सेहत

———जी हाँ, कोरोना वायरस से बचा जा सकता है———

Sant Sameer

चीन में ऐसा कहर बरपा है कि पूरी दुनिया भयाक्रान्त है। इसी को कहते हैं—एक मच्छर…! कोरोना वायरस तो ख़ैर मच्छर से भी छोटा है। इतना छोटा कि इसकी तुलना में मच्छर भी हाथी के बाप का बाप नज़र आएगा।

बहरहाल, ख़तरा तो ख़तरा, जो सच है और सामने दिख रहा है।

असल सवाल यह है कि कोरोना वायरस का ख़तरा क्या सचमुच इतना बड़ा है? मेरे हिसाब से ख़तरा बस दिख रहा है बड़ा, पर है बहुत छोटा। बात यह है कि समाधान समझ में न आए तो छोटी बीमारी भी बड़ी ही होती है। इस मामले में भी ऐसा ही है। दुनिया भर में सत्ता-प्रतिष्ठान की परेशानी यह है कि उसका सारा झुकाव सिर्फ़ एक पैथी एलोपैथी की तरफ़ है, इसलिए हर तरह की बीमारी का समाधान वह एलोपैथी में तलाशता है। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि दुर्घटना जैसी आपात् स्थितियों के लिए एलोपैथी का योगदान अप्रतिम है; लेकिन डॉक्टरी पढ़ने वालों को अगर दूसरी पैथियों की भी बुनियादी जानकारी दी जा रही होती, तो यह समझने में ज़्यादा मुश्किल नहीं थी कि महामारी जैसी स्थितियों का सामना करने के लिए एलोपैथी से कहीं ज़्यादा कारगर होम्योपैथी है। कारण साफ़ है। कोई भी नई क़िस्म की ख़तरनाक बीमारी फैलने पर एलोपैथी में तुरन्त दवा नहीं बनाई जा सकती। लम्बे शोध के बाद टीके वग़ैरह की सम्भावना बनती है। इसके उलट होम्योपैथी लाक्षणिक चिकित्सा है, इसलिए इसमें लक्षणों के आधार पर तुरन्त कारगर इलाज की सम्भावना बन जाती है। लक्षण जिस दवा से ठीक-ठीक मेल खा रहे हों तो वह दवा काम करेगी ही, भले अब तक वह किसी दूसरी बीमारी में इस्तेमाल की जाती रही हो। जिन बीमारियों में लक्षणों का उतार-चढ़ाव स्पष्ट पता चलता है, उनका इलाज होम्योपैथी में और भी आसान है। अब तक जो भी महामारियाँ फैली हैं, उनमें ऐसा ही रहा है।

कोरोना वायरस के मामले में जो लक्षण बताए जा रहे हैं, उनके हिसाब से अगर होम्योपैथी पर ध्यान दिया जाता तो किसी भी मरीज़ के मरने की नौबत नहीं आनी चाहिए थी। दुर्भाग्यपूर्ण है कि होम्योपैथी डॉक्टर कोई ऐसा प्रभावी सङ्घ अब तक नहीं बना सके हैं, जो वैश्विक स्तर पर ऐसी स्थितियों में कोई अपील जारी कर सके। यह बात ज़रूर है कि सिर्फ़ छींकें आना, नाक से पानी बहना, गले में खराश होना, खाँसी आना और बुख़ार वग़ैरह के नाम पर ही होम्योपैथी में पूरा इलाज सम्भव नहीं है। इन लक्षणों के बढ़ने-घटने की प्रकृति जानना ज़्यादा ज़रूरी है। अलबत्ता, इन लक्षणों के आधार पर बचाव के उपाय ज़रूर किए जा सकते हैं।

हिन्दी की मेरी यह पोस्ट चीन के लोग तो ख़ैर नहीं पढ़ेंगे, पर हिन्दुस्तान के जिन लोगों को कोरोना का भय सता रहा हो, वे आर्सेनिक अल्बम-200 (Ars Alb-200) और एनफ्लूएञ्जीनम-200 (Influenzinum-200) जैसी दो दवाओं की सिर्फ़ कुछ ख़ुराकों से अपना भय दूर कर सकते हैं। स्वाइन फ्लू वग़ैरह में कारगर ये दवाएँ इस मामले में भी काम करेंगी। पहले तीन दिन तक रोज़ एक बार एनफ्लूएञ्जीनम-200 की दो-तीन बूँदें जीभ पर टपका लीजिए; या अगर दवा गोलियों में हो तो चार-पाँच गोलियाँ जीभ पर रखकर चूस लीजिए। तीन-चार दिन के अन्तराल पर आर्सेनिक अल्बम को भी इसी तरह ले सकते हैं। वातावरण में महामारी का ख़तरा बना हुआ हो तो पन्द्रह-बीस दिन बाद चाहें तो ये दवाएँ एक बार फिर दोहरा सकते हैं। बस इतने से आपके शरीर में उपर्युक्त लक्षणों के ख़िलाफ़ रोग-प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने लगेगी और आप पर कोरोना वायरस बेअसर रहेगा। काश, चीन के लोगों को ये दवाएँ दी जा सकें तो लाखों-करोड़ों लोगों को भय के माहौल से बाहर निकाला जा सकता है। हिन्दुस्तानी लोगों की रसोई में मौजूद मसालों में से अदरक, काली मिर्च, दालचीनी और लौंग में ऐसे तत्त्व मौजूद हैं कि अगर गुड़ मिलाकर इनकी चाय बनाई जाय और दिन में दो-तीन बार ली जाय तो गले, फेफड़े और श्वसन नली से जुड़ी बीमारियों से बचे रहने में आसानी हो जाती है। इस नुस्ख़े में तुलसी और ज्वराङ्कुश के कुछ पत्ते भी मिला लीजिए तो और अच्छा…हालाँकि इसे बीमारी का इलाज मानने की भूल नहीं करनी चाहिए। यह तकलीफ़ों में सिर्फ़ थोड़ी राहत के लिए है। यहाँ यह बात ज़रूर ध्यान में रखिए कि मैं गोमूत्र टाइप की चीज़ों से कोरोना वायरस को हराने की सलाह नहीं दे रहा हूँ, जैसा कि कुछ गोभक्त लोग दे रहे हैं। बिना समझे-बूझे ऐसी सलाहों में फँसने का ख़तरा उठाना मूर्खता है। गोभक्ति का विरोध मैं नहीं कर रहा हूँ, पर बिना किसी निरीक्षण-परीक्षण के हर मर्ज़ का इलाज गोमाता को मान लेना बचपना है।

कोरोना वायरस से सङ्क्रमित हो चुकने के बाद इलाज का तरीक़ा दूसरा होगा। ऊपर वाली दवाओं की ज़रूरत भी पड़ सकती है, पर बीमारी के लक्षणों के उतार-चढ़ाव पर ठीक-ठीक नज़र रखकर ही सही इलाज सम्भव होगा। बस इतना समझिए कि जिस भी डॉक्टर को एकोनाइट, आर्सेनिक अल्बम, युपेटोरियम पर्फ, बेलाडोना, ब्रायोनिया, यूफ्रेशिया, एलियम सीपा, जेल्सीमियम जैसी दवाओं के लक्षणों का अच्छा ज्ञान होगा वह आपको ऐसी किसी भी बीमारी की गिरफ़्त से आसानी से बाहर निकाल सकता है। इसे कोई दावा न समझें और न ही यह कोई रामबाण इलाज की घोषणा है। बात बस इतनी है कि यदि लक्षण सही-सही सामने आ रहे हैं और उन लक्षणों को अपने भीतर समाहित करने वाली कोई दवा मौजूद है तो समझिए कि उस दवा में प्रभु का वास है। इतिहास के पन्नों में दर्ज 1918 में फैली स्पैनिश फ्लू की उस महामारी के उदाहरण पर ध्यान दीजिए, जिसमें दुनिया भर में पाँच करोड़ से ज़्यादा लोग मारे गए थे। दिलचस्प है कि जिन लोगों का इलाज एलोपैथी से किया जा रहा था, उनकी मृत्यु दर 28.2 फ़ीसद थी, जबकि होम्योपैथी से इलाज कराने वालों की मृत्यु दर 1.05 फ़ीसद थी।

कोरोना वायरस से बचाव के लिए एक नई होम्योपैथी दवा भी बनाई जा सकती है। इस बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति के शरीर से थोड़ा-सा सीरम लेकर होम्योपैथी विधि से पोटेण्टाइज़ किया जाय तो हो सकता है कि एक प्रभावी दवा (नोसोड) सामने आ जाए। यह दवा टीके की तरह प्रिवेण्टिव का काम तो कर ही सकती है, मरीज़ों के इलाज में भी काम आ सकती है। अच्छी बात यह है कि दवा बनाना बेहद आसान है और इसे बनाने में ज़्यादा समय भी ख़र्च नहीं होगा।

सरकारें मेरी बातों पर तो ख़ैर क्या ध्यान देंगी, पर होम्योपैथी डॉक्टरों से ज़रूर यह अपील कर सकता हूँ कि आप कोई ऐसा उपाय सोचिए कि ऐसे सङ्कट-काल में आपकी भी कोई प्रभावी आवाज़ बन सके। मेरा वश चले तो मैं स्कूलों में हर विषय के विद्यार्थी के लिए ही शरीर रचना-विज्ञान और स्वास्थ्य-रक्षा की बुनियादी बातों की शिक्षा अनिवार्य कर दूँ।

याद रखने की बात है कि पैथियों की ज़िदों ने भी आजकल साम्प्रदायिक कट्टरता-जैसा रूप ले रखा है। हर पैथीवाला अपनी पैथी को ही सम्पूर्ण समाधान के रूप में पेश करता है। मेरा मानना है कि सच्चा स्वास्थ्य जिससे भी मिले, उसे अपनाने में हिचकना नहीं चाहिए। वैसे भी अलग-अलग पैथियाँ प्रकृति या ईश्वर ने नहीं बनाई हैं, चीज़ों को हमीं ने ख़ानों बाँटा है।

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