साहित्य

बूढ़ी दादी,,,बहुरिया सठिया गई है, कोई बात सुनती नहीं!

Preeti Anand Asthana‎

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बूढ़ी दादी – लघुकथा
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दादी बड़बड़ाती हुई अपनी छड़ी लेकर सड़क पर चली जा रही थी।
“बहुरिया सठिया गई है, कोई बात सुनती नहीं। बेकार खाना बनाती है। रोज़ रोज़ लौकी तुरई कौन खाता है। कटहल बनाये, आलू मटर गोभी, मसाला अरबी खाये सालों हो गए। आज मैं खुद लेकर आऊंगी सब्जी।”
“अरे दादी जी , आप कहाँ जा रही हैं?”
सामने से पर्स लटकाए पोता बहु, सुगंधा, चली आ रही थी। शायद बस से उतरी है, ऑफिस से आयी होगी।
“तेरी सास ठंग का खाना नहीं खिलाती। खुद सब्जी लाऊँगी, अपने पसंद की।”
“मैं भी चलती हूँ दादी।” सुगंधा ने कहा।
“एक शर्त है। तू ना देगी पैसा।”
“जी दादी। मुझे कुछ पसन्द आया तो?”
“वो भी मैं दूँगी। पैसे हैं मेरे पास। नहीं मंज़ूर तो घर जा”, अपना बटुआ दिखाती हुई बोली दादी।
“आप ही देना पैसा दादी।” दादी को सड़क पर अकेला छोड़ कर घर कैसे जाए वह, साथ तो रहना ही होगा।
हाँफती, रुकती, अटकती, चलती दादी सब्जीवाले की दुकान पहुँच गईं। छाँट छाँट कर अपने पसन्द की सब्जियाँ लीं।
”तू भी कुछ ले ले, अपनी पसन्द का।”
सुगंधा ने एक ब्रोक्कोली उठा ली।
“जे का है, बहुरिया? ये कैसी गोभी है?”
“ब्रोक्कोली है दादी। बहुत अच्छी सब्जी बनती है इससे।”
“अच्छा, ले ले।”
घर पहुँकर दादी ने अपनी बहू को बुलाया,
“इधर आ! देख मैं क्या लाईं हूँ। अब यही सब सब्जी बनानी है। लौकी तुरई न खाऊँगी मैं।”
उनकी बहू रमा सब्जियाँ देख परेशान तो हुई ही, उसे हँसी भी आ रही थी। जो जो सब्जी मना थी, वही लाईं थीं माँजी।
जब उनकी पसंद का खाना परोस के रमा सास के पास ले गई तो खाना देख कर उन्होंने बोला,
“अरे पगली, मुझे तो तुम वही तुरई लौकी, मूँग की दाल ही परोस दो। मेरे उम्र के लिए वही सही है। ये तो मैं तुम लोगों के लिए लाईं हूँ, मेरे चक्कर में तुमलोग भी बीमारों वाला खाना खाते हो। तुम्हारी अभी उम्र है, अच्छा खाओ, अच्छा पहनो।”

स्वरचित
प्रीति आनंद अस्थाना
02.11.2019

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