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जल संकट : दुनिया के एक अरब अस्सी करोड़ लोग कम से कम साल में छे महीने पानी की कमी से जूझते है!

 

अध्ययनों से पता चलता है कि जल संकट की स्थिति उससे कहीं अधिक भयावह है जितनी पहले समझी जाती थी। नये अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि दुनिया के पचास करोड़ लोग एसे क्षेत्रों में रहते हैं जहां बारिश से जितना पानी गिरता है उससे दुगना पानी का इस्तेमाल होता है।

अध्ययनों से पता चलता है कि दुनिया के एक अरब अस्सी करोड़ लोग कम से कम साल में छे महीने, पानी की कमी से जूझते है।


मानव जीवन में जिस भाग को सब से अधिक पानी की ज़रूरत होती है मतलब जहां सब से अधिक पानी खर्च होता है वह कृषि क्षेत्र है। दुनिया की आबादी बढ़ रही है और इस बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए कृषि उत्पादों में वृद्धि की ज़रूरत है और खेती बाड़ी जितना बढ़ेगी, पानी का इस्तेमाल उतना अधिक होगा। इसके साथ ही आप को यह भी बता दें कि समृद्धि और निर्धनता का भी सीधा संबंध जल संकट से है। हालैंड में ट्विन्टे युनिवर्सिटी के प्रोफेसर एरजेन होकेस्ट्रा ने जल संकट पर बहुत काम किया है और व्यापक रूप से अध्ययन किया है। वह कहते हैं कि अगर हम पर्यावरण से संबंधित समस्याओं पर नज़र डालें तो निश्चित रूप से पानी की कमी सब से बड़ी समस्या समझी जाएगी लेकिन जल्दी से नहा लेना या नहाने में कम पानी का इस्तेमाल जल संकट से लड़ने का सही रास्ता नहीं है क्योंकि पेय जल का मात्र एक से चार प्रतिशत भाग ही घर में इस्तेमाल होता है जबकि उसका 25 प्रतिशत भाग गोश्त खाने से इस्तेमाल होता है। एक किलो बीफ के लिए 15000 लीटर से अधिक पानी की ज़रूरत होती है जबकि गाय या भेड़ को खिलाने पिलाने के लिए भी इतना ही पानी इस्तेमाल होता है।

खेती बाड़ी में सब से अधिक पानी लगता है सभी कृषि उत्पाद और पशु पालन पानी पर निर्भर हैं यहां तक कि अध्ययनों से पता चलता है कि हर वर्गमीटर पानी से लगभग ढाई किलो कृषि उत्पाद हाथ आता है यही वजह है कि इस क्षेत्र में पानी का इस्तेमाल 70 प्रतिशत है।

कृषि से हट कर उद्योग के क्षेत्र में भी काफी पानी का प्रयोग होता है। बिजलीघरों में मशीनों और पाइपों को ठंडा करने के लिए पानी का प्रयोग किया जाता है। इसी प्रकार कारखानों में विषैले पदार्थों की सफाई के लिए पानी का जम कर प्रयोग किया जाता है, टेक्सटाइल्स, शराब और कागज़ बनाने में पानी का बहुत अधिक इस्तेमाल किया जाता है। पर्यावरण के क्षेत्र में किये गये अध्ययनों में सिद्ध हो चुका है कि बड़े कारखानों से अधिक छोटे कारखाने पर्यावरण और जल भंडारों के लिए घातक होते हैं। कारखानों में रासायनिक पदार्थों की सफाई के लिए पानी का प्रयोग होता है और यह प्रदूषित पानी भी जल भंडारों को खराब करता है।


दुनिया में बेहद सीमित मात्रा में मौजूद मीठे जल को इन्सानों द्वारा पैदा किया जाने वाला कूड़ा कचरा भी काफी नुक़सान पहुंचाता है। इसी लिए नगरों और गावों में कचरे को सही तरीक़े से खत्म करने पर बहुत अधिक बल दिया जाता है। इस धरती के मीठे जल को प्रदूषित होने से बचाने का सब से आसान रास्ता यह है कि हम कम से कम कचरा पैदा करें और कचरे को पानी के स्रोतों से दूर रखें। बड़े बड़े नगरों में गंदे पानी की निकासी का सिस्टम भी पानी के प्रदूषण का एक मुख्य कारण है। ड्रेनेज सिस्टम से निकलने वाला गंदा पानी विभिन्न प्रकार के रासायनिक और विषैले पदार्थों से भरा होता है और यह गंदा पानी नदियों और झीलों के पानी को प्रदूषित करता है।

पानी को दूषित करने में तेल का भी बहुत बड़ा हाथ है। तेल रिसाव के बाद बड़ी तेज़ी के साथ फैलता है। हर साल अरबों टन तेल, नमक और भांति भांति के रासायनिक पदार्थ समुद्र के पानी में मिलते हैं जिससे इन्सान ही नहीं जानवरों को नुक़सान पहुंच रहा है और बहुत से जीव जंतु भी विलुप्त हो रहे हैं। इस तरह से हम देख रहे हैं कि दुनिया में जीवन के लिए सब से अधिक क़ीमती चीज़ यानी पानी को सब से अधिक और भांति भांति के खतरे हैं। जल का जीवन में क्या महत्व है इससे तो सभी अवगत हैं लेकिन इसका अंदाज़ा कम लोगों को है कि उसकी रक्षा न की गयी तो क्या हो सकता है? पानी का महत्व अभी केवल उन लोगों को मालूम है जो ज़रा से पानी के लिए मीलों यात्रा करते हैं लेकिन अगर हर जगह यही होने लगे तो क्या होगा?

पानी से जी जीवन है यह कुरआने मजीद का कहना है और यह एक वास्तविता है पानी पर हमारी चर्चा जारी रहेगी फिलहाल हमारे इस कार्यक्रम का समय समाप्त होता है अगली भेंट तक के लिए अनुमति दें। खुदा हाफिज़

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