगर इस वक्त इन हुक्मरानों की तरफ़ से ज़ंग का दहाना खोल दिया जाए तो यह अगर यहूदी रियासत को मुकम्मल तौर पर ख़त्म न कर सके तो उसे हिला तो सकते ही हैं. मुस्लिम दुनिया के हुक्मरान इस करारदाद के ज़ामिन है अगरचे यह करारदाद यहूदी रियासत को वोह कुछ अता कर रही है जो वोह हमलों के ज़रिये हांसिल नहीं कर सकते. वह यह है कि इस्राइल की फौजें गाज़ा में मौजूद हैं और गाज़ा पर असलहा और कुव्वत के ज़राए हांसिल करने पर पाबन्दी है बर्क़रार है. इस क़रारदाद मे गिज़ाई इम्दाद का ज़िक्र क़ुव्वत के ज़राए पर आयद इस पाबन्दी को तब्दील नही करेगा…!

इस करारदाद को क़ुव्वत देने के लिए अमरीका ने इस करारदाद के हक़ मे विटो न डाला. ताकि यह तास्सुर दिया जा सके कि गोया अमरीका इस क़रारदाद के पीछे नही है. और ताकि मुस्लिम दुनिया के हुक्मरान यह तास्सुर देने के क़ाबिल हो सके के वोह अमरीका कि मदद के बिना भी एक बडी क़ामयाबी हासिल करने मै क़ामयाब हो गये है.

लेकिन वोह दरोगगोई कर रहे है. और कोई भी ऐसा शख्स जो अक्ल रखता है इस बात को समझ सकता है कि अगर अमरीका का इस करारदाद के लिये सहियोग नही होता तो वोह इस क़रारदाद को पास ही नही होने देता.

ऐ मुसलमानो ! बेशक नबी-ए-सदिक़ (स्वललल्लाहो अलैहि वसल्लम) ने फ़रमायाः “अगर तुम्हे कोई शर्म नही तो जो चाहे करो”, और बेशक ऐसा ही है. यह हुक्मरान ‘गाज़ातु हाशिम’, के जिसका नाम रसूलुल्लाह (स्वललल्लाहो अलैहि वसल्लम) के दादा के नाम पर रखा गया था, मे मसूम मुसलमानो का खून बहते हुए देख रहे है. और फिर भी अपनी फ़ौज को हरकत मै नही लाते. और ना हि उनके खिलाफ़ अपनी मिज़ाईल इस्तेमाल करते है. और न ही बमबार हवाई जहाज़ो को हरकत मै लाते है. बल्कि इससे बढकर यह कि जो रज़ाकार गाज़ा के मुसलमानो कि मदद के लिये जाना चाहते है उन्हे ऐसा करने से रोकते है…. ! जब के दूसरी तरफ़ वोह क़रारदाद जो गाज़ा के लोगो को असलहा हांसिल करने और क़ुव्वत के ज़राऐ हांसिल करने से रोकती है और गाज़ा पर यहूदी फ़ौज के मौजूद रहने कि बात करती है, उसे मन्ज़ूर करने के लिऐ यह लपकते है. और एक दूसरे पर सबक़त ले जाने कि कोशिश करते है. अल्लाह इन्हे हलाक़ करे, उसके सबब जो यह कर रहे है.

अगर हम यहूदी वजूद पर नज़र डाले के जिस ने फिलिस्तीन कि सरज़मीन को गसब कर रखा है और इन हुक्मरानो कि रियासते जो इस यहूदी वजूद के इर्द गिर्द मौजूद है, इस यहूदी रियासत कि बक़ा इन हुक्मरानो की मरहूने मिन्नत है. और यहूदी रियासत अपनी हिफ़ाज़त तो कर हि रही है लेकिन इसके साथ-साथ यह् हुक्मरान भी इस यहूदी वजूद कि हिफ़ाज़त का काम अनजाम दे रहे हैं. अगर इन हुक्मरानो के दर्मियान एक भी मर्द मौजूद होता तो अमरीका और मगरीबी रियासतें भी यहूदी रियासत कि दिफ़ाअ के क़ाबिल नहीं होती.

हम कई बार यह कह चुके हैं और एक मरतबा फिर दोहराते हैं कि जो कोई भी इस यहूदी रियासत के खात्मे का मुतमन्नी है और तमाम तर फिलिस्तीन को दारुल इस्लाम बनाना चाहता है तो उसके लिऐ ज़रूरी है कि वोह ऐसे मुख्लिस हुक्मरान के तक़र्रुर और मुख्लिस रियासत यानी खिलाफ़ते राशिदा के लिऐ काम करे क्योंकि रसूलुल्लाह (स्वललल्लाहो अलैहि वसल्लम) ने इरशाद फ़रमायाः बेशक़, खलीफ़ा ऐसे है जैसे ढाल जिसके पीछे रह कर लडा जाता है और हिफ़ाज़त हासिल कि जाती है (मुस्लिम). तब ही यहूदी रियासत का वजूद खत्म हो सकेगा और दिगर क़ाफ़िर इस्तेमारी रियासतों का वजूद भी जो कि यहूदी रियासत से ज्यादा मज़बूत और असरो-रसूख कि हामिल हैं और जल्दी ही तमाम ज़लील और रुसवा हो जाऐंगी.

إِنَّ فِي ذٲلِكَ لَذِكْرَى لِمَنْ كَانَ لَهُ قَلْبٌ أَوْ أَلْقَى السَّمْعَ وَهُوَ شَهِيدٌ

“उस मै हर साहिबे दिल के लिये इबरत है और उसके लिये जो दिल से मुतवज्जेह हो कर कान लगाऐ और वोह हाज़िर हो”. (क़ाफ़ः 37)

इस्राइल एक नाजायज़ देश

लेखक : अशोक दूबे

प्राचीन काल से ही यहूदियों के ऊपर जिस तरह के और जितने अत्याचार हुए हैं उनको जानकर मेरी हमदर्दी आप ही उनके साथ चली जाती है। एक ऐसे लोग जो हमेशा भटकते रहे, और जगह-जगह से भगाए जाते रहे, तार्किक रूप से वे निश्चित ही एक देश के अधिकारी हैं जो उनका अपना हो, जहाँ पर कोई उन्हे ये न कह सके कि निकलो अब हमें तुम्हारे चेहरों से नफ़रत है। मगर वो देश, क्या किसी अन्य लोगों को अपदस्थ कर के बनाया जाना नीति-सम्मत है? और उनकी दारुण स्थिति क्या उन्हे अन्य जनों पर अत्याचार करने का अधिकार दे देती है..? और फिर यहूदियो पर किए गए ऐतिहासिक अपराधों का दण्ड फ़िलीस्तीन के लोगों को दिया जाना कैसे उचित कहा जा सकता है?

नकबा

संयुक्त राष्ट्र में नवम्बर १९४७ में फ़िलीस्तीन के बँटवारे में दुनिया भर के देशों की रायशुमारी हुई बस उन से नहीं पूछा गया जिनके ऊपर ये गाज गिरने वाली थी। उस समय फ़िलीस्तीन में यहूदियों की संख्या ६ लाख और अरबों की संख्या १३ लाख बताई जाती है। यहूदियों के हिस्से में जितनी ज़मीन आई उस से वो क़तई मुतमईन नहीं थे, उन्हे पूरा फ़िलीस्तीन चाहिये था, जेरूसलेम समेत।

इसीलिए इज़राईल के बनने की घोषणा के साथ ही उन्होने फ़िलीस्तीनी अरबों को खदेड़ देने के लिए उनके गाँव के गाँव का जनसंहार शुरु कर दिया। हगनह और दूसरे हथियारबन्द दस्ते अरबों के गाँवों में जाते और लोगों को अंधाधुंध मारना शुरु कर देते। पहले इज़राईल का कहना था कि अरब आप ही अपने घरों को छोड़कर भाग खड़े हुए ताकि अरब देशों के संयुक्त आक्रमण के लिए रास्ता साफ़ किया जा सके। ये सरासर झूठ था।

खुद इज़राईल मानता है कि डेरा यासीन नाम के गाँव में यहूदी दस्तों ने बमों और गोलियों की वर्षा कर के ११० लोगों की जान ले ली। इन निहत्थे और बेगुनाह लोगों में औरतें और बच्चे भी शामिल थे। और ये घटना कोई अपवाद नहीं थी। क्योंकि अब तो खुद इज़राईल के इतिहासकार मानने लगे हैं कि १९४७ से १९४९ के बीच इज़राईली सेनाओं ने ४०० से ५०० अरब गाँवों, क़स्बों और कबीलों पर हमला कर के उन्हे अरबों से खाली करा लिया। ये जातीय हिंसा अपने परिमाण में हिटलर द्वारा की गई यहूदियों की हत्याओं से संख्या में ज़रूर कम थी पर चरित्र में नहीं।

इज़राईली जिस घटनाक्रम को इज़राईल की स्थापना के नाम से दर्ज करते हैं उसे फ़िलीस्तीनियों ने नकबा कह कर पुकारा- एक महाविपत्ति जो इज़राईल के हाथों उन पर आ पड़ी। वैसे अरबी भाषा में इज़राईल का मायने मृत्यु का देवता यमराज होता है। और यह अर्थ आज का बना नहीं, पुराना है।

अरब राष्ट्र

१४ मई को इज़राईल के बनने के अगले दिन ही पाँच अरब देशों- मिस्र, जोर्डन, सीरिया, लेबनान और इराक़- ने मिलकर इज़राईल पर हमला कर दिया। इज़राईल ने अपनी तैयारियाँ की थीं मगर इतनी नहीं थी कि वो अकेले पाँच देशों की सेनाओं का मुक़ाबला कर सके। लेकिन उसकी सहायता की रूस ने अपने सहयोगी चेकोस्लोवाकिया के माध्यम से। उल्लेखनीय है कि रूस में भी यहूदियों के प्रति नफ़रत का एक लम्बा इतिहास रहा है और इज़राईल को विस्थापन करने वालों में सबसे बड़ी संख्या जर्मनी के अलावा पूर्वी योरोप और रूस से ही थी।

बेहतर और विकसित हथियारों की इस अप्रत्याशित मदद से अचानक सैन्य संतुलन इज़राईल के पक्ष में हो गया और अरब सेनाएं अपना मक़सद पूरा नहीं कर सकीं। बीच-बचाव कर के युद्ध विराम करा लिया गया। मगर तब तक वेस्ट बैंक (जोर्डन नदी के पश्चिमी किनारे का वो फ़िलीस्तीनी हिस्सा जहाँ बँटवारे के बाद का अरब राज्य क़ायम होना था) पर जोर्डन का और गाज़ा पट्टी पर मिस्र का क़ब्ज़ा हो गया था।

इस क़ब्ज़े के १९ साल तक गाज़ा और वेस्ट बैंक के भू-भाग पर फ़िलीस्तीनी राज्य बनाने की कोई कोशिश नहीं की गई। फ़िलीस्तीनी लगातार मिस्र और जोर्डन के शासन में शरणार्थियों की तरह रहते रहे। क्योंकि सच यही है कि फ़िलीस्तीन एक अलग राज्य के रूप में अरबों के बीच कभी अस्तित्व में नहीं रहा, वो हमेशा एक अरब राष्ट्र के अंग के रूप में या फिर ऑटोमन साम्राज्य के अंग के रूप में रहा। और वे पाँचों अरब देश इज़राईल के खिलाफ़ इसलिए नहीं थे क्योंकि उसने फ़िलीस्तीन, एक स्वतंत्र राष्ट्र की अवहेलना की थी। नहीं। बल्कि इसलिए कि उसने एक अरब राष्ट्र की अवहेलना की थी जो अलग-अलग देशों में बँटा हुआ था। देश एक भौगोलिक सत्ता है जबकि राष्ट्र एक मानसिक संरचना।

आधुनिक राष्ट्र निर्माण अरबों में प्राकृतिक रूप से नहीं आ गया जैसे हम भारतीय भी मुग़ल सत्ता के क्षीण होते ही अपने एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्माण में संलग्न नहीं हो गए। ये चेतना तो हमारे भीतर पैदा हुई अंग्रेज़ों के साथ संघर्ष करते हुए। इसी तरह अरबों के जो देश आज दुनिया के नक़्शे पर है वो अलग-अलग देश ज़रूर हैं उनकी सरकारे अपने राजनैतिक सत्ता और उसके हित के अनुसार अलग-अलग निर्णय लेकर एक दूसरे के खिलाफ़ भी खड़ी दिखाई पड़तीं हैं। मगर राष्ट्र के बतौर अरब जन शायद अभी भी एक हैं। इसीलिए वो किसी भी मसले पर एक स्वर में अपनी राय व्यक्त करते हैं।

सम्भवतः हमारे अपने प्रदेश बिहार, बंगाल, तमिलनाडु, गुजरात, केरल, राजस्थान, पंजाब, मणिपुर आदि भाषा, संस्कृति के स्तर पर एक दूसरे से अधिक जुदा है बनिस्बत इन अरब देशों के। वे अलग हैं क्योंकि नक़्शे पर लकीर खींच के उन्हे अलग-अलग कर दिया गया। शायद फ़िलीस्तीन की सरकार ही सबसे लोकतांत्रिक सरकार है जिसे इज़राईल और उसके तमाम दोस्त देश बरसों तक आतंकवादी कह कर दुरदुराते रहे।

फ़िदायीन हमले

१९४७-४९ के नकबे में न जाने कितने लोग मारे गए और तक़रीबन आठ लाख अरब अपने घरों और ज़मीनों से बेघर हो गए। बेघर हुए फ़िलीस्तीनियों में से कुछ ऐसे भी थे जिन्होने वापस लौटकर इज़राईल के शासन में ही सही, अपनी ज़मीन को पाने की कोशिश की। मगर इज़राईल ने तुरत-फ़ुरत क़ानून पारित कर दिया था कि भागे हुए फ़िलीस्तीनियों को वापस लौटने नहीं दिया जाएगा और ऐसी कोशिश करने वालों को घुसपैठी माना जाएगा।

दूसरी तरफ़ दूसरे बाक़ी दुनिया और अरब देशों से यहूदी भाग-भाग कर इज़राईल में चले आए। और इज़राईली सरकार ने उन्हे भगाए गए फ़िलीस्तीनियों की ज़मीनों पर बसाना शुरु कर दिया। ये क़दम अपने घरों को लौटने की फ़िलीस्तीनियों की आशाओं पर कुठाराघात था। लेकिन ये क़ानून बनाने भर से फ़िलीस्तीनी रुक नहीं गए, जो अपनी ज़मीन पाने के लिए थोड़ा संघर्ष करने को भी राजी थे। सीरिया, मिस्र और जोर्डन की सीमाओं से ये फ़िलीस्तीनी नागरिक इज़राईल की सीमा में प्रवेश कर के अपने घरों को लौटने की कोशिश में इज़राईलियों के साथ जिद्दोजहद में उतरने लगे। और वे मरने-मारने को तैयार थे।

इज़राईल का कहना है कि १९५० से १९५६ के बीच ऐसे फ़िदायीन हमलों में ४०० इज़राइलियों की मौत हुई। ये फ़िदायीन तो मारे ही जाते और जवाब में इज़राईली सेना सीरिया, मिस्र और जोर्डन में उनके ठिकानों पर हमले करती जिससे और भी अधिक ग़ुस्से के बीज पड़ते और नफ़रतें और गहरी होतीं। १९५६ में गाज़ा पट्टी में खान युनूस नाम की एक जगह में घुसकर इज़राईली सेना नें २७५ फ़िलीस्तीनियों की हत्या की और राफ़ह नाम के एक शरणार्थी कैम्प पर हमला कर के १११ की।

ये है वो बुनियाद जिसके आधार पर आज तक इज़राईल अपने घर, अपनी ज़मीन, अपने देश को वापस लेने के लिए हक़ की लड़ाई लड़ रहे फ़िलीस्तीनियों को आतंकवादी कहता आया। मज़े की बात ये है कि इज़राईल एक क़ानूनी मगर नाजायज़ देश होते हुए भी ग़ैर-फ़ौजियों की हत्या करते रहने के बावजूद आतंकवादी नहीं कहलाता। क्यों? क्योंकि उसकी तरफ़ से हत्याएं सेना की वर्दी पहनने वाले लोग करते हैं? क्या एक वर्दी पहनने भर से बेगुनाहों के खिलाफ़ हिंसा जायज़ हो जाती है?

छै दिन की लड़ाई

अरब देशों और इज़राईल के बीच अगला बड़ा संकट तब खड़ा हो गया जब १९५६ में मिस्र के राष्ट्रपति नासिर ने स्वेज़ नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इसके पहले इस पर ब्रिटेन और फ़्रांस का अधिकार होता था। इस से इन दोनों देशों को भारी राजनैतिक, सामरिक और आर्थिक धक्का पहुँचा जिसका खामियाज़ा पूरा करने के लिए वे मिस्र पर आक्रमण करने तक की सोचने लगे। मगर फिर स्वयं हमला न कर के ये ज़िम्मेदारी इज़राईल के कंधो पर डाल दी गई जो मिस्र से पहले ही चोट खाया हुआ था क्योंकि उसने स्वेज़ तो इज़राईल के लिए बंद ही की हुई थी साथ-साथ १९५१ से ही तिरान जलडमरू मध्य से लाल सागर की ओर निकलने वाले उसके जहाजों का आना-जाना बंद कर रखा था। इज़राईल ने मिस्र पर आक्रमण किया ज़रूर मगर उसे पीछे हटना पड़ा क्योंकि सऊदी अरब ने ब्रिटेन को तेल की आपूर्ति बंद कर दी और अमरीका, रूस आदि ने भी दबाव डाला।

१९६७ में अरब देशों को फिर यह अन्देशा हुआ कि इज़राईल उन पर आक्रमण करने वाला है और उन्होने इस से बचाव की तैयारी शुरु कर दी। मगर दूसरी तरफ़ इज़राईल ने उनकी सारी तैयारियों को धता बताते हुए उन पर प्रि-एम्प्टिव स्ट्राइक्स कर डाली। मिस्र के वायु-यान हैंगर में खड़े-खड़े तबाह हो गए। जोर्डन की सेनाओं को खदेड़ दिया गया और सीरिया को पीछे धकेल दिया गया।
कुल छै दिन चली इस लड़ाई के बाद इज़राईल ने संयुक्त राष्ट्र के बँटवारे के आधार पर बने अरबों के हिस्से वाले पूरे फ़िलीस्तीन को निगल लिया और अपने हर पड़ोसी की ज़मीन भी दबा ली। बस एक लेबनान को छोड़कर जिसकी सीमा को वो बाद में कई बार दबाता रहेगा। स्वेज़ नहर के किनारे तक मिस्र का सिनाई का रेगिस्तान, जोर्डन से वेस्ट बैंक और सीरिया से गोलन हाईट्स छीनने के परिणाम स्वरूप एक बार फिर फ़िलीस्तीनी शरणार्थियों का सैलाब उमड़ पड़ा, जो जान बचा कर वेस्ट बैंक और गाज़ा पट्टी से दूसरे अरब देशों में घुस गए।

इस तरह की मध्ययुगीन आक्रमणकारी नीति चलाने की चौतरफ़ा निन्दा हुई और इज़राईल पर सब तरफ़ से दबाव पड़ा कि वो पड़ोसी देशों की ज़मीन वापस करे। इज़राईल सिर्फ़ एक शर्त पर ये ज़मीन वापस करने को राजी था- पड़ोसी देश उसे एक वैध देश के रूप में मान्यता दे दें और उसके अस्तित्व को स्वीकार कर लें। ये एक बात ज़ाहिर कर देती है कि इज़राईल खुद ये बात जानता है कि वो एक अवैध देश है और उसने दूसरों की ज़मीन पर अवैध क़ब्ज़ा कर के अपना देश बनाया है तभी उसके लिए वैधता का ये प्रमाण-पत्र इतना ज़रूरी हो जाता है।

इज़राईल को आगे घुटने टेककर उसे मान्यता देने में पहल मिस्र की तरफ़ से हुई। बदले में इज़राईल ने उसे सिनाई का क्षेत्र लौटा दिया। इस समझौते के ईनाम के तौर पर मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात को नोबल शांति पुरुस्कार दिया गया जिसे उन्ह्ने इज़राईल के राष्ट्रपति के साथ साझा। लेकिन अरब जनता इस समझौते से खुश नहीं थी। इस समझौते के दो साल बाद ही सादात की हत्या कर दी गई।

यदि विश्व एक मोहल्ला होता तो ये मामला कैसा दिखता ज़रा ग़ौर करें

आप के पूरे मोहल्ले के बेचारे, बेघर, और मज़्लूम लोग एक घर पाने के लिए बेताब हैं। आप को कोई ऐतराज़ भी नहीं मगर वे कहते हैं कि आप के घर में अपना घर बनाएंगे और मोहल्ले वाले कहते हैं कि हाँ-हाँ ठीक तो है.. क्या उन्हे एक छत का हक़ भी नहीं है। विचार नेक है और आप को भी हमदर्दी है उन बेघर मज़्लूमों से। मगर आप के घर में.. ये सोच कर ही आप के होश फ़ाख्ता हो जाते हैं।

फिर ये बेघर लोग आकर डेरा डाल देते हैं और एक अभियान के तहत। और फिर और भी जितने मज़्लूम हैं उन सब को आप ही के घर में आ कर बसने की दावत दे डालते हैं और जब आप विरोध करते हैं तो आप से लड़ते हैं, और आप के घर वालों की हत्याएं करते हैं। मोहल्ले के दबंग लोग उनका साथ देते हैं। फिर मोहल्ले वाले एक पंचायत कर के आप के घर के दो हिस्से कर देते हैं, जिस में सब लोग वोट डालते हैं सिवा आप के।

इसी बीच आप जो अब सड़क पर आ चुके हैं घर में घुसने की कोशिश में थोड़ा हाथ पैर चलाते हैं, उनके घर के सदस्यों को मारते हैं तो वो घर में घुसे मज़्लूम लोग, आप को आतंकवादी घोषित कर देते हैं और मोहल्ले के दबंग लोग उनका साथ देते हैं। उस के बाद जब भी इस घर के स्वामित्व की बात उठती है तो वो आतंकवादियों से बात न करने की नीति दोहरा देते हैं। कहते हैं कि तभी बात करेंगे जब आतंकवाद छोड़ दोगे यानी अपने घर में वापस घुसने की कोशिश। और ये मान लोगे कि घर के स्वामी वे ही मज़्लूम लोग हैं। इन शर्तों को मान लिया तो फिर आप बचेंगे कहाँ?

ग़नीमत ये है कि आपके पड़ोसी अच्छे हैं और आप का साथ देते हैं। मगर जब आप के पड़ोसी आप की मदद के लिए आते हैं तो वे मज़्लूम न सिर्फ़ उन्हे खदेड़ बाहर करते हैं बल्कि उनके घरों की भी ज़मीन दबा लेते हैं। हार कर पडो़सी अपनी-अपनी ज़मीन वापसी की कोशिश में मशग़ूल हो जाते हैं। मज़्लूम लोग उनसे कहते हैं कि पहले तुम साइन कर के हमें इस घर का असली मालिक स्वीकार कर लो तो हम तुम्हारी ज़मीन वापस कर देंगे।
पड़ोसी को डर है कि आप का घर वापस दिलाने के चक्कर में कहीं वो भी आप की तरह सड़क पर आ गया तो? तो अब पड़ोसी अपनी ज़मीन की सोचे कि आप के घर की? बताइये! और ये भी बताइये कि आप के घर में घुस के बैठे उन मज़्लूमों को अब मज़्लूम कहना कितना उचित है?

साभार

http://hamaardharti.blogspot.in/2009/01/blog-post_4306.html

प्रस्तुतकर्ता ashok dubey

मुस्लिम हुक्मरानो का इज़राईल के लिये समर्थन

‘‘अगर मै कोई अरब नेता होता तो मैं कभी भी इज़राईल के साथ समझौते पर दस्तखत नही करता। यह बिल्कुल सिधी बात है, हमने उनका मुल्क लिया (छीना) है। यह सच है कि खुदा ने इसका हम से वादा किया है लेकिन इससे उन्हे क्या दिलचस्पी? हमारा खुदा उनका खुदा नही है। ऐन्टी-सिमेटिज़्म, नाज़ीवाद और ओस्चविज मौजूद रहा है, लेकिन इसमें उनकी क्या गलती, उन्हे सिर्फ एक ही चीज दिखाई देती है और वोह यह की हमने उनका मुल्क छीन लिया है। वोह इसे क्यो कबूल करेगे ?’’ डेविड बेन गरियन पहला इज़राईली प्रधानमंत्री [Quoted by Nahum Goldmann in Le Paraddoxe Juif (The Jewish Paradox), p.121]

1948 में बेन गरियन के जरिये दिये गया यह बयान मुस्लिम हुक्मरानो के, एक सेहूनी (Zionists) की निगाह में, मौकफ को बहुत कुछ खोल कर रख देता है। इज़राईल के पहले प्रधानमंत्री बेन गुरियन (Ben Gurion) ने मुस्लिम हुक्मरानो के जरिये इज़राईली रियासत के साथ दस्तखत किये गये मुआहिद को अपनी आवाम के साथ धोके से ताबीर किया है। हालाकि आज मुस्लिम हुक्मरानो ने सिर्फ इस गद्दारी पर ही ईक्तिफा नही किया बल्कि वोह लम्ब समय से इस नाजायज़ वजूद और मुस्लिम मुमालिक के बीच रिश्तो को ठीक करने में लगे हुए है और वोह इज़राईल की रियासत के खिलाफ किसी भी किस्म के विरोध की मुखालिफत करते है। यही वजह है कि बेन गुरियन ने मुस्लिम हुक्मरानो को इज़राईल के केम्प का हिस्सा करार दिया जब उसने कहा कि अरब हुकूमते इज़राईल के बचाव की पहली लकीर (रूकावट) है। उसने मज़ीद कहा ‘‘मुस्लिम हुकूमते मसनूई (बनावटी/नकली) है और हमारे लिये उनकी जड़े खोखली करना आसान है”। [David Ben-Gurion, May 1948, to the General Staff. From Ben-Gurion, A Biography, by Michael Ben-Zohar, Delacorte, New York 1978.]

यहाँ मसनूई (artificial) का मतलब यह है कि यें मुस्लिम हुक्मरान मुस्लिम उम्मत पर ग़ैर-फितरी तरीकें से थोपे गये है जब 1924 में उस्मानी खिलाफत खत्म हुई। कई सालो से जारी ग़ैर-मुस्लिम देशों की मुस्लिम उम्मत के खिलाफ जारहियत और ज़ुल्म का जवाब देने के मामले में इन मुस्लिम हुक्मरानो की नाकामयाबी ने इनकी गद्दारी को ज़ाहिर कर दिया है।

अभी हाल ही (नवम्बर 2012) मे यहूदी रियासत इज़राईल ने एक बार फिर मासूम और निहत्ते फिलिस्तीनी मुस्लमानो पर बमबारी शुरू कर दी. ग़ाज़ा पर किये गये हमलों की तादाद अब तक 90 से ज़्यादा हो चुकी है. हालिया हमले मे 50 से ज़्यादा लोग शहीद और 300 लोग ज़ख्मी हो गये जिन्मे 140 लोग औरते और बच्चे हैं. यहूदी रियासत बिना किसी खौफ के ऐसे दिल दहलाने वाले ज़ुल्म करती रहती है और मुस्लिम देशों के हुक्मरान ज़बानी तरदीद करके रस्म अदा कर देते है. सन 2009 मे होने वाली हिज़्बुल्ला और इज़राईल के बीच जंग में भी इनकी बहुत बड़ी फरेबकारी सामने आई थी जब मुस्लिम हुक्मरानो ने हिज़्बुल्लाह को इस जंग को छेड़ने के लिये जिम्मेदार ठहराया। दरहक़ीक़त इस जंग की शुरूआत इज़राईल ने की थी, जिसका मकसद हिज़्बुल्लाह को निहत्ता करना था, जो कि अब तक सामने आने वाली अकेली मीलीटी फोर्स है जो इस इलाके में इज़राईली जरहियत को रोक कर रही थी और लोगो को बचा रही थी। मग़रिबी मीडिया ने हमेशा भेदभाव से काम लिया है और हमेशा हिज़्बुल्लाह पर जंग को छेडने का इल्ज़ाम लगाया. हालांकि अगर हम सन 2000 से लेबनान से इज़राईली सैनिकों की वापसी के बाद शुरू होने वाले झगडों के मामले पर संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट देखें तो रिपोर्ट मे साफ तौर से इज़राईल के ज़रिये की गई खिलाफर्ज़ीयो का ज़िक्र है [देखें : Secretary-General report to the Security Council in 2001/2002/2004]. सिक्यूरिटी काउन्सेल के सेक्रेटरी जनरल के सन 2004 के बयान के मुताबिक वोह इज़राईल ही था, जिसने जंग को उकसाया था और हिज़्बुल्लाह सिर्फ उसकी जवाबी कार्यवाही कर रहा था।

जहाँ तक इज़राईल के सैनिको की ‘किडनेपिंग’ का मामला है ‘ईन्टरनेशनल कमीटी ऑफ रेडक्रोस (ICRC) 2006 की इज़राईल पर रिपोर्ट बयान करती है: “सन 2005 के आखिर में इज़राईल के पूछताछ यूनिट आरज़ी जेलें, सैनिक जेल, आम जेल और पुलिस स्टेशनो ने तकरीबन 11200 फिलिस्तिनियो को कैद किया गया। (ICRC के ज़रिये) 12,192 कैदियो को दौरा किया गया, जिनमें 7504 पर व्यक्तिगत तौर पर निगाह रखी गई, जिनमें 131 औरते और 565 बच्चे शामिल हैं.”

यह दस्तावेज बयान करता है की ऐसे कई मुस्लिम लोग थे जो गुम हो गये थे और रिपोर्ट में शामिल नही किये गये। ज्यादातर कैदियों को फिलिस्तीन और लेबनान की गलियो से या तो अगुआ किया गया या उठा लिया गया। गौर करने की बात यह भी है कि इसमें 565 बच्चे भी थे। इसलिये जब इज़राईल ने यह दावा किया कि लेबनान के साथ इस जंग में उसे भड़काने के पीछे हिज़्बुल्लाह के जरिये तीन इज़राईल सैनिको की अगवा करना है। इसमे हक़ीक़त को पूरी तरह से तोड़ा मरोड़ा गया । हक़ीक़त का मुशाहिदा करने से यह बात साफ हो जाती है कि इज़राईल ने ही इस जंग को भड़काया था।

मश्रिके वुस्ता के देशों मे उपर ज़िक्र की गई हक़ीक़त जानी पहचानी है। खास तौर से मुस्लिम हुक्मरान इससे अच्छी तरफ वाक़िफ है की इस जंग का मुहर्रिक कौन था. फिर भी उन्हौने इस जंग को छेड़ने के लिये हिज़्बुल्लाह को जिम्मेदार ठहराया, जिससे उनकी नीयत का पता चलता है कि ऐसे हालात में उनकी तरफ से कोई इक़दाम नही किया जाये। बल्कि उन्होने मुस्लिम उम्मत को बांटने की कोशिश की यह कह कर कि यह मुद्दा मसलकी झगड़े ;यानी सुन्नी और शिया से जुड़ा हुआ है और लोगो की तबज्जोह इस तरफ मबज़ूल की के हिज़्बुल्लाह एक शिया तन्ज़ीम है और इसको ईरान से मदद मिल रही है। इन मुस्लिम हुक्मरानो की बेहिसी और ईकदाम (कार्यवाही) नही करने की खास वजह यह है कि वोह इस उम्मत के मफाद के लिये काम नही कर रहे है बल्कि अपने इस्तेमारी (साम्राज्यवादी) आका यानी अमरीका और बरतानिया के लिये काम रहे है।

कुवैत यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अब्दुल्लाह मोहम्मद के मुताबिक हिज़्बुल्लाह को दोशी बनाने की वजह अमरीका को इन (मुस्लिम) देशो की तरफ से यह संदेश देना है कि वोह इस इलाके में इस्तेहकाम (stability) का जारिया है और अमरीकी मफाद के लिये वोह लगातार काम करते रहेगें।

मिस्र के साबिका सदर हुस्ने मुबारक का बयान इस इलाके के मुस्लिम हुक्मरानो के मोकफ को ज़ाहिर करता है ‘‘जो लोग मिस्र को जंग मे लेबनान और हिज़्बुल्लाह की मदद के लिये भेजना चाहते है वोह इस बात से आगाह नही है कि ज़ाहिरी जोखिम भरे काम करने का दौर खत्म हो चुका है।’’

‘‘जो हमसे जंग करने के लिये कह रहे है वोह हमारे पास जो कुछ भी है उसे पलक झपकते ही सब खोने पर मजबूर कर देगें।’’

‘‘मिस्र की फौज सिर्फ मिस्र की हिफाज़त के लिये है और यह बदलने वाला नही है।’’ (प्रेस ट्रस्ट आफॅ ईण्डिया, 26 जुलाई 2006)

इन हुक्मरानो ने कभी अरब एकता को बढ़ाने की बात की थी और दावा किया था आरगनाजेशन आफॅ इस्लामिक कॉन्फ्रेन्स (OIC) के ज़रिये इत्तेहाद को बढ़ावा देंगे। मुबारक का यह बयान हमे मुशर्रफ का वोह बयान याद दिलाता है जब अमरीका ने सन 2002 में अफगानिस्तान पर कब्जा किया, उसने कहा ‘‘पाकिस्तान सबसे पहले है।’’

हमे यह सोच कर भी बेवकूफ नही बनाना चाहिए कि यह अपने क़ौमी मुल्क को भी कभी बचा सकेंगे, जैसा कि हम ईराक़ के बारे में जानते है। सद्दाम हुसैन ने फौजो को अमरीकी फौजो से अपनी कौम को बचाने का हुक्म नही दिया, बल्कि अमरीका के खिलाफ लड़ने वाले तो आम आदमी और इन्फिरादी सैनिक थे।

दरहक़ीक़त उरदुन के बादशाह, सउदी अरब के किंग अब्दुल्लाह और हुस्ने मुबारक ने हिज़्बुल्लाह की तनक़ीद करके इज़राईल की तरफ से हमला करने को सही करार दिया था और इज़राईल ने इसे लेबनान पर कब्जा करने के लिये हरा सिंग्नल समझा था। मुस्लिम हुक्मरानो ने इज़राईल के खिलाफ इक़दाम नही करने के लिये कई कारण बताये। उसमें से खास वजह है इज़राईल की आलातरीन फौज और यह की इज़राईल का मुकाबिला करने से उनकी कौमी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुचेगा। हम इस बात का जायजा लेते है कि इन हुक्मरानो के पास दरहक़ीक़त कौन से विकल्प मौजूद है:

1. फौज – जिस के ज़रिये यह इज़राईल से सिधा मुकाबला कर सकते हैं.

2. यह मुस्लिम देश इज़राईल को आर्थिक और सामाजिक तौर पर अलग-थलक कर देने की ताक़त रखते है ।

फौज के पासमन्जर से

नीचे दिये गये आंकड़े बताते है कि मुसलमानो की सारी फौज मिलाकर एक इज़राईली फौजी के मुकाबले में 68 मुस्लिम फौजी आते है। मुस्लिम देश इज़राईल के जंगी बजट से 17 गुना रक़म जंगी बजट पर ज़्यादा खर्च करते है। तो यह बात बिल्कुल साफ है कि मुत्तहिदा मुस्लिम फौज इस ईलाके की सबसे ग़ालिब फौज है। अपनी बहुत जदीद टेक्नोलोजी के बावजूद भी इज़राईल इतनी बड़ी मीलिट्री फोर्स पर कभी हावी नही हो सकती।

जनसंख्या    फौजी क़ुव्वत       फौज की अफरादी क़ुव्वत को खिदमत देने के लिये फौरी तौर पर तय्यार है                          फौजी इखराजाता
इज़राईल       

7,112,359  3,353,936  2,836,722   11.8187

मिस्र   

 81,713,520   41,654,185    35,558,995    13.7836

इरान 

65,875,224     39,815,026    34,344,352       19.0725

जोरडन (उरदुन) 

  6,198,677 3,371,706 2,886,132 2.4467

सीरिया (शाम)

19,747,586 10,218,242 10,218,242 5.33183

सऊदी

28,146,656 14,928,539 8,461,049 54.6

तुर्की

71,892,808 39,645,893 33,444,999 45.2567

यमन

23,013,376 9,932,593 3,585,947 3.71184

लीबिया

6,173,579 3,293,184 2,821,855 2.91408

लेबनान

3,971,941 2,229,474 1,883,155 1.25364

क़ुव्वेत

2,596,799 1,601,065 1,393,356 7.42

ओमान

3,311,640 1,429,296 1,207,291 6.94146

मोरक्को

34,343,220 18,233,410 15,382,861 6.25

अलजीरिया (अलजज़ायर)

33,769,668 19,327,735 16,357,759 7.3359

ट्यूनीसिया

10,383,577 5,905,068 5,005,257 1.06498

सूडान

40,218,456 18,961,029 11,264,895 2.4294

मुस्लिम – मश्रिके वस्ता (Middle East )
431,356,727
230,582,445
182,058,952
179.81263

इसके अलावा इज़राईल का नक्शा और उसकी सरहदो को देखने से पता लगता है कि यह इज़राईल के लिय अमली तौर पर नामुमकिन की वो तीन तरफ से (मिस्र, उरदुन और सिरिया) की तरफ से एक साथ और लगातार होने वाले जमीनी हमलो से अपने आपको बचा सकता है। आपको इस बात पर हैरत होगी कि क्या इन देशो ने कभी इज़राईल के खिलाफ पहले कभी जंग नही लड़ी ? हाँ लड़ी है, मगर दरहक़ीक़त वोह जंगे दिखावटी जंगे थी जिन्हे ‘जिन्हे मफरूज़ा जंगे या scenario wars’ भी कहा जाता है जिसका मकसद इज़राईल के साथ अमन मुआहिदा करना था। इसका जिक्र मुहम्मद हैकल ने अपनी किताब “The Road to Ramadan” में सादात के एक जनरल (मुहम्मद फौवज़ी) के बयान का जिक्र किया, जिसने इज़राईल के साथ मिस्र की जंग की मवाज़ना (तुलना) समूरई की दो तलवारें के इस्तेमाल से की – जंग की तैयारी के लिये एक छोटी और एक बड़ी तलवार। फौवज़ी ने कहा था कि यह जंग (1967 की छः दिन की जंग) एक छोटी तलवार की तरह है जो कुछ खास मकासिद को हांसिल करने के लिये दिखावे की मुख्तसर लडाई लडी जाने के लिये इस्तेमाल की जाती है।

मिस्र के हुस्ने मुबारक की उम्मत के साथ यह खुली गद्दारी का मवाज़ना (तुलना) 2008 में होने वाली तुर्की के जरिये इज़राईल की फौज को फौजी मश्क (military exercises) देने में मदद करना से की जा सकती है। तुर्की की न्यूज ऐजन्सी का बयान है:

“इज़राईल और तुर्की के दर्मियान कई बिलियन डालरो के फौजी मुआहिदे हुए, खुफिया ऐजेन्सियो और ऑपरेशन्स में परस्पर सहयोग किया। इज़राईली जंगी जहाज़ कोनिया के उपर से उड़ रहे थे। दोनेा देशो के बीच एक मुश्तरक (common) मिसाईल शील्ड प्रोजेक्ट का ऐजेन्डा है। ईरान और सीरिया की सरहदो पर मिसाईलो को लगाने के बारे में विचार किया जा रहा है। कोनिया घाटी के बीस हजार मील लम्बे इलाके में दोनो देशो ने फौजी जहाजो ने परमाणु हमलो की वर्जिश की। ऐसे वाक़ियात की दर्जनो मिसाले दी जा सकती है। मुखतसर यह की तुर्की इज़राईल का दोस्त और इत्तेहादी (ally) है।

आर्थिक रूकावट

यह बात बिल्कुल साफ और ज़ाहिर है की इज़राईल के ज़मीनी, हवाई और समुन्द्री इलाके चारो तरफ से मुस्लिम देशो से घिरे हुए है। इसलिये इज़राईल अपने वजूद और दुनिया के दूसरे देशो तक पहुंचने के लिये मुस्लिम देशा का मोहताज है। इसलिये अगर इज़राईल पर ज़मीनी, हवाई ओर समुद्री रूकावटों डाल दी जायें तो इसका उसके वजूद पर क्या असर पड़ेगा।

समुंद्री रूकावट

इज़राईल के आयात और निर्यात का 98 प्रतिशत समुद्र के जरिये होता है। जिस तरह से इज़राईल की मामूली फौज ने लेबनान के लिये समुद्री रूकावट पैदा कर दी, उसी तरह मिस्र, सीरिया और तुर्की के लिये यह निहायत आसान है कि इज़राईल पर समुद्री रूकावट लगा सकते है, जिसे वोह बहरे रोम (Mediterranean sea) की तरफ नही बड़ सकता। इज़राईल तेल का 90 प्रतिशत आयात करता है और इस तेल को ज्यादातर टेंकरो के जरिये आयात किया जाता है। इसको रोक कर उसकी तवानाई (उर्जा) की ज़रूरतो पर बहुत बड़ा प्रभाव डाला जा सकता है। इज़राईल के महत्वपूर्ण बन्दरगाह अष्कलोन और ईलात (Ashkelon and Eilat) है। अष्कलोन रूस से टेंकरो में तेल हासिल करता है, जो बोसफोरस से गुजर कर आते है और जिस पर तुर्की क़ाबिज़ है। सन् 1989 तक मिस्र इज़राईल की 45 प्रतिशत तेल की ज़रूरतो को पूरा करता रहा। बाद में धीरे-धीरे रूस से वह इस ज़रूरत को पूरा करने लगा और अभी भी यह तादाद 26-30 प्रतिशत है। ईलात पर आये इन तेल के टेंकरो को अकाबा की खाड़ी से गुजरना पड़ता है, जिस पर मिस्र और सउदी अरब को इख्तियार हासिल हैं। यह एक बहुत तंग रास्ता है, जिस पर आसानी से रूकावट लगाई जा सकती है। इलात की बन्दरगाह आर्थिक लिहाज़ से बहुत महत्वपूर्ण है और यह सेन्ट्रल ऐशिया के तेल को दुनिया के बाजार मे बाटने का बहुत अहम बिन्दू है। बी.पी. (BP) इज़राईल की पाईप लाईन को तुर्की से होते हुये बाक्-तिबलीसी-सिहान तेल और गैस की पाईप लाईन से जोड़कर तेल निकालने का मन्सूबा रखती है। इन तमाम रास्तो से गुजरने के लिये मुस्लिम देशो की रज़ामन्दी जरूरी है। इज़राईल ने तवानाई (उर्जा) की ज़रूरतो को पूरा करने के लिये मिस्र के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किये, जिसके मुताबिक मिस्र को 1.7 से 3 बिलियन क्यूबिक फीट प्राकृतिक गेस 15 साल तक इज़राईल को सप्लाई करनी है। ( www.arabicnews.com).

यह रूकावट (blockade) मुन्दजबाला मुआहिदा का मुस्तरद कर देगा, जिससे पता चलता है कि हमारे हुक्मरान मुसलमानों के खिलाफ इजराईल की मदद करने मे कितने बड़े धोकेबाज है । “इज़राईल से आने वाले जहाज़ और मालवाहक जहाज़ो को स्विज़ केनाल की तरफ से मुफ्त में गुजरने का हक होगा ओर स्विज़ की नहर और बहरे रोम (Mediterranean sea) की तरफ से उसका गुजरना 1888 की कोंसटेंटिनोपल कंवेंशन के मुताबिक होगा।”

“यह पक्ष (parties) यह समझते है कि तिरान की और अकाबा की खाड़ी अंतराष्ट्रीय रास्ता होगा, जो सभी देशो के लिये बिना किसी रूकावट के पानी और जहाज़ की आजादाना गुज़रगाह होगी।”

“यह भी तय पाया गया कि इन सम्बन्धो मे यह सभी शामिल होगा कि मिस्र अपनी आम तौर से तेल की बिकवाली इज़राईल को करेगा और इज़राईल पूरी तरह से मिस्र में निकले हुये तेल की निलामी में बोली लगा सके।” [Treaty Of Peace Between The State Of Israel and The Arab Republic of Egypt – 26/03/1979]

समुद्री रास्ते पर रूकावट लगाकर तुर्की से इज़राईल जाने वाली पानी की सप्लाई, जो कि इज़राईल की बड़ी ज़रूरतो मे से है, पर रोक लगाई जा सकती है। इज़राईल और तुर्की के बीच जनवरी 2004 मे एक मुआहिदे ‘हथियार के बदले पानी’ पर दस्तखत किये गये जिसके मुताबिक तुर्की ‘‘50 मिलियन क्यूबिक मिटर पानी हर साल अंतोलिया की मनवगत नदी से 20 साल तक” इज़राईल को पानी के टेंकरो में भेजेगा।

ज़मीनी रूकावट

आगे दिये गये तिजारती मुआहिदे के मुताबिक इज़राईल, मिस्र और जोरडन (उरदुन) के दर्मियान सामान की तिजारत आपसी सरहदो के दर्मियान होगी: तिजारत और खरीदो फरोख्त पर मुआहिदा (08/05/1980) – “दोनो देशो के माल के आयात और निर्यात से सम्बन्धित आजादाना लेने देने के लिये हर पार्टी (पक्ष) दूसरे पक्ष के लिये अपने देश में चलने वाले कानून, ज़ाब्ते और कारोबारी तरीक़े अमल को दूसरे देश के लिये जारी रखेगी।”

‘‘दोनो देश एक दूसरे के साथ सबसे ज्यादा महरबानी और रिआयत का सुलूक रखेंगे।’’ इस मुआहिदे का असर यह हुआ कि इज़राईल से मिस्र औ उरदुन की तरफ निर्यात बढ़ गया जैसा की मुन्दरजाज़ेल रिपोर्ट बताती है:

‘‘जनवरी-मई 2006 में इज़राईल का मिस्र और उरदुन की तरफ निर्यात बढ़ गया, इसकी वजह Qualifying Industrial Zone (QIZ) का निर्यात मुआहिदा है जो इज़राईल ने दो पड़ौसी देशो के साथ किया है। मिस्र को निर्यात 93 प्रतिशत यानी 98.7 मिलियन अमरीकी डालर बढ़ गया है।’’ [http://www.port2port.com]

इज़राईल पर लगाई जाने वाली ज़मीनी रूकावटे इज़राईल और अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय के बीच होने वाली तिजारत, डाक और यातायात को प्रभावित कर सकती है।

फिजाई (हवाई) रूकावट

हवाई यातायात मुआहिदा 08/05/1980 – ‘‘दूसरी मुआहिद पक्ष (other Contracting Party) की रियासत में बिना रूके उड़ना’’ “इस रियासत में ग़ैर-ट्रेफिकी उद्देश्यों के लिये रूकना………….. इस बात पर मुआहिदा की दूसरे मुआहिद पक्ष कि रियासत में अन्तर्राष्ट्रीय यात्री, मालवाहक जहाज़ और डाक उठाना और लेना’’. ईजराईल की आने और जाने वाली अंतर्राष्ट्रीय फलाईट्स मुस्लिम देशो के हवाई इलाके इस्तेमाल करती है। हवाई रूकावटें लगाकर इज़राईल की पर्यटन व्यवस्था और अहम यातायात के रास्तो को मुतास्सिर किया जा सकता है।

मुस्लिम देशो ने उम्मत की इस पुकार का समर्थन किया कि व्यक्तिगत तौर पर इज़राईल के सामान का बहिष्कार किया जाये मगर रियासती (राज्य) के पैमाने पर इस पर कोई कदम नही उठाया गया। उम्मत ने पुरअसर तौर से इज़राईली और अमरीकी सामान का बहिष्कार किया। सन् 2002 अमरीकी उत्पदनो के बहिष्कार के कारण सउदी अरब में 2 मिलियन डालर के अमरीकी निर्यात में गिरावट आईं। लेकिन अगर हम खाड़ी देशो के अमरीका में पूंजी निवेश (इंवेस्टमेंट) को देखे तो यह रकम कुछ भी नही है। रूस के एक अखबार ‘प्रवदा’ के मुताबिक छः खाड़ी देशो का कुल पूंजी निवेश तकरीबन 1.4 ट्रिलीयन डालर है, जिसका 75 प्रतिशत जी-8 देशो में लगा है। यह संख्या दुगनी है अगर हम खाड़ी देशो का पश्चिमी देशो में पूजीनिवेश या भागीदार को देखे। अमरीकी हमलों से मुत्तास्सिर परिवारो के द्वारा सउदी अरब हुकूमत के खिलाफ 1 ट्रिलीयन डालर के दावों के मुकदमो न सउदी अरब की पश्चिमी देशों मे पूजीनिवेश की हक़ीक़त को उजागर कर दिया जो कि 750 बिलीयन डालर हैं। (अगस्त 2002-बीबीसी)

तहज़ीबी रूकावट

इज़राईल और मुस्लिम देशो के बीच तालीम (शिक्षा) मीडिया, तहज़ीबी शोबो के सम्बन्ध में भी मुआहिदे (समझौते) हुए है। इन समझौतो का मक़सद ईस्लामी तहज़ीब को तहलील करना और इज़राईल को मुसलमानो के लिये ज्यादा से ज्यादा क़ाबिले क़ुबुल बनाना है। ईस मुआहिदे की तीन मिसाले इस तरह है।

तालीमी प्रोटोकोल- काहिरा में इज़राईली शौक्षिक केन्द्र की स्थापना के सम्बन्ध में (25/02/1982) -‘‘दोनो पक्ष इस बात पर राज़ी हुये की काहिरा में एक इज़राईली शौक्षणिक संस्थान (तालीमी इदारा) का क़ायम होगा। यह केन्द्र इज़राईली ओरिऐन्टल सोसायटी के जरिये कायम होगा।’’

इज़राईली शहरियो को स्कोलरशिप की बुनियाद पर और दौरे पर आये इज़रीईली विद्वानों, की महमान नवाज़ी और सहायता दी जायेगी। इन विज़ीटिंग विद्वानो और मुहक़्क़िक़ो (researchers) के लिये सेमिनार आयोजित करेगे और उन्हे मौके फराहत करेगे कि वोह मिस्र के विद्वानो और मुहक़्क़िक़ो से मुलाकात और सहयोग हासिल करें।

मीडिया

इज़राईल की ब्रोडकास्टिंग ओथोरिटी और अरब गणराज्य मिस्र के बीच सहयोग का प्रोटोकोल (16/02/1982) ‘‘दोनो पक्ष रेडियो और टेलिविजन प्रोग्राम और फिल्मे जो कि इन देशो की सामाजिक आर्थिक और वैज्ञानिक जीवन के बारे में होती है, का तबादला और प्रसारण करेगे।’’

तहजीबी – मिस्र और इज़राईल के दर्मियान तहजीबी मुआहिदा (08/05/1980) -‘‘दोनो पक्ष खेल और युवा वर्ग से सम्बन्धित गतिविधियो को बढ़ावा और हौसला अफजाई करेंगे और इनसे सम्बन्धित संस्थानो को दोनो पक्ष तहज़ीबी, कलात्मक और वैज्ञानिक शौबो में सहयोग को बढ़ावा देगें।” ‘‘तहजीबी, सांईटिफिक और तालीमी तबाअत (publication) का तबादला’’

यह बात यही खत्म नही हो जाती। पी.ऐल.ओ (PLO or Palestine Liberation Organisation) जैसी संस्थाओ के क़याम का मक़सद फिलिस्तीनी मुसलमानो और मस्जिदे अक्सा की हिफाज़त की जिम्मेदारी को राष्ट्रवादी संगठन, जैसे PLO पर डालना है। दरहक़ीक़त यह मुस्लिम हुक्मरानो की जिम्मेदारी है, जिनके पास इसकी क़ुव्वत और सामर्थ है, लेकिन इस तरह से उन्होने लोगो की उम्मीदो को अपने से हटाने की कोशिश की। उसी तरह जब इज़राईली उत्पादनो के बहिष्कार का मुद्दा आया तो उन्हौने उम्मत को इज़राईली और अमरीकी उत्पादनो का बहिष्कार करने का प्रोत्साहन दिया, लेकिन खुद उन्होने मुस्लिम कम्पनियों के नाम से इज़राईली उत्पादनो का आयात करवा के उम्मत को धोका दिया। सन 2002 की एक रिपोर्ट के मुताबिक इज़राईल से 150 मिलियन डालर की क़ीमत का आयात अकेले सउदी अरब ने उरदुन की 73 कम्पनियो व साईप्रस का 70 कम्पनियां, मिस्र की 23 कम्पनियां और तुर्की की 11 कम्पनियों के जरिये किया। ये हुकूमते सामान के असल उत्पादक को छुपाने के लिये तीसरे देश का सहारा लेती है। (Deutsche Presse-Agentur)

नतीजा

इस ब्योरे को पढ कर कोई यह सोच सकता है कि यह स्थिती को आसान तरीके से देखना है और यह की फौज को हरकत देना आसान नही है और यह कि किसी देश पर रूकावट और सेंकशन (आर्थिक पाबन्दियाँ) लगाने के लिये मुआहिदा करना बहुत मुश्किल है। अगर ऐसा होता तो मुस्लिम हुक्मरान कैसे फौज जमा करते और सद्दाम हुसैन को कुवैत से हटाने के लिये अमरीकी-बरतानवी गठबन्धन मे शामिल होते। यकीनन संयुक्त राष्ट संघ और अंतराष्टीय समुदाय की निगाह में सद्दाम हुसैन का क़ुवैत का कब्जा बिल्कुल वैसा ही जैसा कि इज़राईल का लेबनान पर कब्जा है। क्या संयुक्त राष्ट संघ के लिये यह मुमकिन है कि बिना मुस्लिम हुक्मरानो के सहयोग के वह 10 साल के लिये आर्थिक पाबन्दियाँ, समुद्री रूकावट, या नो फ्लाई जोन को लागू कर सके ? ईराक भी ठीक इज़राईल की तरह मुस्लिम देशो से घिरा हुआ है। दरहक़ीक़त वो मुस्लिम हुक्मरान ही थे, जिन्हौने अमली तौर पर इराक़ के खिलाफ आर्थिक पाबन्दि को लागू करवाया था। क्या आप किसी ऐसे मुस्लिम हुक्मरान को याद कर सकते है, जिसने इन सेन्कशन्स की मुखालफत की हो या तोडने की कोशिश की?

अब तक आपके दिमाग मे यह सवाल आ चुका होगा कि हमे इन हुक्मरानो से कैसे छुटकारा मिले। इसके लिये कई तरह के विकल्प बताये जाते है, जैसे की उनके खिलाफ वोटिंग करके उन्हे निकाल दिया जाये। हमने दूसरे विश्व युद्ध के ज़माने से मुस्लिम दुनिया में ऐसे कई लोकतान्त्रिक चुनाव देखे है और फिर भी यह किसी तरह की तब्दीली नही ला सके। इन चुनावो ने तब्दीली को रोका है और मौजूदा हालात को जबरन बाकी रखा है। कई बार तब्दीली लाने के लिये असलहे (हथियारों) के साथ कोशिश (arm struggle) की गई। लेकिन इसने अस्थिरता और तबाही पैदा की और हमे फिर वही पहुंचा दिया जहां से हमने शुरू किया था।

असल मुश्किल यह है कि मुलसमान इस जाल में फंस गये कि उन्होने इन भ्रष्ट और मग़रिब को समर्थन देने वाली हुकूमतों से अपने पॉलिसी और मसाईल का हल लेने के कोशिश करते है जिन्होने हमेशा उन्हे गुमराह किया। लेकिन हमे हमारी पॉलिसीयाँ दूसरे हर काम की तरह हमारे प्यारे पैगम्बर हज़रत मुहम्मद (स्वल्लल्लाहो अलयहिवसल्लम) की उस्वाऐ हसना से लेनी चाहिये।

सिर्फ खिलाफत, जो की ईस्लामी निजामें हुक्मरानी है, के ज़रिये ही मुस्लिम जमीनो को एक करेगी और इस्तेमारी (colonialists) ताकतो के जरिये किये गये बटवारे को दूर करेगी जिसने मुस्लिम उम्मत को मुस्तक़िल कमजोरी और पिछड़ेपन के गड्डे में डाल दिया है। सिर्फ खिलाफत की सरकार ही ऐसी स्वतंत्र सरकार को कायम करेगी जो पश्चिम के इख्तियार से आज़ाद होगी और जिस पर मुस्लिम और दूसरे शहरियो की जान और ईज़्ज़त की हिफाज़त करना फज़्र है।

हिज़्बुत्तहरीर एक आलमी राजनैतिक पार्टी है जो कई मुस्लिम देशो में काम कर रही है ताकि वोह उम्मत की खिलाफत के कयाम मे रहनुमाई करे। वोह सियासी तौर पर लोगो को हर पैमाने से मुत्तहिद करने की कोशिश कर रही है ताकि इस्लामी रियासत का क़याम अमल में आये और जामेअ तब्दीली वाके हो। आज ही इस बात का पता लगायें कि आप खिलाफत के कयाम मे कैसे सहयोग कर सकते है और मुस्लिम सरज़मीनो को इन मगरिब परवर्दा हुक्मरानो और उनके इस्तेमारी आक़ाओ से आज़ादी दिला सकते है।

ईमाम मुस्लिम ने हजरत अबू हुरैरा (रजि.) से रिवायत किया है कि रसूलुल्लाह (स्वल्लल्लाहो अलयहिवसल्लम) ने फरमाया, ‘‘ईमाम, (खलीफा) वोह ढाल है जिसके पीछे तुम लड़ते हो और हिफाज़त हासिल करते हो।’’

मुस्लिम देशों ने मोदी जी को दिए सर्वोच्च नागरिक सम्मान।

1- अरब- किंग अब्दुल अजीज शाह पुरस्कार।

2- फिलिस्तीन- ग्रैंड कालर ऑफ द स्टेट।

3- अफगानिस्तान- आमिर अमानुल्लाह खान पुरस्कार।

4- मालदीव- निशान इज्जुद्दिन।

5- UAE- ऑर्डर ऑफ जायद।

फिर भी कुछ लोगों के लिए मोदी फासिस्ट है।

कोन से नबी कहां तशरीफ लाए हैं?

आदम अलेही सलाम -श्रीलका

नुह अलेही सलाम – जोरडन

इब्राहीम अलेही सलाम – इसराइल

इसमाइल अलेही सलाम -सऊदी अरेबिया

याकुब अलेही सलाम – फिलीस्तीन

युसुफ अलेही सलाम -फिलीस्तीन

लुथ अलेही सलाम – इराक

हुद अलेही सलाम – यमन

नबी-ऐ-पाक ﷺ – सऊदी अरेबिया।????

संगीता फोगाट
@sanGeeta__143
कश्मीर को फिलिस्तीन बना कर वहाँ के मुसलमानों पर इज़राइल की तरह ज़ुल्म करने

की योजना है !

अब तक के हालात यही यही बयान कर रहे हैं?

अगर अब एक नही हुये!

तो मिट जाओगें_ऐ भारत के मुसलमानों!

ناصر بن مسلم الفواز
@naser272727
الجيش العثماني بعد صلاه الجمعه في المسجد #الأقصى المبارك ????

رحم الله آل عثمان وكل الموحدين.

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