सेहत

अमेरिका का जैविक आतंकवाद : एबोला और एड्स जैसे ख़तरनाक़ वाइरस अमेरिका ने फैलाये थे : रिपोर्ट

जबसे अफ्रीकी देशों विशेषकर गिनी, सियरालियोन और लाइबेरिया में एबोला वाइरस फैला है तबसे इस संबंध में विभिन्न बातें कही जाती रही हैं।

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि एबोला केवल एक वाइरस है जो पर्यावरण की परिस्थिति के कारण अफ्रीकी देशों में फैला है जबकि इसके विपरीत कुछ दूसरे विशेषज्ञों का मानना है कि यह वाइरस अमेरिकी सरकार के जेनेटिक कृत्यों से अफ्रीका में फैला है और इससे वह विभिन्न लक्ष्यों व हितों को साधना चाहती है।

एबोला वाइरस के बारे में प्रकाशित कुछ रिपोर्टें और शोध इस बात के सूचक हैं कि यह एक प्राकृतिक बीमारी है और इसके प्रसार में इंसान की कोई भूमिका नहीं है। इन शोधों के अनुसार यह बीमारी 26 दिसंबर 2013 को गिनी के एक छोटे से गांव में फैली परंतु 21 मार्च 2014 तक उसकी पहचान एबोला वाइरस के रूप में नहीं हुई थी जबकि इस संबंध में होने वाले कुछ शोध इस बात के सूचक हैं कि एबोला वाइरस का पहला नमूना अफ्रीका के पश्चिम में स्थित मिलियान्डो नामक गांव में 18 महीने के एक बच्चे में मिला था। यह गांव जंगली क्षेत्र गियूकेडू में स्थित है। कुछ शोध इस बात के सूचक हैं कि इस क्षेत्र के 80 प्रतिशत जंगलों के खत्म होने की वजह से इस वाइरस से संक्रमित जानवरों और चमगादड़ों को इस क्षेत्र में देखा गया और सोचा यह जाता है कि यह वाइरस इन जानवरों से फैला है। इसी प्रकार कहा जाता है कि इस वाइरस ने सबसे पहले उस बच्चे को लक्ष्य बनाया जो अपने घर के आंगन में खेल रहा था। उस बच्चे के आंगन के समीप एक खोखला पेड़ था जो चमगादड़ों से भरा था यहां तक कि वर्ष 2014 के जनवरी के दूसरे सप्ताह तक इस बच्चे के परिवार के कई सदस्यों को एबोला वाइरस ने लक्ष्य बनाया और उन सबको गियूकेडू के अस्पताल में भर्ती करा दिया गया और बाद के सप्ताहों में यह बीमारी और फैली और इस बीमारी के कारण कई लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा

पास्चर इंस्टीट्यूट ने 22 मार्च 2014 को गिनी में एबोला वाइरस के होने की पुष्टि की और 23 मार्च 2014 को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आधिकारिक रूप से अपनी वेबसाइट पर एबोला वाइरस के फैलने की घोषणा की।

इस आधार पर एक दृष्टिकोण यह है कि एबोला वाइरस जानवरों से फैला है जबकि इसके विपरीत एक दूसरा दृष्टिकोण यह है कि यह वाइरस जानवरों से नहीं बल्कि अमेरिकी सरकार के जेनेटिक कृत्यों से अफ्रीका में फैला है। इसकी आड़ में अमरीका कई लक्ष्यों को साधने की चेष्टा में है। अफ्रीका के पश्चिमर लाइबेरिया में सबसे बड़े समाचार पत्र डेली आबज़रवर ने वर्ष 2014 में एक वैज्ञानिक शोध प्रकाशित किया था जिसके अनुसार अमेरिका ने एबोला वाइरस को बनाया और फैलाया है। इसी प्रकार समाचार पत्र आबज़रवर ने लिखा कि अमेरिका ने एक सहमति के अंतर्गत गोपनीय ढंग से एबोला वाइरस को बनाया और फैलाया और इस चीज़ को उसने अपनी कार्यसूची में शामिल कर रखा है। इस समाचार पत्र ने लाइबेरिया में संक्रामक रोगों के एक विशेषज्ञ प्रोफेसर सीरियल ब्राडरिक का एक लेख प्रकाशित किया और इस बात का रहस्योद्घाटन किया है कि एबोला, जेनेटिक बनावट का नया रूप है और अमेरिका की सैनिक कंपनी ने जैविक हथियार के रूप में इसे बनाया है। प्रोफेसर सीरियल ब्राडरिक अपने लेख में यह सवाल उठाते हैं कि क्या एबोला या एड्स जैसी बीमारियां अपने आप अस्तित्व में आई हैं या जानबूझ कर इन्हें बनाया गया है?


इबोला से मरने वाले रोगी को दफ़्न किया जा रहा है
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इस प्रकार के जैविक हथियारों का उत्पादन अमेरिका करता है और अफ्रीका में वाइरसों का परीक्षण और उनसे संबंधित टीकों का निर्माण भी वही करता है। इस आधार पर अफ्रीका, विशेषकर पश्चिम अफ्रीका में इस संबंध में बहुत सी साइटें बनाई गयी हैं ताकि वे विदित रूप से एबोला जैसी नई बीमारियों के बारे में लोगों को टीकों और उसके उपचार की जानकारियां दें और यह सारी साइटें और संस्थायें अमेरिका की निगरानी में काम करती हैं। प्रोफेसर सीरियल ब्राडरिक बल देकर कहते हैं कि इस संबंध में गोपनीय ढंग से समस्त परीक्षण अमेरिका की सैनिक कंपनी की ओर से अफ्रीकी देशों में होते हैं और अफ्रीका के संवेदनशील क्षेत्र के बारे में डाक्टर लियोनार्ड होरोवित्ज़ ने वर्ष 1998 में जो किताब लिखी है उसमें भी इस विषय को बड़ी आसानी से देखा जा सकता है कि किस तरह अमेरिका की सैनिक और औद्योगिक कंपनियां कुछ अफ्रीकी देशों के सहयोग से इन देशों की जनसंख्या को कम करने के लक्ष्य से गोपनीय ढंग से जैविक हथियारों का निर्माण कर रही हैं। प्रोफेसर ब्राडरिक अमेरिका में होरोवित्ज़ की किताब की अधिक बिक्री की ओर संकेत करते हुए कहते हैं” होरोवित्ज़ वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर इस बात का रहस्योद्घाटन करते हैं कि अमेरिका ने पहली बार ख़तरनाक एबोला वाइरस का परीक्षण कांगो स्थित ज़ईर में किया था और उसके बाद अमेरिका ने गिनी को जैविक विषाणुओं व हथियारों के प्रचार-प्रसार का केन्द्र बना दिया। प्रोफेसर ब्राडरिक अपने लेख के अंत में अफ्रीकी देशों के नेताओं का आह्वान करते हैं कि वे जैविक युद्ध और अत्याचार के खिलाफ उठ खड़े हों और अमेरिका और उसके घटकों को अपने लक्ष्यों तक न पहुंचने दें और अफ्रीका को चूहों का परीक्षण केन्द्र बनने की अनुमति न दें।

संक्रामक रोगों के विशेषज्ञ डाक्टर मिशेल मैडेन का मानना है कि अमेरिका एबोला वाइरस का प्रयोग एक जैविक हथियार के रूप में कर रहा है क्योंकि यह वाइरस बहुत तेज़ी से फैलता है और जो लोग इससे पीड़ित हो जाते हैं यह वाइरस उनकी जान भी ले लेता है और जिसके पास इस वाइरस का टीका होगा वह दूसरों पर अपनी इच्छाओं व दृष्टिकोणों को थोप सकता है।


अफ़्रीक़ा में फैले इबोला वायरस के पीछे अमरीका का हाथ था
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सियरालियोन में एबोला वाइरस से मुकाबले के लिए अमेरिकी कंपनी ज़ेम्प ने जो कैंप लगाया था उसमें मौजूद एक चिकित्सक “जान प्राइस ले” ने एबोला वाइरस से मुकाबले के लिए ग़ैर आधिकारिक तौर पर बनाये गये टीके की ओर संकेत करते हुए कहा था कि अमेरिकी संचार माध्यम विस्तृत पैमाने पर सबसे पहले एबोला वाइरस से चिंता उत्पन्न करने के बारे में प्रचार-प्रसार करेंगे और उसके बाद उसका उपचार बतायेंगे। बर्ड फ्लू के बारे में अमेरिकी संचार माध्यमों के क्रिया-कलापों को इसी दिशा में नमूने के रूप में देखा जा सकता है। यह अमेरिकियों के अमानवीय और अनैतिक व्यवहार का एक उदाहरण है और विश्व समुदाय ने भी इस संबंध में मौन धारण कर रखा है।

इस संबंध में वर्ष 2014 में एक रूसी पत्रिका ने एबोला वाइरस को अमेरिका का जैविक हथियार बताया और लिखा था कि अमेरिका ने 30 साल पहले ही इस वाइरस का टीका तैयार कर लिया था। इसी प्रकार उत्तर कोरिया के अधिकारियों ने अमेरिका को खतरनाक एबोला वाइरस को फैलाने का मास्टर माइंड बताया है। उत्तर कोरिया की समाचार एजेन्सी ने वर्ष 2014 में अपनी रिपोर्ट में घोषणा की थी कि अमेरिका ने जैविक युद्ध आरंभ करने के लिए एबोला वाइरस का पहला नमूना अफ्रीका के पश्चिमी देशों में तैयार कर लिया है। इसी प्रकार उत्तर कोरिया की समाचार एजेन्सी ने बल देकर कहा है कि उत्तरी कोरिया के क्रोधित लोग अमेरिका को अंतर्राष्ट्रीय अदालत में घसीटने और उस पर मानवाधिकारों के हनन के आरोप में मुकद्दमा चलाये जाने के इच्छुक हैं।

विशेषज्ञ आम जनमत का ध्यान इस बात की ओर दिलाना चाहते हैं कि अफ्रीका में खतरनाक एबोला वाइरस का जनक अमेरिका है। इलीनोइस (Ilinois) विश्वविद्यालय के डाक्टर फ्रांसीस बोएल (Francis Boyle) और डेलवेर (Delaware) विश्वविद्यालय के डाक्टर काइरिल ब्राडरिक (Cyril Broderick) का वैज्ञानिक तर्कों के आधार पर मानना है कि एबोला वाइरस अमेरिका की सैन्य कंपनी की उपज है। अपने शोधों के परिणामों को सार्वजनिक कर दिये जाने के कारण अमेरिकी संचार माध्यमों ने इन दोनों वैज्ञानिकों को अपने प्रचारिक हमलों का निशाना बनाया। डाक्टर बोएल से जब यह पूछा गया कि क्या एबोला वाइरस अफ्रीका में स्वास्थ्य संकट का परिणाम है तो उन्होंने अगीलिकी डिमोपोलू (Aggeliki Dimopoulou) वेबसाइट से साक्षात्कार में कहा कि यह कहना सही नहीं है। यह मात्र प्रोपगैन्डा है।

हमने जो शोध किया है उसके परिणाम में हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि यह एक जैविक युद्ध का नतीजा है जो पश्चिमी अफ्रीका के तट पर अमेरिकी परीक्षण केन्द्र से बाहर आया है और अगर आप बीमारियों को नियंत्रित करने वाले केन्द्र की भूमिका को देखेंगे तो पाएंगे कि पश्चिमी अफ्रीका के तटवर्ती क्षेत्रों में एबोला वाइरस के फैलने में अमेरिका का भूमिका है। इस आधार पर मैं समझता हूं कि ये परीक्षण केन्द्र एबोला वाइरस के फैलने के स्रोत हैं। डाक्टर बोएल से जब यह पूछा गया कि एबोला वाइरस से मुकाबले के संबंध में अमेरिका द्वारा सैनिक भेजने के बारे में आपका क्या कहना है तो उन्होंने कहा कि अमेरिकी सेना ने लाइबेरिया का अतिक्रमण किया है। अमेरिका ने वायु सैनिक भेजे हैं और ये सैनिक किसी को उपचार का प्रशिक्षण नहीं देते हैं। अमेरिकी सैनिक वहां हैं ताकि वे लाइबेरिया में एक सैनिक छावनी बना सकें। ब्रिटेन भी इसी प्रकार का कार्य सियरालियोन में कर रहा है। फ्रांस, माली और सेनेगल में मौजूद है। इस आधार पर पश्चिमी देश लोगों के उपचार के लिए अपने सैनिक नहीं भेजते हैं। लाइबेरिया विश्व विद्यालय के डाक्टर ब्राडरिक का भी मानना है कि एबोला वाइरस अमेरिका की युद्धक कंपनी की उपज है और उसका एक ख़तरनाक इतिहास है और गुप्त रूप से उस पर परीक्षण अफ्रीका में होता है।

डाक्टर “लियोनार्ड जी होरोवित्ज़” हारवर्ड विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त एक जाने- माने वैज्ञानिक हैं। वह एड्ज़ और एबोला वाइरस के बारे में कहते हैं कि मौजूद प्रमाण इस बात के सूचक हैं कि अमेरिकी वैज्ञानिक वर्ष 1960 के दशक में विभिन्न जानवरों के जेनेटिक को मिलाकर उस पर परीक्षण करते थे जिसके नतीजे में खून के कैंसर जैसी बीमारियां हो जाती थीं और ग्रस्त व्यक्ति मौत की नींद सो जाता था। डाक्टर होरोवित्ज़ इस संबंध में लिखी अपनी किताब के एक भाग में कहते हैं” एड्स और एबोला प्राकृतिक रूप से नहीं होते हैं। वह कहते हैं कि मैंने सरकारी दस्तावेजों और वैज्ञानिक रिपोर्टों पर 2500 से अधिक शोधों का यह नतीजा निकाला है कि एबोला और एड्स जैसे खतरनाक वाइरस स्वयं ही अस्तित्व में नहीं आये हैं और मैं अमेरिका और दुनिया के स्वतंत्र व चिंतित लोगों को आज़ाद छोड़ता हूं कि वे इस बात का निर्णय लें कि यह सब एक संयोगवश खतरा है या जनसंख्या को नियंत्रित व कम करने वाला गुप्त परीक्षण?

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