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कोरोना का ठीकरा ‘निज़ामुद्दीन’ पर फोड़ा जा रहा है : भारतीय मुसलमान इस देश का ऐसा अल्पसंख्यक समुदाय है जिसके सर पर हर एक नाक़ामी का ठीकरा फोड़ दिया जाता है

Wasim Khan
केवल सेकुलर दिखने के लिए ही सब चीजों में बोलना है, ये जरूरी नहीं है। क्या इन लोगों पर कोई कार्रवाई मुस्लिम होने के कारण हो रही है जो सबको बडी मिर्ची लगी है? क्या केजरीवाल या केंद्र का पुलिस प्रशासन धर्म के आधार पर कुछ कर रहा?

आप सब देख रहे कि क्या हालत हैं दुनिया के। फिर भी इतना बड़ा धार्मिक आयोजन? वो भी जब विदेश से भारत आ रहे लोगों पर कड़ी नजर थी। होली के समय ही कोरोना का इतना डर और एलर्ट था। फिर भी आपको ये सब करना ही है। मुझे याद है पिछले दिनों एक दोस्त ने जुमे की नमाज घर में पढने के लिए पोस्ट किया तो कैसे गरिया रहे थे कि सब अल्लाह की मर्जी है, हमें नहीं फर्क पड़ता है।

और रही बात संघियों की जो हिंदू मुस्लिम कर रहे, वो और तुम सब एक ही मानसिक बीमारी के शिकार हो। उनको भी हर बात के लिए जिम्मेदार मुस्लिम नजर आते हैं और तुमको भी हर गलती में मुस्लिम होने के कारण फंसाए जा रहे ये नजर आता है।

जैसे तुम हर बात पर कुछ बाबाओं की टोपागिरी के लिए गौमूत्र का तंज कसते हो वैसे वो भी। चाहे कोई फेक मैसेज ही क्यों न आ जाए कि फलाने देश में फलाने खान ने कोरोना के 500 मरीजों की जान बचाकर अपनी जान दे दी, और तुम लोग इमोसनल होकर शेयर कर देते हो, वैसे ही संघी भी 21 लोगों को मैसेज भेजने पर कोरोना खत्म होने का आशीर्वाद लेते हैं।

साफ बात समझ लो, इनकी गलती की वजह से उनमें से ही 10 से अधिक लोग मर चुके हैं, पहले बता दिया होता सब प्रशासन को तो सबका इलाज होता और इतने बडे देश में लोगों को खतरे में न डाल देते।

और हाँ धार्मिक वीजा भारत में नहीं मिलता सब टूरिस्ट वीजा पर आए थे धार्मिक कार्य के लिए। इसलिए अगर धार्मिक अंधता का विरोध करो तो सबका करो।
बाकी मीडिया को तो कुछ मन का मिला है इतने दिन बाद वो तो फुल फार्म में चिललाएगें ही।


Mehraj Tyagi
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आख़िरकार भारतीय मीडिया को वह कामियाबी मिल ही गई जिसकी उसे बीते सप्ताह से तलाश थी। अब कोरोना का ठीकरा ‘निज़ामुद्दीन’ पर फोड़ा जा रहा है। मीडिया सवाल नहीं उठाएगा, बल्कि ज़िम्मेदारी तय करेगा, कोरोना का ठीकरा फोड़ने के लिए वही सर मिल गया जिस पर किसी भी तरह का इलजाम लगाना ‘राष्ट्रभक्ती’ माना जाता है। अब यह सवाल नहीं होगा निज़ामुद्दीन मरकज़ ने तो 25 मार्च को ही प्रशासन को पत्र लिखकर बताया था कि मरकज से 1500 लोगों को भेजा जा चुका है मगर करीब 1000 लोग अभी भी वहां फंसे हैं, जिसके लिए वाहन पास जारी किए जाएं, साथ वाहनों की सूची भी लगाई गई थी मगर प्रशासन ने वाहन पास जारी नहीं किए। लेकिन इन सवालों से मतलब ही किसे है? जब मीडिया ने क़सम खाई हो कि मुसलमानों को ही इस देश की सबसे बड़ी समस्या साबित करना है तब तार्किता से उठाए गए जायज सवाल भी अपने मायने खो देते हैं।

बीती शाम ख़बर आई थी कि मरकज़ पर मुक़दमा दर्ज किया गया है। अब ज़रा गर्दन घुमाईए, और दो दिन पहले तक आनंद विहार बस अड्डे की तस्वीरों को देखिए हजारों की संख्या में मौजूद मजदूर दिल्ली से पलायन करने के लिए बसों के इंतजार में खडे रहे, इसका ज़िम्मेदार कौन है? क्या सरकार जिम्मेदार है? या फिर वे मकान मालिक जिम्मेदार हैं जिन्होंने इन मजदूरों को पलायन करने से नहीं रोका? क्या उन मकान मालिकों पर मुक़दमा दर्ज नहीं होना चाहिए? क्या सरकार इसकी ज़िम्मेदारी लेगी?


भारत में कोरोना से मरने वालों की संख्या अभी 32 है, लेकिन लाॅकडाउन की वजह से पैदल ही अपने गांवों को पलायन करने वाले जिन मजदूरों की अलग अलग हादसे में जान गई है उसकी संख्या 35 हो गई है। इसका ज़िम्मेदार कौन है?

मीडिया किस बारीकी से शब्दों से खेल रहा है उसे समझिए, मीडिया के मुताबिक़ मरकज़ में लोग ‘छिपे’ हुए हैं, लेकिन अयोध्या स्थित मंदिरों में श्रद्धालू ‘फंसे’ हुए हैं। दरअस्ल यह बोद्धिक आतंकवाद है। भारतीय मुसलमान इस देश का ऐसा अल्पसंख्यक समुदाय है जिसके सर पर हर एक नाकामी का ठीकरा आसानी से फोड़ दिया जाता है, जिस पर आरोप लगाना देशभक्ती है, और गाली देना राष्ट्रभक्त होने का सबूत है। कोरोना इस देश में उतनी तबाही नहीं मचा सकता जितनी तबाही भारतीय मीडिया और एक राजनीतिक विशेष महज एक महीने में मचा देता है। महज़ लाशें गिरना ही तबाही मचाना नहीं है, बल्कि किसी एक समुदाय के लोगों से दूसरे समुदाय के लोगों को आतंकित करना भी तबाही है। लेकिन यह तबाही लगातार जारी है, निज़ामुद्दीन मरकज़ से तबाही का एक और मौक़ा मिला है। जो कोरोना जैसी महामारी से भी अधिक ख़तरनाक है।

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