ब्लॉग

आज बसपा ऑलमोस्ट फ़िनिश हो चुकी है

मायावती खुद अपनी औकात नहीं समझ पाई, या हम लोग ही मायावती को उनकी औकात से ज्यादा समझते रहे हैं
Satyendra PS
============
मायावती खुद अपनी औकात नहीं समझ पाई, या हम लोग ही मायावती को उनकी औकात से ज्यादा समझते रहे हैं।
बसपा के नेताओ से पहले बात होती थी तो उनसे यही पूछता था कि मायावती को आरके चौधरी, ओम प्रकाश राजभर या इस तरह के तमाम नेताओं से क्या खतरा हो सकता है? मायावती के अपने सपोर्टर हैं, जो कहीं नहीं जाने वाले। पार्टी में एक से दस तक मायावती ही मायावती हैं, कम से कम 11वें नम्बर पर कुछ पिछड़े नेताओं को उभरने दें। कुछ तो सम्मान और जगह दें ओबीसी नेताओं को?
बसपा से जुड़े लोगों का कोई ठोस जवाब नहीं होता था।


धीरे धीरे कहांर, बढई, लोहार, भर टाइप हाशिये वाली ओबीसी जातियां मायावती से छिटकती गईं। ओबीसी में थोड़ा सम्पन्न जातियां भी विकल्प पाते ही कट ली, जो कभी बसपा कभी सपा को आजमाती थीं।

आज बसपा इस हाल में आ गई है कि अब अगले चुनावों में उसका टिकट भी महंगे दाम पर नहीं बिकने वाला है। पार्टी ऑलमोस्ट फिनिश हो चुकी है।
बसपा भक्तो ने ओबीसी को मनुवादी, शूद्र और गुलाम सहित जाने क्या क्या कहकर चिढाना शुरू कर दिया और शायद ऐसा मायावती की वजह से ही हुआ। उन्होंने दलित ब्राह्मण मुस्लिम समीकरण में ओबीसी को धकिया दिया, इसी समीकरण से भारत विजय के सपने देखने लगे। और उनके भक्तों ने ओबीसी को गालियां देनी शुरू कर दी। पंजाब जैसे राज्य में दलित की गिनती भी नहींहोती जहां देश मे सबसे ज्यादा दलितों का प्रतिशत है। ओबीसी के कट्टर समर्थन से बसपा यूपी में सत्ता में आई और उसके भक्त आज ओबीसी को अपना सबसे बड़ा वर्ग शत्रु मानते हैं। ओबीसी ने मायावती को छोड़ दिया।

यह सब इसलिए लिखा कि ओबीसी के अलावा मायावती आजकल दलित से भी डरने लगी हैं। दलितों में भी अपना काल्पनिक वर्ग शत्रु ढूंढ रही हैं। चंद्रशेखर की कोई औकात नहीं है, यह कहा जा सकता है कि वह राजनीति में अपने लिए थोड़ा सा स्पेस बना रहा है। उसे साथ जोड़ने के बजाय मायावती उसे अपना सबसे बड़ा दुश्मन माने बैठी हैं।

Ashutosh Kumar
===========
सौ साल पहले जनरल डायर को एक राष्ट्रवादी हीरो मानने वाले लोग इंग्लैण्ड में बहुत थे.
लेकिन उद्धव ठाकरे द्वारा इधर की कुछ घटनाओं की तुलना जालियांवाला बाग़ से करना कहाँ तक उचित है ?

डायर ने एक घिरी हुई जगह में हो रही जनसभा पर गोलियां चलवाई थीं. वहाँ से लोगों के निकलने के रास्ते पहले ही बंद कर दिए थे. कांग्रेस का दावा था कि तकरीबन एक हज़ार लोग मारे गए थे, डेढ़ हज़ार घायल हुए थे.

इसी घटना के विरोध में गुरुदेव ने नाइटहुड की उपाधि लौटा दी थी. वे भारत के पहले नोबेल विजेता होने के साथ पुरस्कार वापसी गैंग के संस्थापक सदस्य भी थे .

लेकिन इधर की घटनाओं की तुलना जालियांवाला बाग से करने के पहले सोचिए.

डायर के सिपाही लाठिया-गोले-गोलियां बरसाते किसी कैम्पस में या गली मुहल्ले में नहीं घुसे थे.
लोगों के घरों में घुस कर कोई तोड़फोड़ नहीं मचाई थी.
निहत्थे लोगों पर गोलियां चलाई थीं तो इसे कबूल भी किया था. झूठ नहीं बोला कि एक भी गोली नहीं चलाई.
सीसीटीवी कैमरे नहीं तोड़े थे.
और उनके साथ गैर-सरकारी स्वयंसेवक नहीं थे!

सोचिए!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *