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वो दिन कि जिसका वादा है : ये क़ाफ़िला फ़िलिस्तीन जेरुशलम में स्वतन्त्रता सेनानी मौलान मोहम्मद अली जौहर के जनाज़े का है!हम भी देखेंगे!

मुग़ल बादशाह बाबर ने अपनी वसियत में अपने बेटे हिमायुं से कहा-
“शिया-सुन्नी झगड़ों की तरफ से आंख मूंद लो वरना इस्लाम कमजोर होगा। सल्तनत के अलग-अलग फिरके जिस्म के चार हिस्से की तरह हैं सल्तनत की सेहत इनके तालमेल पर टिकी है”

यही तालमेल आज खत्म हो चुका है। कोई शिया लीडर मारा जाता है तो सुन्नी ख़ुश होते है कोई सुन्नी लीडर मारा जाता है तो शिया ख़ुश होते हैं। पर उन नादानों को ये नही पता इससे इस्लाम कमज़ोर पड़ता है बाबर दूरदर्शी था आज वो बात सच साबित हो रही।

मुग़ल सल्तनत का सबसे ताक़तवर कमांडर बैरम खान भी शिया ही थे मुग़लों के साथ कई जंगें लड़ी बाबर ने बैरम को बेटे की तरह पाला हिमायुं के दोस्त बनकर रहे और अक़बर की एक पिता की तरह हिफ़ाज़त की जबतक बालिग नही हो गए।

शिया सुन्नी का झगड़ा तो कभी था ही नही। हमेशा से दोनो साथ मिलकर जंगें लड़ी हैं। शिया सुन्नी के अक़ीदों में हमेशा इख़्तेलाफ़ था और रहेगा। लेकिन इन इख़्तेलाफ़ के बावज़ूद शिया सुन्नी हमेशा साथ रहे, साथ साथ लड़े, और साथ मरे…

ये सब सिर्फ इसलिए लिखना पड़ा कल क़ासिम सुलेमानी पर पोस्ट की थी। जिसपर कुछ लोगो ने बहस शुरू कर दी। शायद उन्हें ये नही पता की गल्फ में जितनी भी जंग हुई सब सत्ता और ज़मीन और तेल के लिए हुई शिया सुन्नी के लिए नही। ईरान-इराक़ 10 साल तक लड़ते रहे सिर्फ अमेरिका द्वारा फैलाई गयी तेल के भण्डार की अफवाह की वजह से।

आखिरकार जब सद्दाम हुसैन ने इस जंग का ज़िम्मेदार अमेरिका को ठहराया और उनके खिलाफ़ बग़ावत की तो सद्दाम हुसैन को भी साज़िश के तहत मार दिया गया। कभी क़ासिम सुलेमानी भी अमेरिका के साथ जंग लड़ा करते थे लेकिन जैसे ही बग़ावत की तो इनको भी..

कौन थे क़ासिम सुलेमानी? अमेरिकी हमले में मारे गए सुलेमानी ईरान के न०1 कमांडर थे। ISIS को भगाने में मुख्य भूमिका निभाई थी पिछले कई महीनों से ईराक़ में अमेरिकी फॉज़ों के खिलाफ़ लगातार कार्यवाही कर रहे थे।

सीरिया में कुर्दिश सेना को भी लीड कर रहे थे वही कुर्दिश सेना जिसे कभी सुल्तान अय्यूबी रहमतुल्लाह एलैह लीड किया करते थे वो ख़ुद एक कूर्द थे और सुल्तान अय्यूबी ने पूरे यूरोप तक राज किया था मस्ज़िद ए अक़्सा ईसाइयों से आज़ाद करवाई थी।

मस्ज़िद ए अक़्सा को दोबारा आज़ाद कराना सुलेमानी के एजेंडा में था जिसके तहत लगातार वो इज़राइल सेना को टार्गेट कर रहे थे इसराइल के खिलाफ़ लड़ने वाले हमास को सपोर्ट भी कर रहे थे। सीधे तौर पर क़ासिम सुलेमानी इज़राइल और अमेरिका के दुश्मन थे और निशाने पर थे। जिसके वजह से अमेरिका ने उनपर हमला किया।

 

यह काफ़िला फिलिस्तीन जेरुशलम में स्वतन्त्रता सेनानी मौलान मोहम्मद अली जौहर के जनाज़े का है, 4 जनवरी 1931 को इंतेक़ाल हुआ। तब जेरुशलम इजराइल का हिस्सा नही था। जेरुशलम के मुफ़्ती अमीनुल हुस्सैनी ने मौलाना के जनाज़े की नमाज़ पढ़ाई।

मौलाना लगातार जेल जाने की वजह से सेहत ख़राब हो गई। डायबिटीज के मरीज थे जेल में सही खाना न मिलने की वजह से बीमार पड़ गए। 1930 में जब जेल से बाहर निकले तो बहुत ही ज़्यादा बीमार थे उसके बावज़ूद देश की आज़ादी के लिए वो लंदन की गोलमेज कांफ्रेंस में भाग लेने गए और अपने आखरी भाषण में कहा

“मेरे मुल्क को आज़ादी दो या मेरे कब्र के लिए मुझे दो गज जगह दे दो क्योंकि यहां मै अपने मुल्क की आज़ादी लेने आया हूं।”

उस वक़्त अंग्रेजों ने उनकी बात नही मानी और कुछ महीनो बाद ही लन्दन में उनका इंतेक़ाल हो गया। उनके चाहने वाले उन्हें लन्दन से जेरुशलम ले गए और वही सुपुर्द ए खाक़ कर दिया गया।


जनरल ज़ियाउल हक़ ने पाकिस्तान में साड़ी पहनने पर रोक लगा दी थी यहां तक कि किसी को काले कपड़े पहनने की भी इजाज़त नही थी ताकि कोई उनका विरोध ना कर सके। इसके बावजूद इक़बाल बनो साड़ी पहनतीं है वो भी काली और हजारों लोगों के बीच तानाशाही के खिलाफ़ लाहौर में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की यही नज़्म पढ़ती हैं। जिसकी आज भारत सरकार ने जांच का आदेश दे दिया है

हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
जो लोह-ए-अज़ल में लिखा है
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां
रुई की तरह उड़ जाएँगे
हम महक़ूमों के पाँव तले
ये धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हक़म के सर ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएँगे
हम अहल-ए-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएँगे
सब ताज उछाले जाएँगे
सब तख़्त गिराए जाएँगे

इस नज़्म में फ़ैज़ ने तानाशाह को बुत कहा है जिसे लगता था जो भी हूं मैं ही हूं यहां वही चलेगा जो मैं चाहूंगा। इस नज़्म के लिए फ़ैज़ को जेल में डाल दिया गया यहां तक की मुल्क़ बदर कर दिया गया।

जब ये नज़्म आई आई टी कानपुर में पढ़ी गयी तो सरकार ने एंटी हिंदू बताकर जांच का आदेश दे दिया। फ़ैज़ ने ये नज़्म किसी हिंदू के खिलाफ़ नही लिखी थी उन्होंने अपने तानाशाह ज़ियाउल हक़ के खिलाफ़ लिखी थी। लिखने वाला भी मुसलमान था, जिसके खिलाफ़ खिलाफ़ लिखा गया वो भी मुसलमान था और वो देश भी मुसलमान था। तो सरकार इस नज़्म को हिंदू मुस्लिम मुद्दा बनाकर क्यो बना रही?

कब तक आप अपनी नाकामयाबियों को हिन्दू मुसलमान की आड़ में छिपाते रहेंगे? असल में ये नज़्म हुक़ूमत पर सवाल खड़े करती है, ये नज़्म ज़ुल्म और तानाशाही के खिलाफ़ लिखी गयी थी और जब जब तानाशाही होगी ऐसी नज़्में पढ़ी जाती रहेंगी…

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