इतिहास

मशहूर सूफ़ी हुसैन बिन मंसूर हल्लाज : पार्ट 1

ईरान में तीसरी हिजरी क़मरी के मशहूर सूफ़ी हुसैन बिन मंसूर हल्लाज के बारे में बताने जा रहे हैं जिन्होंने अपने जीवन, अपनी बातों यहां तक कि अपनी मौत से दुनिया में ऐसी हलचल पैदा की कि अभी भी शताब्दियां बीतने के बाद भी ईरानी व पश्चिमी शोधकर्ता उनके बारे में लिख रहे हैं।

ईश्वर की याद में मगन रहने वाली ऐसी हस्ती, जिसकी बातों ने ईरान, भारत, तत्कालीन तुर्किस्तान, चीन और माचीन के शहरों में बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित किया।

प्राचीन फ़ारसी में मौजूदा चीन के सिन कियांग राज्य के अलावा क्षेत्रों को माचीन कहते थे।

पश्चिम एशिया के विशेषज्ञों सहित दूसरे विशेषज्ञों ने हुसैन बिन मंसूर हल्लाज को पहचनवाने के लिए जितनी भी कोशिश की, उसके बावजूद अभी भी उनकी वास्तविक शख़्सियत बहुत से आयाम से स्पष्ट नहीं है। हल्लाज की शख़्सियत को समझने में मुश्किल की वजह यह है कि वह ईश्वर के प्रेम इतना डूबे हुए थे कि इस प्रेम के नतीजे में उनके सामने आत्मज्ञान व अध्यात्मक के नए क्षितिज खुल गए थे। उन्हें ऐसे गूढ़ रहस्यों का पता चल गया था जिसकी वजह से उन्हें हल्लाजुल असरार अर्थात गूढ़ बातों की गुत्थियां सुलझाने वाला कहा जाता था ऐसे रहस्य जिनके चिन्ह उनके जीवन, उनकी बातों और उनके कर्मों से समझे जा सकते हैं। हुसैन बिन मंसूर हल्लाज के बारे में बहुत से शोधकर्ताओं ने शोध किए हैं लेकिन फ़्रांसीसी पूर्वविद लुई मासिन्यून ने उनके बारे में सबसे गहन शोध किया और इस बारे में उनकी रचनाएं बहुत अहमियत रखती हैं।

हल्लाज का अस्ली नाम हुसैन और उनके पिता का नाम मंसूर था। प्राचीन किताबों व स्रोतों में हल्लाज की पैदाइश का कोई उल्लेख नहीं मिलता। इस्लामी इनसाइक्लोपीडिया में उनके जन्म का साल 244 हिजरी क़मरी बराबर 858 ईसवी बताया गया है। फ़्रांस के तीन पूर्व विद लुई मासिन्यून ने अपनी किताब कि जिसके नाम का हिन्दी अवतरण हल्लाज की मुसीबतें है, हेनरी कॉर्बिन ने इस्लामी दर्शनशास्त्र के इतिहास और रोजे ऑर्नल्ड ने हल्लाज का मत नामक किताब में हल्लाज के जन्म का साल 244 या इसके आस पास माना है लेकिन इनमें से किसी भी किताब में इस दावे की सच्चाई में कोई दस्तावेज़ पेश नहीं किए हैं। ऐसा लगता है कि हल्लाज के जन्म दिवस का साल अनुमान पर आधारित है जिसके ज़रिए शोधकर्ताओं ने हल्लाज के जीवन की घटनाओं का अनुमान लगाया है। कुछ स्रोतों जैसे जामी की नफ़हातुल उन्स किताब और हल्लाज के बारे में की गयी शायरी में हल्लाज का जन्म दिवस 248 हिजरी क़मरी बताया गया है।

हल्लाज का जन्म फ़ार्स प्रांत के बैज़ा शहर के उपनगरीय भाग में स्थित तूर नामक गांव में हुआ था। वह बचपन में ही अपने परिवार के साथ इराक़ के वासित शहर पलायन कर गए। हल्लाज शब्द का अर्थ रूई को बीज से अलग करने या रूई धुनने के हैं। शुरु में उनकी यही उपाधि थी और धीरे धीरे उनका अस्ल नाम उनकी उपाधि के सामने दब गया।

फ़्रांसीसी पूर्वविद लुई मासिन्यून ने हल्लाज का हल्लाज नाम होने का कारण वह बस्ती बताया है जहां मंसूर बिन हल्लाज पैदा हुए जो इस्लामी शासन काल में कपड़ा बुनने के अहम क्षेत्रों में रहा है। हुसैन बिन मंसूर के पिता भी टेक्सटाइल उद्योग में काम करते थे, इसी वजह से उन्हें हल्लाज कहते थे। लेकिन यह मासिन्यून का व्यक्तिगत दृष्टिकोण है क्योंकि उनके इस दृष्टिकोण का ऐतिहासिक दृष्टि से कोई ठोस आधार व तर्क नहीं है।

इबने ख़लकान ने अपनी किताब “वफ़यातुल आयान” में हुसैन बिन मंसूर को हल्लाज कहे जाने के बारे में एक घटना का उल्लेख किया है। वह कहते हैं कि हल्लाज जब वासित शहर पहुंचे तो काम करने के लिए जिस पहली दुकान में दाख़िल हुए थे उसमें रुई के धुनी जाती थी। उन्होंने दुकानकार से उसकी मदद करने के लिए काम का अनुरोध किया। दुकानदार ने अपनी दुकान और सराय मंसूर हल्लाज को दिखाई जिसमें रूई भरी हुयी थी और उन्हें काम देने से मना कर दिया लेकिन हल्लाज ने उन्हें वचन दिया कि वह उनका काम पूरा कर दिखाएंगे। वह व्यक्ति बाहर गया और जब पलटा तो उसने देखा कि तक़रीबन साढ़े 9 टन रूई धुनी हुयी तय्यार थी। उसी दिन से हुसैन बिन मंसूर को हल्लाज कहा जाने लगा।

छठी हिजरी क़मरी के मशहूर ईरानी शायर व आत्मज्ञानी अत्तार नीशापूरी ने भी अपनी किताब तज़केरतुल औलिया में लिखा हैः “उन्हें हल्लाज इसलिए कहा जाता था कि एक बार वह रूई एक ढेर के पास से गुज़रे, उसे इशारा किया तो उसमें से रूई का दाना बाहर निकल आया, लोग यह देख कर हैरत में पड़ गए।” इसी तरह इतिहास में है कि चूंकि हुसैन बिन मंसूर के पिता रूई धुनते थे, उन्होंने भी इसी पेशे को अख़्तियार किया, इसी वजह से वह भी हल्लाज के नाम से मशहूर हुए। कुछ शोधकर्ताओं जैसे निकलनसन का मानना है कि हुसैन बिन हल्लाज रूई की धुनाई से अपना जीवन यापन करते थे इसलिए उनकी उपाधि इसी पेशे पर पड़ी। लेकिन रूई धुनने के अलावा उनकी उपाधि के कई दूसरे तर्क भी दिए गए हैं।

मासिन्यून ने अपनी किताब में इनमें से कुछ दृष्टिकोणों की ओर इशारा किया है। लुई मासिन्यून के अनुसार, हुसैन बिन मंसूर लोगों को उनके दिलों की बात बता देते थे इसलिए उन्हें हल्लाजुल असरार अर्थात राज़ प्रकट करने वाला कहते थे।

मुसताली बुख़ारी के अनुसार, हुसैन बिन मंसूर को इस वजह से हल्लाज कहते थे कि वे लोगों के दिल की बात इस तरह बाहर निकलवा लेते थे जिस तरह रूई धुनने वाला रूई से उसके दाने को बाहर निकालता है। इब्ने कसीर ने अपनी किताब में लिखा है कि अहवाज़ के लोग हुसैन बिन मंसूर को इसिलए हल्लाज कहते थे क्योंकि वह लोगों के मन से अवगत थे और जब लोग उनसे कहते कि उनके दिल की बात बताएं, तो वह बता देते थे।

हल्लाज की कई और उपाधियों जैसे अबुल मुग़ीस, अबुल मेहर, अबुल मुईन और अबु अब्दिल्लाह ज़ाहिद का उल्लेख मिलता है। ये उपाधियां ईरान, भारत, चीन, माचीन, तुर्किस्तान और बग़दाद में उनके मुरीदों व शिष्यों ने उन्हें दिया।

ऐसा लगता है कि हल्लाज की अनेक उपाधियों की वजह उनके चमत्कारिक कर्म थे, या इसलिए भी हो सकता है कि वह लोगों के बीच अज्ञात रहना चाहते थे। प्रत्येक दशा में यह स्पष्ट नहीं है कि उन्होंने यह उपाधियां अपने लिए ख़ुद चुनी थीं या लोग उन्हें इन उपाधियों से पुकारते थे।

हल्लाज जब छोटे थे तभी उनके पिता इराक़ के वासित शहर पलायन कर गए जो बसरा और कूफ़े के बीच स्थित है। यह शहर रणनैतिक दृष्टि से अहम होने के साथ कृषि और व्यापार की नज़र से भी बहुत अहम था। ऐसा लगता है कि हल्लाज को इस शहर से बहुत ज़्यादा लगाव नहीं था जिसमें उनका बचपन गुज़रा था। जब वह 16 साल के थे तो देश में अश्वेत ग़ुलामों के विद्रोह से अस्त व्यस्त हालात की वजह से वह वासित से अहवाज़ चले गए। हल्लाज ने अहवाज़ में सहल बिन अब्दुल्लाह तुस्तरी का शिष्य बनने का सौभाग्य हासिल किया। सहल तुस्तरी तीसरी हिजरी क़मरी के मशहूर सूफ़ी थे जिनके बारे में हजवीरी ने अपनी किताब कश्फ़ुल महजूब में लिखा है कि उनके मत का नाम सहलिया था। हल्लाज ने आत्मज्ञान व अध्यात्मा का पहला चरण अब्दुल्लाह तुस्तरी की सेवा में सीखा। हालांकि बाद में हल्लाज के मत और सहल के मत में मतभेद पैदा हुआ लेकिन हल्लाज ने सूफ़ीवाद के नियम सहल तुस्तरी से सीखे, ख़ास तौर पर कठिन तपस्या उनसे सीखी।

हल्लाज अपने जिज्ञासू मन की वजह से एक जगह पर एक उस्ताद के पास नहीं रुक पाते थे। यही वजह है कि वह सहल बिन अब्दुल्लाह तुस्तरी के जीवित होने के बावजूद, सूफ़ीवाद की रस्म के विपरीत 262 हिजरी क़मरी में अपने उस्ताद को छोड़ कर अम्र बिन उस्मान मक्की की संगत से लाभान्वित होने के लिए निकल पड़े और बग़दाद पहुंचे जो उस समय सूफ़ीवाद का गढ़ था। इस तरह हल्लाज भी अम्र बिन उस्मान मक्की के मुरीदों में शामिल हो गए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *