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कोरोना वायरस के पीछे एक भयानक साज़िश : वायरस पर काम करने वाली अमरीकी प्रयोगशाला को अचानक बंद किया गया!

हमें निष्पक्ष अंतर्राष्ट्रीय फ़ैसला चाहिए कि कोरोना वायरस अमरीकी है या चीनी? वायरस पर काम करने वाली अमरीकी प्रयोगशाला को अचानक क्यों बंद किया गया?

मैं इराक़ में जनरल क़ासिम सुलैमानी और अबू महदी अलमुहंदिस की हत्या का इंतेक़ाम लेने के लिए अमरीकी सैनिकों पर जारी हमलों के बारे में लेख लिखने की तैयारी कर रहा था कि अचानक एक दोस्त का फ़ोन आया जो बड़े अंतर्राष्ट्रीय वकीलों में गिने जाते हैं।

उन्होंने कहा कि इस बात की पूरी संभावना मौजूद है कि कोरोना वायरस के पीछे एक भयानक साज़िश हो और चीन, यूरोपीय देशों और ईरान को निशाना बनाने की कोशिश की जा रही हो ताकि इन देशों की अर्थ व्यवस्थाएं कमज़ोर हैं और अमरीका इसका फ़ायदा उठाए।

हमारे वकील दोस्त ने कहा कि विशेष रूप से मध्यपूर्व के इलाक़े में बहुत सी संदिग्ध घटनाएं एसी हैं जिनके बारे में बाद में पता चला कि वह गहरी साज़िश का नतीजा थीं। इनमें एक उदाहरण इराक़ के महाविनाश के हथियारों का है और दूसरा उदाहरण बोस्निया युद्ध के दौरान पश्चिमी सैन्य एलायंस के कमांडर का बयान है जिसमें उन्होंने कहा कि चार देशों को ध्वस्त कर देने की योजना है।

फ़्रांस के पूर्व विदेश मंत्री रोलान दोमा ने एक टीवी इंटरव्यू में कहा कि सीरिया युद्ध शुरू होने से दो साल पहले ब्रिटिश सरकार के कुछ प्रभावशाली लोगों ने उनसे संपर्क किया और सीरिया के बारे में अपने अनुभव शेयर करने की मांग की, जब फ्रांसीसी विदेश मंत्री ने कारण पूछा तो जवाब मिला कि सीरिया में सैनिक ताक़त से बुनियादी बदलाव करने की योजना है। मंत्री ने यह मांग ठुकरा दी।

हम वापस आते हैं कोरोना वायरस और इन दिन दिनों अमरीका और चीन के बीच जारी शाब्दिक युद्ध की ओर। शाब्दिक युद्ध चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के इस आरोप से शुरू हुआ कि अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए ने अपने सैनिकों के माध्यम से कोरोना वायरस वुहान शहर में फैलाया जहां वह विश्व सैनिक खेल प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए आए थे। शाब्दिक लड़ाई तब चरम पर पहुंच गई जब अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने कहा कि वह कोरोना वायरस को चीनी वायरस कहेंगे। अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पेयो ने भी कई बार यही शब्द इस्तेमाल किया। हालांकि यह नस्लवादी और बड़ी अनैतिक टिप्पणी है।

इस लड़ाई में नया अध्याय यह जुड़ गया कि चीनी विशेषज्ञों ने वाइट हाउस और कांग्रेस से मांग कर ली है कि वह फ़ोर्ट डेट्रिक प्रयोगशाला को बंद करने का कारण बताएं जो अमरीकी सेना के मेडिकल विभाग के अधीन है और वायरस रिसर्च पर काम करती है। यह लेबारट्री मैरीलैंड में है जिसे पिछले साल बंद कर दिया गया।

चीन के ग्लोबल टाइम्ज़ ने अपनी वेबसाइट पर चीनी विशेषज्ञों की मदद से एक लेख प्रकाशित किया है जिसमें पिछले साल अगस्त महीने में न्यूयार्क टाइम्ज़ में प्रकाशित होने वाले लेख का हवाला दिया गया है। न्यूयार्क टाइम्ज़ के लेख में बताया गया है कि फ़ोर्ट डेट्रिक प्रयोगशाला में जानलेवा वायरस पर जारी शोध को स्वास्थ्य आशंकाओं के चलते बंद कर दिया गया। वहां जिन वायरसों पर अमरीकी वैज्ञानिक शोध कर रहे थे उनमें हर प्रकार के कोरोना वायरस का सोर्स समझा जाने वाला वायरस भी शामिल था। प्रयोगशाला के प्रवक्ता ने उस समय राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर इस बारे में कोई भी जानकारी देने से इंकार किया था। उस समय एक अज्ञात वायरस से 38 हज़ार लोगों की जान गई थी मगर अमरीकी सरकार ने इस पर पर्दा डाला और कहा कि यह लोग इनफ़्लूएंज़ा से मरे हैं।

चीन के लोग हज़ारों साल से चमगादड़, कुत्ता, बिल्ली और चूहे खा रहे हैं मगर कभी कोरोना वायरस नहीं फैला था। यह बात सही है कि अमरीकी वैज्ञानिकों ने यह पता लगाया है कि चमगादड़ कोरोना वायरस का मुख्य स्रोत हैं मगर यह वायरस उससे इंसान में स्थानान्तरित नहीं होता यह विशेषज्ञों का मानना है।

हमारे मन में यह सवाल है कि यह वायरस उन्हीं देशों में ज़्यादा तबाही क्यों मचा रहा है जो अमरीका के प्रतिद्वंद्वी समझे जाते हैं जैसे चीन, ईरान, फ़्रांस, जर्मनी, स्पेन और इटली पर अमरीका की ओर से भारी दबाव है।

बहरहाल यह विशेषज्ञों का काम है कि वह तय करें कि यह वायरस कहां से आया, यह चीनी है या अमरीकी? जब तक इसकी जांच होकर नतीजा आए उस समय तक हम इसी बात को तरजीह देंगे कि चीन का आरोप सही हो सकता है क्योंकि अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प और उनकी सरकार पर हमें बिल्कुल भरोसा नहीं है।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार

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