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ये है वह आदमी जिसने इस्राईल को तबाह कर दिया …!!

ज़ायोनी एक बार फिर नए मंत्रीमंडल के गठन में विफल हो गए जिसके बाद इस्राईल में लगभग बारह महीने में तीसरी बार संसदीय चुनाव आयोजित होंगे।

इस्राईल में 2 मार्च को फिर से संसदीय चुनाव होंगे जबकि इससे पहले निर्वाचित होने वाले सांसदों को, सरकार के मुक़ाबले में अपनी ताक़त और क्षमता दिखाने का मौक़ा ही नहीं मिला। बेनयामिन नेतनयाहू एकमात्र व्यक्ति हैं जिन्हें इस पराजय से फ़ायदा मिलेगा क्योंकि वे अब तीन महीने और सत्ता में रह सकते हैं और भ्रष्टाचार के आरोपों में चल रहे मुक़द्दमों से क़ानूनी छूट हासिल कर सकते हैं। इस्राईल के पूर्व गृहमंत्री लेबरमैन ने नेतनयाहू की आलोचना करते हुए कहा है कि उनके स्वार्थ के चलते, इस्राईल में संकट पैदा हुआ है। उधर नेतनयाहू ने एक बार फिर यह राग अलापा है कि वे चुनाव में बहुमत हासिल करके नया मंत्रीमंडल गठित करेंगे। इस आधार पर इस बात की अपेक्षा की जा सकती है कि अगले कुछ दिनों में वे अपने कुछ राजनैतिक क़दमों के माध्यम से स्वयं को सबसे अच्छे विकल्प के रूप में इस्राईलियों पर थोपने की कोशिश करेंगे या फिर इस्राईली राष्ट्रपति से इस बात के लिए सौदेबाज़ी करेंगे कि उनके ख़िलाफ़ चल रहे मुक़द्दमे वापस लेने की स्थिति में वे राजनीति के मंच से हट जाएंगे।

बहरहाल अगर नेतनयाहू राजनीति के मंच से नहीं हटते हैं तो फिर जो विकल्प बचते हैं वे वही होंगे जो पिछले कई महीनों से इस्राईलियों के सामने हैं सिवाय इसके कि दक्षिणपंथी धड़े में कुछ बुनियादी परिवर्तन आ जाएं जो बेनी गेनेट्स के पक्ष में होंगे लेकिन अगर ये परिवर्तन वामपंथी और मध्यमार्गी धड़े में होते हैं तो फिर नेतनयाहू प्रधानमंत्री बन जाएंगे और इस बार वे ज़रूर अवसर से लाभ उठा कर मुक़द्दमे की कार्यवाही से प्रधानमंत्री को अलग रखने के क़ानून को पारित करवा देंगे। अलबत्ता सर्वेक्षणों से पता चलता है कि तीसरे संसदीय चुनाव से भी कुछ ख़ास बदलाव नहीं आएगा लेकिन इस लम्बे संकट से जो बिंदु सामने आ रहा है वह इस्राईल की राजनैतिक व्यवस्था में नेतनयाहू द्वारा पैदा की गई दरार है। उन्होंने अपने गठजोड़ को हठधर्मी, स्वार्थ और अपने दलगत हितों के लिए दूसरों को हटाने की नीति पर आधारित कर रखा है जो ज़ायोनी शासन में अभूतपूर्व है।

इस्राईल में इससे पहले की सरकारें वामपंथी, दक्षिणपंथी, धार्मिक और सेक्यूलर धड़ों से मिल कर बना करती थीं जबकि नेतनयाहू ने विशेष धड़ों से गठजोड़ करके उस परंपरा को ख़त्म कर दिया है। इसी तरह वे विभिन्न आरोपों में फंसे होने के बावजूद प्रधानमंत्री पद पर बने रहने पर अड़े हुए हैं। यह भी ज़ायोनी शासन के पूर्व नेताओं के रवैये के विपरीत है। अगर यह कहा जाए कि नेतनयाहू ने केवल पिछले एक साल के अंदर इस्राईल की राजनैतिक व्यवस्था को तबाह कर दिया है तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। उन्होंने जो संकट पैदा किया है वह अगले बरसों में अन्य नेताओं को भी अपनी लपेट में ले लेगा चाहे, नेतनयाहू हमेशा के लिए राजनैतिक मंच से हट जाएं, तब भी।

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