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ईरान और सऊदी अरब दोस्त बन रहे हैं, इस्राईल खड़ी कर रहा है रुकावट : रिपोर्ट

सऊदी अरब की सरकार से निकट समाचार पत्र अश्शरक़ुलऔसत में ” मशारी अज़्ज़ायदी” ने लिखा है कि ईरान और सऊदी अरब के मध्य वार्ता की खबरें अक्सर सुनायी देती हैं यहां तक कहा जाता है कि ईरान व सऊदी अरब के बीच मौजूद संकट बस खत्म ही होने वाला है।

ईरान और सऊदी अरब के बीच संपर्क और बातचीत की कई बार खबरें सामने आयीं लेकिन फिर मामला आगे नहीं बढ़ पाया। वास्तव में सऊदी अरब के तेल कारखाने आरामको पर यमन के हमले के बाद, सऊदी अरब, ईरान से बात करना चाहता था लेकिन अमरीका ने उसे रोक दिया।

लेबनान के अलबेना समाचारपत्र ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि जब सऊदी अरब ने ईरान से वार्ता करना चाहा तो अमरीका ने उससे कहा कि इराक़, लेबनान और ईरान में प्रदर्शन आरंभ हो चुके हैं इस लिए हालात अमरीका व सऊदी अरब के लिए बेहतर होंगे इस लिए अभी ईरान से बात चीत न की जाए।

इस लेबनानी समाचर पत्र ने फ्रांस के एक सूत्र के हवाले से यह जानकारी दी है और लिखा है कि सऊदी अरब का मानना है कि ईरान व सऊदी अरब के मध्य वार्ता और व्यापक समझौता हो सकता है जिसमें यमन और लेबनान जैसे देशों के संकट भी शामिल किये जा सकते हैं।

रिपोर्ट में बताया गया है कि सऊदी अरब ने कहा था कि लेबनान पर हिज़्बुल्लाह के क़ब्ज़े का वह विरोध नहीं करेगा अगर यमन में हालात बेहतर हो जाएं अर्थात ईरान अगर यमन में अंसारुल्लाह को वार्ता और सत्ता में भागीदारी को स्वीकार करने पर तैयार कर ले तो उसे लेबनान में हिज़्बुल्लाह की भूमिका पर आपत्ति नहीं होगी। इसकी वजह भी यह थी कि सऊदी अरब यह नहीं चाहता कि आरामको जैसी कोई घटना फिर हो क्यों उससे सऊदी अर्थ व्यवस्था को काफी नुक़सान पहुंचा था।

ईरान और सऊदी अरब के संबंधों के बारे में इराक की अलबुरासा न्यूज़ एजेन्सी ने अपने एक विश्लेषण में लिखा है कि कुवैत, ओमान, क़तर, इराक़ और पाकिस्तान जैसे कई देशों ने ईरान और सऊदी अरब के बीच वार्ता का प्रयास किया लेकिन सफलता नहीं मिली और रियाज़, तेहरान से दूर भाग रहा है। इसके लिए वह भांति भांति के बहाने पेश कर रहा है और हर बार यही घिसा पिटा वाक्य दोहरा देता है कि ईरान को क्षेत्र में अपनी शैली और नीति को बदलना होगा लेकिन इस से आशय क्या है? इसके बारे में सऊदी अरब के घटकों तक को भी सही बात का पता नहीं है।


आरामको पर हमला सऊदी अर्थ व्यवस्था पर बड़ा अघात था

अस्ल कहानी यह है कि ईरान और सऊदी अरब की निकटता से अमरीका, इस्राईल और यूएई को काफी परेशानी हो सकती है। बहुत से टीकाकारों का कहना है कि ईरान और सऊदी अरब के मध्य निकटता की राह में यूएई बहुत बड़ी रुकावट है जो अमरीका और इस्राईल के इशारे पर यह काम कर रहा है।

टीकाकारों का कहना है कि अबूधाबी के क्राउन प्रिंस बिन ज़ायद, नेतेन्याहू और जान बोल्टन ने ईरान से निकट न होने की शर्त पर, मुहम्मद बिन सलमान को, सऊदी अरब में सत्ता तक पहुंचाया। इस लिए बिन सलमान, बिन ज़ाएद के आदेशों का पालन करने पर मजबूर हैं।

 

Iran’s President Mohammad Khatami welcomes then-Saudi Arabia Crown Prince Abdullah in Tehran in December 1997 [File: AP]

King Abdullah hand-in-hand with Iran’s President Ahmadinejad in Riyadh in 2007 [File: EPA]


Saudi Arabia cut off diplomatic relations with Iran in the aftermath of the 2016 attack on its embassy in Tehran, following Riyadh’s execution of Shia leader Nimr al-Nimr [File: EPA]

An Iranian analyst says Trump is seen as the wrong interlocutor between Iran and Saudi Arabia, because of his closeness with Riyadh [File: AP]

 

 

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