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दुनिया भर में कोरोना का तेज़ रफ़तार फैलाव और यूरोप के विकसित देशों की बेबसी!

कुवैत युद्ध के बाद जब वर्ष 1991 में इराक़ के ख़िलाफ़ पहला युद्ध हुआ तो जिन देशों ने इसमें हिस्सा लिया था उनके बीच इस बात की बड़ी चर्चा रहती थी कि कोई इराक़ी आत्मघाती हमलावर अपने बैग में ख़तरनाक वायरस भरकर आएगा और लंदन की आक्सफ़ोर्ड सड़क पर अपना बैग खोलकर दसियों हज़ार लोगों की जानें ले लेगा।

इस समय कोरोना वायरस तेज़ी से फैल रहा है और यूरोपीय देशों में लाख सावधानी बरतने के बावजूद हज़ारों लोग इसकी चपेट में आते जा रहे हैं। न तो कोई आत्मघाती हमलावर कोई बैग लाया है और न ही किसी को यह पता है कि यह ख़तरा इतनी तेज़ी से क्यों बढ़ रहा है? क्या यह किसी पश्चिमी या पूर्वी देश की प्रयोगशाला में किए जा रहे किसी प्रयोग का नतीजा है? यह वायरस इतनी तेज़ रफ़तार से दुनिया में क्यों फैला?

इन सवालो के जवाब हमारे पास नहीं हैं और न ही पश्चिमी देशों और उनके वैज्ञानिकों के पास हैं। बस हर तरफ़ ख़ौफ़ का वह माहौल है जो अब तक नहीं देखा गया। मस्जिदों में जमाअत से पढ़ी जाने वाली नमाज़ और रविवार को गिरजाघरों में होने वाले कार्यक्रम सब रोक दिए गए हैं। हज और उमरह भी रोक दिया गया है।

आज दुनिया में बहुत कुछ बदल रहा है। करोड़ों लोगों को अब यह समझ में आया है कि कर्फ्यू क्या होता है या नज़रबंदी किसे कहते हैं। न फ़ुटबाल मैच हैं, न शादी के समारोह, न रेस्टोरेंट और न कैफ़े। सारे मनोरंजनों पर रोक लग गई है।

यह भयानक संकट भी गुज़र जाएगा जिस तरह इससे पहले सैकड़ों संकट आए और गुज़र गए लेकिन इस महामारी ने सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक स्तर पर जो गहरे बदलाव किए हैं उनसे नई कम्युनिटी अस्तित्व में आएगी जिसके नए प्रकार के व्यवहार, नई आदतें और नए अंदाज़ के रिश्ते होंगे।

कोरोना के इम्तेहान में चीन की सरकार जिसे बहुत से लोग डिक्टेटर सरकार कहते हैं सफल साबित हुई जबकि यूरोपीय देशों की स्वास्थ्य व्यवस्थाएं जो ख़ुद को दूसरो के लिए आदर्श बताती हैं अब तक तो नाकाम रही हैं। एक अरब चालीस करोड़ की आबादी वाले चीन ने साबित कर दिया है कि वह वाक़ई सुपर पावर बन चुका है। वुहान शहर से फैलने वाली महामारी को उसने बड़ी दक्षता के साथ कंट्रोल किया। चीन ने दस दिन के भीतर दुनिया का बहुत बड़ा अस्पताल बना कर तैयार कर दिया।

पश्चिम जो आइडियालोजी के हिसाब से चीन का विरोधी है हैरान कर देने वाले इन तथ्यों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है और चीन के मूल्यवान अनुभवों से लाभ उठाने को अपनी बेइज़्ज़ती समझ रहा है। वैसे इटली ने सारी बातों को किनारे रख कर चीन से मदद ली है। चीन से दो विमान ज़रूरी सामान और विशेषज्ञों के साथ इटली पहुंचे जो भयानक संकट से निपटने में इटली की मदद कर रहे हैं।

किसी को नहीं मालूम के हालात का रुख़ क्या होगा। हमें इस बात की गहरी चिंता है कि यूरोप के बड़े अधिकारी साठ साल से अधिक उम्र के दसियों लाख लोगों की मौत की बात कर रहे हैं। उनका यह विचार है कि हमें युवा पीढ़ी की जान बचाने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। यह बातें ब्रिटेन में बहुत ज़्यादा हो रही हैं।

हम बड़े साम्राज्यवादी देशों से यह कहना चाहते हैं कि कोरोना महामारी के इस अनुभव को याद रखें और छोटे व पीड़ित राष्ट्रों पर अत्याचार करना बंद करें।

एक और महत्वपूर्ण सबक़ इस महामारी ने यह दिया है कि न्याय, समरसता, संवाद और आपसी सहयोग सारी दुनिया के लिए ज़रूरी है। हर एक के लिए ज़रूरी है कि दूसरे का सम्मान करे और सम्मानपूर्ण जीवन की कामना करे। न शोषण हो न ही नस्लवाद। सवाल यह है कि महामारी के यह संदेश और पाठ क्या अमरीका और वहां के राष्ट्रपति ट्रम्प तक पहुंचेंगे? हमें नहीं लगता।

साभार रायुल यौम

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