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क्या इस्लामी जगत को किसी और दुशमन की ज़रूरत है!

सऊदी अधिकारियों के बारे में यह बात आम हो चुकी है कि वह अपनी ज़िद नहीं छोड़ते चाहे इसके लिए उन्हें कितनी ही बड़ी तबाही क्यों न झेलना पड़ जाए।

जब से सलमान बिन अब्दुल अज़ीज़ सऊदी अरब के नरेश बने हैं और उनके बेटे तथा देश के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान को सारे अधिकार हासिल हो गए हैं उस समय से तो सऊदी अरब की नीतियां इस प्रकार की हो गई हैं कि उन पर कोई भी यहां तक कि सऊदी अरब के घटक भी भरोसा नहीं कर पा रहे हैं।

इस समय अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प की ओर से डील आफ़ सेंचुरी की घोषणा के बाद इस्लामी जगत के सामने मस्जिदुल अक़सा को बचाने का बहुत बड़ा दायित्व है। कुछ इस्लामी देश इस दायित्व को पूरी तरह महसूस भी कर रहे हैं लेकिन बड़े खेद की बात है कि इस बीच सऊदी अधिकारी और इमारात के अधिकारी बड़ी ख़तरनाक भूमिका निभा रहे हैं। इन देशों के अधिकारी फ़िलिस्तीन का साथ देना तो दूर फ़िलिस्तीनियों के हौसले पस्त करने में लगे हैं और उन्हें ट्रम्प की योजना के सामने सिर झुका देने का सुझाव दे रहे हैं।

इमारात के विदेश मंत्री अब्दुल्लाह बिन ज़ाएद ने तो न्यूयार्क टाइम्ज़ में लेख लिखा जिसका शीर्षक था कि फ़िलिस्तीनियों ने जब भी न में जवाब दिया है उन्हें नुक़सान उठाना पड़ा है। सवाल यह है कि ओस्लो समझौते के समय फ़िलिस्तीनी प्रशासन ने हां में जवाब दिया था मगर नतीजा क्या निकला? महमूद अब्बास फ़िलिस्तीन का नक़्शा दिखा रहे हैं कि किस तरह लगातार फ़िलिस्तीनी भूमियों को इस्राईल हड़पता रहा है।

सोमवार को सऊदी अरब के जिद्दा शहर में अमरीका की डील आफ़ सेंचुरी योजना पर चर्चा के लिए ओआईसी की बैठक हो रही है तो सऊदी अरब ने इस बैठक में भाग लेने से ईरानी प्रतिनिधिमंडल को रोक दिया ।

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अब्बास मूसवी ने बताया कि जिद्दा में ओआईसी के मुख्यालय में जो बैठक हो रही है उसमें ईरानी प्रतिनिधिमंडल को भाग लेने से सऊदी अरब ने रोक दिया है।

सच्चाई यह है कि फ़िलिस्तीन के बारे में ट्रम्प की योजना से सऊदी अरब, इमारात, बहरैन और ओमान पूरी तरह सहमत हैं और सऊदी अधिकारियों को भलीभांति पता है कि ईरान इस ख़तरनाक साज़िश का खुलकर विरोध कर रहा है यही नहीं ईरान की क़ुद्स फ़ोर्स के कमांडर इसमाईल क़ाआनी ने फ़िलिस्तीनी संगठनों से फ़ोन पर बात की है और कहा है कि ईरान फ़िलिस्तीनी संगठनों के साथ मिलकर डील आफ़ सेंचुरी योजना को नाकाम बनाने के लिए पूरी तरह तैयार है।

सऊदी अरब दिखावे के लिए कुछ भी कर ले लेकिन वह नहीं चाहता कि फ़िलिस्तीन के बारे में ट्रम्प की योजना का विरोध किया जाए। मगर सऊदी सरकार को इस सच्चाई को सामने रखना चाहिए कि पूरे इस्लामी जगत यहां तक कि ख़ुद सऊदी अरब की जनता का रुजहान यही है कि ट्रम्प की योजना को नाकाम बनाना है। जनता की इच्छाओं से टकराना सऊदी सरकार के भविष्य के लिए ठीक नहीं है।

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