देश

जो पिछले 7 दिन से पुलिस की कस्टडी में था…थर्ड डिग्री टार्चर झेल रहा था…आखिर यह 4रों कैसे दरिंदे थे…!

Tanweer Ahmed Shaikh
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4 आरोपी लड़के …
जिसकी अभी ठीक से मूंछें भी नहीं फूटी थी …
जो पिछले 7 दिन से पुलिस की कस्टडी में था..
थर्ड डिग्री टार्चर झेल रहा था …
ऐसा टार्चर जिसके डर से निर्दोष भी हत्या का इल्जाम अपने सर ले ले ..

पीड़िता 30 वर्ष की एक डॉक्टर …
स्कूटी खराब हो गई …
दरिंदों में फंस गई …
ऐसे दरिंदे जिसने न सिर्फ उसका बलात्कार किया …
उसे जला कर कोयला बना डाला …

आखिर यह 4रों कैसे दरिंदे थे …
बलात्कार किया …
फिर 30 वर्ष की महिला की हत्या करके उसे जलाने से उसे क्या मिला …
क्या पीड़िता जीवित रहती तो उसे पहचान लेती …
क्या पीड़िता उसे पहचानती थी …
यदि वह 4रो वासना का पुजारी था तो हत्यारा किंयु बना ..
क्या वह 4रो पेशेवर कातिल या साइको किलर था ..
क्या वह 4रो आपस में दोस्त या रिश्तेदार थे …

पुलिस ने पीड़िता के घर वालों की कम्प्लेन लेने और उसकी तलाश में एक्शन लेने में देरी किंयु की …?
इन 4रो आरोपियों को किसने देखा और पहचाना ..?
इतने दिनों की पुलिस रिमांड के बाद भी पीड़िता का मोबाइल और घड़ी, पर्स किंयु नहीं मिला ?
जब पीड़िता का सामान बरामद करने के लिए आरोपियों को लेकर पुलिस वाले जा रहे थे तो उसके हाथ में हथकड़ी किंयु नहीं थी ?
बिना समान मिले 4रो का इनकाउंटर किंयु किया ?
गोली कमर के नीचे किंयु न मारी ?
वहां पर एनकाउंटर स्पेशलिस्ट कैसे पहुंचा ?

मामला हैदराबाद के नहीं था, फिर भी मीडिया और शोसल मीडिया पर हैदराबाद किंयु छाया रहा ?
मामले को हिन्दू, मुसलमान किंयु किया गया ?

ऐस हजारों सवाल है… जिसका जवाब पता नहीं

Pradeep Kasni
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क्या चारों ने जलाया था ? दियासलाई चारों ने एकसाथ लगा दी थी ?

हो सकता है चारों मे से कोई एक रेप के पक्ष में न भी रहा हो ! चारों में से कोई एक रेप या अग्निदहन के विरोध में लड़ा भी हो !

तुम कुछ नहीं जानते ! यह भी नहीं कि अपराध में किस का कितना हाथ था। या इनमें से किसी का भी नहीं था, और अपराधी अब भी कहीं न कहीं बचे हुए बैठे हुए हैं।

तुमने उन्हें दौड़ाया, और मार दिया !

तुम कहते हो वे फ़ायरिंग कर रहे थे। अरे, क्या उनको बन्दूक चलाना तो दूर, पकड़ना भी आता था ?

तुमने बोला वे तुम्हारी बन्दूक छीनकर भाग रहे थे ! अरे, तुम्हें तो झूठ बोलना भी नहीं आता ! कोई गदहा और दल्ला भी नहीं मानेगा कि वे हरी मिर्च-से दिखने वाले लौंडे-लपाड़ इतने मज़बूत और ऐसे भीम-भारी थे कि तुम्हारी बन्दूक भी छीन ली और चल भी दिये ! वे भागेंगे ही क्यों जब उन्होंने बन्दूक छीन ली है और बन्दूक भरी हुई है ! क्या चारों ने एक-एक बन्दूक छीनी, या सिर्फ़ एक बन्दूक छीनी ?

तुम पुलिस के अत्याचारों और झूठी कहानियों और फ़र्ज़ी मुक़दमों के बारे में कितना जानते हो !

वह निर्दोषों को मार गिराती है और ताक़तवर अपराधियों के यहां झुक-झुककर पानी भरती है, देखा है न ?

तुम्हें तो ये भी नहीं मा’लूम लोगों का मन होता है। हर किसी का एक अलग मन होता है। अपराध में भागीदारी की मात्रा हर किसी की अलग अलग होती है।

ख़ुश हो कि उड़ गये ! नाच रहे हो। पागलों की तरह जशन मनाने लग पड़े। यह तुम्हारी ही ऐसी की तैसी का बीज रुंप गया, नहीं दिखा न ?!

ये जो मार डाले गये आतंकवादी नहीं थे। विदेशी आक्रांता नही थे। यहां के न्याय पर उनका हक़ था।

उनकी सिर्फ़ जान गयी है, यह हक़ तो तुम्हारा छिना है, उल्लूबाटो !

— अमितकुमार पाण्डेय

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