विशेष

अगर कुछ समय वहां बैठा जाए तो ज्वारभाटा भी देखा जा सकता है

वाया : मैं कहता आंखन की देखी
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कल सौभाग्य से बेलूर मठ जाने का अवसर प्राप्त हुआ । वैसे तो तीर्थो में भ्रमण करने की मेरी कभी इच्छा नहीं होती है । हां , तीर्थ स्वयं मुझे बुला ले तो बात अलग है । वैसे भी शास्त्रों में तीर्थ भ्रमण को बहुत निकृष्ट कार्य माना गया है । स्वयं रामकृष्ण परमहंस जी ने अपने एक श्रृद्धालु को वाराणसी में गंगा स्नान के लिए जाने से मना कर दिया था । बेलूर मठ की स्थापना स्वामी विवेकानंद जी ने गंगाजी के तट पर थी । यह बहुत सुंदर, मनमोहक स्थान है । यद्यपि आने जाने वालों की काफी भीड़ रहती है , फिर भी यहां शांति का स्थाई साम्राज्य रहता है । यहां कोई आडम्बर नहीं है और कोई चढ़ावा पूजापाठ नहीं चलता हैँ । गंगा जी की लहरें बेलूर मठ की चहारदीवारी से निरन्तर टकरा टकरा कर अठखेलियाँ करतीं रहती हैँ । अगर कुछ समय वहां बैठा जाए तो ज्वारभाटा भी देखा जा सकता है ।

मैं जब पहुंचा तो ज्वार उतर चुका था । मैं गंगाजी के तट पर गया । बहती धार में आचमन किया और कुछ देर वहीं घाट पर बनी सीढ़ियों पर बैठ गया । गंगाजी को स्पर्श करके आती हुई ठण्डी ठण्डी हवा ने हृदय को आनन्द से भर दिया । सागर में विलीन होने से ठीक पहले अब गंगा भी थमी थमी सी प्रतीत होती है । जिस गति से गंगाजी गंगोत्री से सागर की ओर भागती हैँ, अब उसमें क्षीणता आ जाती है । थमी थमी सी शांत गंगा के किनारे जो भी जाता है, उसका मन भी कुछ देर के लिए ठहर जाता है । हजारों लोग यहाँ आते हैँ, बैठते हैँ, प्रार्थनाएं करते हैँ । गंगा, एक जीवित नदी, पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक देवी , जो करोडों जीवों का प्रत्यक्ष रूप से पोषण करती है, आज भी करोडों लोगों की आस्था का केंद्र है । हृदय से प्रार्थना उठे तो पूरी प्रकृति सुनती है । मेरे साथ घटी एक घटना अनायास मेरी स्मृति में आज ताजी हो गयी ।

वर्ष 2016 की बात है । मैं उस समय ए डी एम हापुड़ के पद पर तैनात था । हापुड़ में एक तहसील है गढ़ मुक्तेश्वर । हर वर्ष वहां बहुत विख्यात और पौराणिक मेला लगता है जो गढ़ गंगा मेला के नाम से प्रसिद्ध है । ऐसी मान्यता है कि पांडवों ने महाभारत के युद्ध के बाद यहां अपने मृत परिजनों का तर्पण किया था । तभी से हर वर्ष लाखों लोग गढ़ मुक्तेश्वर आते हैं और अपने पूर्वजों का तर्पण करते हैं । इस मेले में बीस से पच्चीस लाख लोग आते हैं ।

चूंकि मैं अपर जिला मजिस्ट्रेट के पद पर कार्यरत था, इसलिए पूरे मेले की समस्त प्रशासनिक व्यवस्थाओं के लिए मैं ही प्रभारी था । उस समय मेरे परम मित्र श्री सत्यदेव मिश्रा जी मेरे साथ ही रहते थे और हम दोनों साथ में ही ध्यान – भजन किया करते थे । मेला लगने के लगभग एक सप्ताह पहले मैं गढ़ गंगा मेले की तैयारियों के लिए गढ़ मुक्तेश्वर गया और मेरे साथ मिश्रा जी भी गए । जब गंगा जी के तट पर मैं अपने बाकी सहयोगियों समेत पहुंचा तो मेरे एक कर्मचारी ने कहा कि इस बार लोगों को गंगा स्नान करना बहुत कठिन होगा । मैने पूछा कि ऐसा क्यों ? तो उसने बताया कि इस बार गंगा जी बहुत गहरी हैं । घाट पर पानी की गहराई 15 फीट से कम नहीं होगी और बहाव इतना तेज है कि जो भी इसमें घुसेगा , वह या तो डूब जाएगा या बह जाएगा । घाट का मतलब वहां प्राकृतिक बहाव से है । वहां कोई अलग से घाट बनवाया नहीं जाता बल्कि गंगा जैसी बहती हैं, उसी में रेत के किनारे सभी आगंतुक अपने अपने तंबू लगाते हैं और स्नान करते हैं । इतने गहरे पानी और इतने तेज बहाव में बैरिकेटिंग कराना भी असंभव था । मेले में किसी को समझाना संभव नहीं होता । वहां जो श्रृद्धालु आते हैं , वे सब अपनी मर्जी से स्नान करते हैँ और किसी की नहीं सुनते हैँ ।

मैंने एक मोटर वोट मंगवाई और उसमें साथियों समेत बैठ गया । फिर एक लंबा सा बांस पानी में डालकर थाह ली तो पता लगा कि पानी की गहराई सचमुच 15 फुट से कम नहीं थी । मैं किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा था । गंगाजी से भिड़ने के लिए न तो मेरे पास साधन थे और न कोई उपाय था । ऊपर से जिलाधिकारी महोदय ने कह रखा था कि ए डी एम साहब देख लेना, कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए । मैं समझ गया कि अगर कोई दुर्घटना हुई तो मेरे लिए बहुत मुश्किल खड़ी हो जाएगी । मेरे जीवन में जब भी ऐसा कठिन समय आता है तो अनायास मेरे आसपास एक ऐसा वर्तुल निर्मित हो जाता है जिसे कठिन से कठिन परिस्थिति भेद नहीं पाती है । मैंने अपने जीवन में कई बार अनुभव किया है कि जब मैं चारों तरफ से असहाय हो जाता हूँ तथा कठिनाइयों से घिर जाता हूँ तब अचानक ही कोई अज्ञात शक्ति सहायता के लिए प्रकट होती है । शायद “निर्बल के बल राम ” वाली कहावत का भी यही अभिप्राय है । जो भी हो, सामने विकट परिस्थिति थी और इसका अपने हाथ में हल कुछ भी नहीं था । अब तो बस गंगाजी का ही सहारा था ।

सच में गंगा जी की कृपा के बिना इस बार बहुत मुश्किल खड़ी हो सकती थी । मैंने वहीं बीच धार में मोटर वोट में खड़े होकर गंगा जी के हाथ जोड़े और हृदय से प्रार्थना की -“हे गंगा माता, मैं नाकुछ इन्सान हूँ, मेरे किए कुछ नहीं होगा । कोई अनहोनी हुई, कोई दुर्घटना हुई तो सारा दोष मेरे सिर पर मढ़ दिया जाएगा । मेरी कोई ऊपर पहुंच भी नहीं है जो मुझे बचा सके । अब सब तुम्हारे हवाले है । “मैंने श्रृद्धा से सिर झुकाया और वहां से अपने घर के लिए निकल पड़ा । कुछ लोगों ने टिप्पणी भी की कि साहब आपको विश्वास है कि गंगाजी कुछ सुनेगीं । मैंने कहा कि जरूर सुनेगीं । कोई सुनाने वाला हो तो सब सुनते हैँ । प्रकृति का कण कण सुनता है । भगवान बुद्ध के चरणों में पागल हाथी नतमस्तक हो गया था । साधु सच्चा हो तो उसकी सुरक्षा में शेर खड़े हो जाते हैँ । निष्ठुर से निष्ठुर जीव भी सुन लेते हैँ, ये तो फिर भी देवी है । ये, करोडों जीवों को पालती है । इसके जल से लाखों हेक्टेयर जमीन सींची जाती है, जिससे करोड़ों मनुष्यों को भोजन मिलता है । मेरी दृष्टि में तो गंगाजी जी जीवित और प्रत्यक्ष देवी हैँ । पत्थर दिल सिर्फ मनुष्य होता है । प्रकृति तो बहुत कोमल-हृदय होती है । जब भी हृदय की गहराई में, लोक कल्याण के लिए, कोई प्रार्थना जन्म लेती है, वह व्यर्थ नहीं जाती, कभी खाली नहीं जाती ।

उसी रात से एक अनोखी घटना घटनी शुरू हुई । गंगाजी के बहाव में कुछ ऐसा परिवर्तन हुआ कि रेत का कटान शुरू हो गया और ये कटान मेला भरने तक लगभग एक सप्ताह लगातार जारी रहा । पानी के तेज बहाव ने तट की रेत को इस तरह काटना शुरू किया कि जहां पानी की गहराई पंद्रह फुट थी, वहां अब पानी की गहराई मात्र तीन – चार फुट रह गयी । पानी ने रेत को काट काट कर गहराई को भर दिया और कम से कम तीन किलोमीटर तक शानदार नहाने योग्य प्राकृतिक घाट बनकर तैयार हो गया । मैं हैरान रह गया । चमत्कार सामने था । सामने गंगा जी बिल्कुल शांति से बह रहीं थी । एक कमजोर और नाकुछ इंसान की प्रार्थना सुन ली गयी थी ।

जब हृदय से प्रार्थना की जाए तो पूरी प्रकृति सुनती है । मुझे संत रविदासजी के साथ घटी एक घटना का स्मरण हुआ । यही गंगाजी उनके कमंडल में कंगन लेकर प्रकट हुई थी । वे गंगाजी के तट पर गए भी नहीं थे और उनकी प्रार्थना गंगाजी ने सुन ली थी । मैंने उस महान संत को मन ही मन में प्रणाम किया । एक बार फिर मेरा विश्वास गहरा हुआ कि जब संसार के सभी मार्ग बंद हो जाते हैँ तो अनायास ही परमात्मा के द्वार खुल जाते हैँ और कुछ अज्ञात हाथ हमारी सहायता करने के लिए बढ़ जाते हैँ । उस वर्ष कोई छोटी सी भी दुर्घटना नहीं हुई वरना हर वर्ष कोई न कोई घटना अवश्य होती रहती है । पूरा मेला बड़ी शांति से संपन्न हुआ । मैंने अपना भी एक तंबू गंगाजी के तट पर लगवाया और वहीं मेला संपन्न होने तक डेरा डाले रहा । मेरे साथ चार पांच साधु और भी थे । दिन में सभी गंगा नहाते, रात में ढोलक मंजीरा बजाते, भजन गाते, सब आनन्द में मगन हो जाते । बहुत सुनहरे थे वे दिन और वे रातें: गंगा जी का किनारा, तारों भरी रात , बहती हुई सर्द हवा , झिलमिलाती हुई लहरें, आकाश में खिला हुआ चाँद ,साधुओं मंडली, बजते हुए ढोलक मंजीरे, कंठों से गुनगुनाते हुए भजन, आज भी भावविभोर कर देते हैं । मैं और मिश्रा जी उस घटना की और उन सुनहरे दिनों की अक्सर चर्चा कर लेते हैँ ।

हृदय में असीम शांति है । सांस लेने की आवाज भी साफ साफ सुनाई पड़ रही है । पता नहीं, कितनी देर तक मैं सीढ़ियों पर बैठा रहा । अचानक आंख खुली तो पता लगा कि चलने का समय हो चुका था । रामकृष्ण परमहंस जी और स्वामी विवेकानंद जी और गंगाजी को अहोभाव से, हृदय की गहराइयों से प्रणाम करता हुआ मैं घर की ओर वापस चल पड़ा ।

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