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सीरिया और तुर्की के बीच शुरू हो गई है सीधी लड़ाई!

सीरिया और तुर्की के बीच शुरू हो गई है सीधी लड़ाई, जब फ़िलिस्तीन की ओर अमरीका और इस्राईल के ख़ूनी पंजे बढ़ रहे हैं तो इन हालात में दमिश्क और अंकारा का आपस में लड़ना कहां तक दुरुस्त है?

तुर्की ने दावा किया है कि सीरिया के भीतर इदलिब के इलाक़े में तुर्क सेना की चेकपोस्टों पर सीरियाई सेना के हमले में 5 तुर्क सैनिकों के मारे जाने के बाद तुर्की की सेना के हमले में 101 सीरियाई सैनिक मारे गए हैं। सीरियाई सेना तुर्की के दावे को ख़ारिज करती है।

यह सीरिया और तुर्की के बीच सीधे युद्ध का मामला है। सीरिया संकट को 9 साल का समय हो रहा है लेकिन पहली बार देखने में आ रहा है कि सीरियाई और तुर्क सैनिकों के बीच सीधा टकराव हुआ है। इससे पहले तक तुर्की अपने प्राक्सी संगठनों की मदद से सीरियाई सेना और सरकार के ख़िलाफ़ हमले करवाता रहा है। आतंकी संगठन घोषित हो चुके अन्नुस्रा फ़्रंट को तुर्की का क़रीबी घटक माना जाता है जिसकी मदद से तुर्की ने सीरिया के कुछ शहरों पर क़ब्ज़ा कर रखा है।

इस समय लड़ाई शुरू हो चुकी है और अगर इसे तत्काल रोका न गया तो इसका दायरा बढ़ जाएगा। इस मामले को कंट्रोल करने के लिए अंकारा में तुर्की और रूस के प्रतिनिधिमंडलों की बातचीत हुई लेकिन कोई नतीजा नहीं निकल सका। सीरियाई सेना इदलिब के आसपास के महत्वपूर्ण इलाक़ों को अन्नुस्रा तथा अन्य चरमपंथी संगठनों से आज़ाद करा चुकी है और अब इदलिब शहर की बारी है जिस पर अन्नुस्रा फ़्रंट का क़ब्ज़ा है। तुर्की की अर्दोग़ान सरकार को यह महसूस हो रहा है कि यदि अन्नुस्रा जैसे संगठन समाप्त हो गए तो सीरिया में उसका कोई प्राक्सी संगठन नहीं बचेगा इसलिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आतंकी संगठन घोषित हो चुके अन्नुस्रा फ़ंट को बचाने के लिए तुर्की युद्ध पर उतारू हो गया है। जहां तक सीरियाई इलाक़ों को चरमपंथियों से आज़ाद कराने की बात है तो यह सीरियाई सेना का दायित्व और अधिकार है।

तुर्की ने रूसी प्रतिनिधमंडल के सामने मांग रखी कि सीरियाई सेना इदलिब को आज़ाद कराने के लिए आप्रेशन न करे और उन शहरों से पीछे हट जाए जिन्हें उसने हालिया दिनों में आज़ाद कराया है। रूसी प्रतिनिधिमंडल ने इस मांग को ठुकरा दिया। इसका मतलब यह है कि सीरिया ही नहीं रूस जैसे उसके घटकों ने भी फ़ैसला कर लिया है कि सीरियाई शहरों को अब चरमपंथियों के क़ब्ज़े से आज़ाद कराना है क्योंकि इस मामले में तुर्की अपने वादों पर अमल नहीं कर रहा है।

हमारी समझ में यह बात नहीं आती कि सीरियाई सेना अगर ख़ान शैख़ून, मअर्रतुन्नोमान और सुराक़िब को अपने नियंत्रण में लेकर एलेप्पो-दमिश्क़ राजमार्ग को खोलती है तो इसमें तुर्की को आपत्ति करने की क्या ज़रूरत है। क्या अर्दोग़ान यह बर्दाश्त करेंगे कि तुर्की के शहरों पर वहां के अलगाववादी कुर्दों का क़ब्ज़ा हो जाए?

अमरीका के विशेष दूत ने तुर्क राष्ट्रपति अर्दोग़ान से मुलाक़ात की है। शायद अर्दोग़ान को अमरीकी मदद का आश्वासन दिया गया है और अर्दोग़ान इस पर संतुष्ट हो गए हैं। मगर अर्दोग़ान को याद रखना चाहिए कि पश्चिमी देशों को उनसे कोई हमदर्दी नहीं है। अगर उन्हें मौक़ा मिला तो वह अर्दोग़ान को डंक मारने से नहीं चूकेंगे।

सीरियाई सेना ने साफ़ कर दिया है कि वह इदलिब और शेष शहरों को चरमपंथियों के नियंत्रण से आज़ाद कराके रहेगी अब अगर अर्दोग़ान इसमें रुकावट डालते हैं तो यह लड़ाई बढ़ेगी।

अफ़सोस इस बात का है कि यह लड़ाई एसे समय हो रही है जब अमरीका और इस्राईल ग़द्दार अरब सरकारों के साथ मिलकर फ़िलिस्तीन को निगल जाना चाहते हैं। नौबत यह आ गई है कि तुर्की ने सीरियाई सेना पर हमले के लिए इस्राईल की मदद भी ली है। तो क्या वह फ़िलिस्तीन के मामले में बड़े बड़े बयान देने से आगे बढ़कर फ़िलिस्तीन के लिए कोई व्यवहारिक क़दम उठाने की स्थिति में रहेंगे?!

साभार रायुल यौम

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