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जस्टिस लोया की मृत्यु स्वाभाविक मृत्यु नहीं थी, हत्या थी, और इसके पीछे बड़े-बड़े लोगों का हाथ था!

#जांच_होनी_चाहिए_या_नही ????????

आज ही के दिन 1 दिसंबर (2014) …जज लोया की हत्या हुई।

पिता और बहन ने कहा जस्टिस लोया सुनवाई के निर्णायक मोड़ पर थे. वह निर्णय देने वाले थे तभी अचानक रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गयी.

सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस लोया की मृत्यु स्वाभाविक मृत्यु नहीं थी, हत्या थी, और इसके पीछे बड़े-बड़े लोगों का हाथ था, ‘कैरावन’ के ख़ुलासे के बाद किसी को भी यह साफ दिखाई दे सकता है ।

ज़रूरत इस बात की है कि अब सुप्रीम कोर्ट खुद इस पूरे मामले का संज्ञान लेते हुए एक न्यायाधीश की हत्या के इस षड़यंत्र की जाँच कराये और न्याय करे ।

जस्टिस लोया की मौत की जांच जरूर होगी और इसे कोई रोक नहीं पाएगा। इस विश्वास को हम सबको मिल कर आगे बढाना है।

मनीष चौधरी✍️✍️✍️


Arif Kamal
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किरन खेर के इस बयान की बहुत आलोचना हुई।
पर इनके बयान में गलत क्या है।अपने घर की बहन बेटी बच्ची को हम क्या यही कुछ नही समझाते।
बेटा शाम ढले से पहले लौट आना।
बेटा अकेले मत आना दो तीन लडकिया साथ आना।
बेटा बस में और भी सवारी हो तभी बैठना ।
बेटा किसी अनजान से बात नही करना।

असल मे किरण खेर के बयान में एक स्वीकारोक्ति है कि हमारा भारतीय समाज करोड़ो मर्द रूपी भेड़ियों से भरा पड़ा है जो कहने को संस्कृति और मज़हब के नाम पर लंबी लंबी हांकता है।सेक्स का नाम आते ही भड़क जाता है। पर स्त्रियों की इज़्ज़त इनकी नज़र में अमेरिका यूरोप जैसे असांस्कृतिक ,अधर्मी,नग्नता से भरे मुल्कों से बहुत बहुत कम है।

Satyendra PS
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हिंद स्वराज पढ़ रहा हूं. गांधी जीवा कभी कभी इत्ता चिरकुट टाइप बात लिखता है कि समझ में नहीं आता।

जैसे रेल, वकील और डॉक्टरों ने भारत को तबाह कर दिया. गांधी का रेल के बारे में तर्क बड़ा मजेदार लगा। वह कहते हैं कि भुखमरी, महामारी छुआछूत की बीमारी फैलाने में रेल का बड़ा योगदान है। जबसे यह रेल आई है, उन इलाकों में खाद्यान्न पहुंच जाता है, जहां भाव ज्यादा है। इसकी वजह से खाद्यान्न का इंबैलेंस हो रहा है. छुआछूत की बीमारी वाले दूर तक चले जाते हैं औऱ बीमारी फैला देते हैं। मनुष्य को प्रकृति ने पैदल चलने के लिए बनाया है. अधिक से अधिक वह बैलगाड़ी से चले. इससे ज्यादा रफ्तार होने से बवाल होता है.
यह पूछे जाने पर कि ज्ञान का प्रसार और विचार विनिमय तो आवाजाही से होता है. इसके बारे में गांधी का तर्क है कि पैदल चलना चाहिए. रफ्तार धीमी होती है तो व्यक्ति एक दूसरे की भाषा सीखता जाता है, प्यार मोहब्बत बढ़ता है. रेल से जाने पर दूसरे रोज कई सौ किलोमीटर दूर आदमी पहुंच जाएगा और उस इलाके का कल्चर नहीं समझ पाएगा और इससे टकराव होता है।
अजीब हाल है।

इसी तरह से उदय प्रकाश जी से एक रोज बात हो रही थी। उन्होंने कहा कि प्रकृति ने तो आदमी को सोने के लिए बनाया है। सोने के अलावा टट्टी पेशाब से लेकर खाने पीने में बहुत कम वक्त लगता है। अगर कोई व्यक्ति किसी से 8 घंटे तक बैठाकर काम कराता है तो वह अप्राकृतिक है और इससे व्यक्ति का प्राकृतिक विकास बाधित होता है! इसी तरह एक रोज उन्होंने बताया कि मांस खाना प्राकृतिक है। जो तसला भर भात खाते हैं वह ढेर सारा लीद निकालते हैं। फूल जाते हैं ऊपर से. जो भी जीव मांस खाता है वह अपशिष्ट कम निकालता है और स्लिम ट्रिम, स्मार्ट और छरफर होता है!!

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