सेहत

कोरोना से हो रही मौतों को कैसे किया जा सकता है कम، जानिये

कोरोना वायरस के शिकार हुए कई लोगों की जान सेप्सिस होने के चलते जा रही है। यह ऐसी स्थिति होती है जिसमें शरीर का प्रतिरोधी तंत्र अत्यधिक सक्रिय हो जाता है, लेकिन सेप्सिस होता कैसे है और इसके लक्षण व इलाज क्या हैं?

अगर किसी संक्रमण के चलते व्यक्ति का प्रतिरोधी तंत्र इतना अधिक सक्रिय हो जाए कि उसके कारण अंग ठीक से काम करना बंद कर दें तो ऐसी जानलेवा स्थिति को सेप्सिस कहते हैं। ऐसी ख़तरनाक प्रतिक्रिया के कारण शरीर के भीतर ऊतक नष्ट हो सकते हैं या फिर कई अंगों के काम करना बंद करने के कारण मौत भी हो सकती है। हाल ही में प्रसिद्ध लांसेट पत्रिका में छपे शोध से पता चलता है कि हर साल दुनिया भर में होने वाली मौतों में से एक चौथाई का कारण सेप्सिस ही होता है। 2015 का उदाहरण देखें तो केवल जर्मनी में ही अस्पतालों में मरने वाले क़रीब 15 प्रतिशत लोगों की मौत का कारण सेप्सिस दर्ज किया गया है, जो कि तमाम तरह के ख़तरनाक कैंसर के कारण होने वाली मौतों से भी ज़्यादा है। इतनी बड़ी जानलेवा स्थिति होने के बावजूद इसके बारे में जानकारी और जागरुकता का बहुत अभाव दिखता है। जर्मन सेप्सिस फाउंडेशन की सलाह है कि लोगों को इन्फ्लूएंज़ा वायरस और न्यूमोकॉक्कस के ख़िलाफ़ टीका लगवाना चाहिए। कमज़ोर प्रतिरोधी तंत्र वाले नवजात बच्चों और डायबिटीज़, कैंसर, एड्स और दूसरी गंभीर बीमारियों से ग्रस्त बुज़ुर्गों को तो इससे अधिक ख़तरा होता है।

क्या हैं सेप्सिस के लक्षण?

वायरस, बैक्टीरिया, फंगस या परजीवी- इन तमाम तरह के रोगाणुओं के कारण सेप्सिस की शुरुआत हो सकती है। न्यूमोनिया, किसी घाव में संक्रमण, मूत्रनली के संक्रमण या पेट के संक्रमण अक्सर सेप्सिस का कारण बनते हैं। कई आम मौसमी इन्फ्लूएंज़ा वायरसों के अलावा दूसरे तेज़ी से फैलने वाले वायरसों के कारण भी ऐसा होता है। जैसे कि इबोला, पीत ज्वर, डेंगू, स्वाइन फ्लू, बर्ड फ्लू या फिर आजकल फैला हुआ कोरोना वायरस। संक्रमण के आम लक्षणों के अलावा जो ख़ास लक्षण सेप्सिस की ओर इशारा करते हैं वे हैं ब्लड प्रेशर में अचानक गिरावट आना और उसी के साथ दिल की धड़कन तेज़ी से ऊपर जाना, साथ में बुख़ार, भारी और तेज़-तेज़ सांसें चलना और बहुत बीमार महसूस करना सेप्सिस के लक्षण होते हैं। इसके बाद अगला और गंभीर चरण होता है सेप्टिक शॉक, जिसमें ब्लड प्रेशर ख़तरनाक स्तर तक गिर जाता है, ऐसे में तुरंत चिकित्सा इमरजेंसी सेवा की मदद लेनी चाहिए।

क्या सेप्सिस का कोई इलाज है?

अस्पतालों में सेप्सिस के ख़ूब मामले सामने आते हैं लेकिन अक्सर इनका पता काफ़ी देर से चलता है। पता चलते ही इसका फौरन इलाज किया जाता है। खून की जांच होती है, एंटीबायोटिक दवा दी जाती है और रक्त का प्रवाह और वेंटिलेशन बनाए रखने पर भी ध्यान दिया जाता है। कई बार तो सावधानी के तौर पर सेप्सिस के मरीज़ों को आर्टिफिशियल कोमा में डाल दिया जाता है। इस दौरान तमाम उपकरणों के माध्यम से मरीज़ के अंगों को बचा कर रखने की व्यवस्था की जाती है। ऐसी गहन चिकित्सा ना केवल बेहद जटिल बल्कि बहुत अधिक महंगी भी होती है। केवल अमेरिकी अस्पतालों में ही हर साल इस पर 24 अरब डॉलर ख़र्च होते हैं। लेकिन सच तो यह है कि अस्पतालों में सीमित बेड होने के कारण केवल गिने चुने मरीज़ों को ही आईसीयू की सुविधा दी जा सकती है। ऐसे में कोरोना वायरस जैसे संक्रमणों के कारण जिन मरीज़ों को सांस की गंभीर समस्या और सेप्सिस की संभावना बनती दिखे, उन्हें ही पहले आईसीयू में रखा जाता है। यही कारण है कि मौजूदा सिस्टम में कोरोना के हर मरीज़ को आईसीयू की सुविधा नहीं दी जा सकती और इसीलिए संक्रमण को रोकना ही अधिक से अधिक जानें बचाने का सबसे कारगर उपाय है।

लंबे समय तक रहता है असर

राहत की बात यह है कि क़रीब आधे मरीज़ों में सेप्सिस के बाद आगे चलकर कोई गंभीर असर नहीं दिखता। वहीं दूसरे आधे मामलों में अस्पताल से छुट्टी मिलने के तीन महीने बाद जाकर मरीज़ को भयंकर संक्रमण, किडनी फेल या फिर कोई कार्डियोवैस्कुलर बीमारी हो जाती है। इसके अलावा सेप्सिस के कई मरीज़ों में आगे चलकर लकवा, अवसाद या घबराहट की परेशानी सामने आ सकती है। इसलिए सबसे ज़रूरी बात है कि किसी तरह से मरीज़ में सेप्सिस होने से बचाया जाए या फिर जल्दी से जल्दी उसका पता लगाया जाए ताकि कोई थेरेपी उनकी जान बचाने की संभावना को बढ़ा सके।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *